भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1517

सोलहवाँ अध्याय 16/156-167 ] महाप्रभुको राजकर्मचारीके द्वारा हिन्दु और मुस्लिम राज्योंकी सीमाका निर्देश और पथका विवरण देना :- “मद्यप यवन-राजार आगे अधिकार। ताँर भये पथे केह नारे चलिवार ॥ 158 ॥ पिछल्दा पर्यन्त सब ताँर अधिकार। ताँर भये नदी केह हैते नारे पार ॥ 159 ॥ मुस्लिम शासकके साथ सन्धिके बाद महाप्रभुके जानेके विषयमें सहायता अङ्गीकार :- दिन कत रह-सन्धि करि' ताँर सने। तबे सुखे नौकाते कराइब गमने ॥” 160 ॥ अनुवाद-तब चलते हुए महाप्रभु उड़ीसा राज्यकी सीमापर आ पहुँचे। वहाँपर एक राज-अधिकारी आकर महाप्रभुसे मिला। दो-चार दिनों तक उसने महाप्रभुकी सेवा की और आगे चलनेके मार्गका विवरण दिया,-“आगे मद्यपान करके मत्त रहनेवाले यवन राजाका अधिकार है। उसके भयसे उस मार्गपर कोई नहीं जाता है। पिछल्दा नामक स्थान तक उसका अधिकार है। उसके भयसे कोई नदीको भी पार नहीं करता। कुछ दिन तक आप यहींपर रुक जाइये, मैं उस यवन राजाके साथ मित्रता करके सुखपूर्वक आपको नौकामें चढ़ाकर भेज दूँगा ॥” 156-160 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पिछल्दा'-तमलुकेर निकटवर्ती रूप-नारायण नदीके तटपर पिछल्दा-नामक ग्राम है॥ 158 ॥ अनुभाष्य- 'ओढ़ —सुवर्णरेखा नदी ही बङ्गाल और उड़ीसाकी सीमा है। सुवर्णरेखा नदी श्रीपाट गोपीवल्लभपुरके पाससे होकर उड़ीसामें प्रवाहित होती है॥ 156 ॥ मुस्लिम शासकके एक गुप्तचरके द्वारा अपने स्वामीको महाप्रभु और उनके साथियोंकी क्रिया और महिमाका वर्णन :- सेइ काले से यवनेर एक अनुचर। ‘उड़िया-कटके’ आइल करि' वेशान्तर ॥ 161 ॥ अनुवाद-उस समय उस यवन राजाका एक अनुचर गुप्तरूपसे उड़ीसा-छावनीमें वेश-परिवर्तन करके आया ॥ 161 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'उड़िया-कटक'-उड़ीसा-देशीय राजाकी राज्य-सीमापर जो 'सैन्यकटक' अर्थात् छावनी थी, उसीको 'उड़िया-कटक' कहा गया है ॥ 161 ॥ अनुभाष्य- 'करि' वेशान्तर'-स्वयं 'यवन' होकर यवनोंके वेशके बदले हिन्दुके वेशको धारण करके॥ 161 ॥ प्रभुर सेइ अद्भुत चरित्र देखिया। हिन्दु-चर कहे, सेइ यवन-पाश गिया ॥ 162 ॥ “एक संन्यासी आइल जगन्नाथ हैते। अनेक सिद्ध-पुरुष हय ताँहार सहिते ॥ 163 ॥ अनुवाद-हिन्दु वेशमें उस यवन गुप्तचरने महाप्रभुके अद्भुत चरित्रको देखा। फिर उसने यवन राजाके पास जाकर कहा,-“एक संन्यासी जगन्नाथपुरीसे आये हैं और उनके साथ बहुतसे सिद्ध पुरुष भी हैं॥ 162-163 ॥ अनुभाष्य- 'चर'-विपक्षका हो अथवा अपनी प्रजासे ही हो, गुप्त रूपसे अन्दरकी सब बातोंको जानकर अपने परिचयको छिपाकर अन्य परिचय देकर जो व्यक्ति अपने स्वामी अथवा भेजनेवालेको यथावत् संवाद देता है ॥ 162 ॥ निरन्तर करे सबे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। सबे हासे, नाचे, गाय, करये क्रन्दन ॥ 164 ॥ लक्ष लक्ष लोक आइसे ताहा देखिबारे। ताँरे देखि' पुनरपि याइते नारे घरे ॥ 165 ॥ सेइ सब लोक हय बाउलेर प्राय। ‘कृष्ण’ कहि' नाचे, कान्दे, गड़ागड़ि याय ॥ 166 ॥ कहिबार कथा नहे,–देखिले से जानि। ताँहार प्रभावे ताँरे 'ईश्वर' करि' मानि ॥” 167 ॥ अनुवाद-वे सभी निरन्तर कृष्णनामका सङ्कीर्तन । 71