श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1516, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/150-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मूर्ति ही विशेष पूज्य है। शक्तिके उपासकगण 'वाराही' 'वैष्णवी' और 'इन्द्राणी' आदि देवियोंकी पूजा करते हैं। यहाँ शिवकी भी अनेक मूर्तियाँ और दशाश्वमेध-घाट भी है। इस स्थानको 'नाभिगया', 'विरजा-क्षेत्र' आदि भी कहा गया है ॥ 150 ॥ सङ्गी श्रीरायके साथ महाप्रभुका सर्वदा श्रीकृष्ण कथा-आलाप :- प्रभु विदाय दिल, राय याय ताँर सने। कृष्णकथा रामानन्द-सने रात्रि-दिने ॥ 151 ॥ अनुवाद - महाप्रभुके द्वारा उन दोनों राजपात्रोंको विदायी देनेपर श्रीरामानन्दराय महाप्रभुके साथ चलने लगे। महाप्रभु श्रीरामानन्दके साथ रात-दिन कृष्णकथामें ही डूबे रहते ॥ 151 ॥ राजाके आदेशसे प्रत्येक ग्राममें राज-कर्मचारियोंके द्वारा महाप्रभुकी अगवानी :- प्रतिग्रामे राज-आज्ञाय राजभृत्यगण। नव्य-गृहे नाना-द्रव्ये करये सेवन ॥ 152 ॥ अनुवाद - प्रत्येक ग्राममें राजा प्रतापरुद्रकी आज्ञासे राजकर्मचारियोंने नये घर बनाये और उनमें अनेक प्रकारकी खानेकी वस्तुएँ एकत्रित करके रखीं। इन सबके द्वारा वे महाप्रभुकी सेवा करते ॥ 152 ॥ रेमुणामें (?) श्रीरायको विदायी देना :- एइमत चलि' प्रभु 'रेमुणा' आइला। तथा हैते रामानन्द-राये विदाय दिला ॥ 153 ॥ अनुवाद - इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु 'रेमुणा' आ पहुँचे और वहाँसे उन्होंने श्रीरायरामानन्दको भी विदायी प्रदान की ॥ 153 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - इस प्रकार महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके साथ आते-आते बालेश्वरके निकट रेमुणामें पहुँचनेसे पहले ही भद्रकसे श्रीरामानन्द-रायको विदायी दी; - ऐसा वर्णन अनेक स्थानोंपर है ॥ 153 ॥ अनुभाष्य - 'तथा हैते' - वहाँसे; पाठान्तरमें, 'भद्रक हइते' - भद्रकसे। 'तथा हैते' के द्वारा 'रेमुणासे' समझने पर, मध्यलीला 1/149 संख्यामें लिखित "रामानन्द राय आइला भद्रक पर्यन्त" अर्थात् 'श्रीरामानन्द राय भद्रक तक आये' पाठके साथ मेल नहीं होता। किसीके मतानुसार, - 'रेमुणा' उस समय भद्रक-प्रदेशके अन्तर्गत था; किन्तु इस विषयमें प्रमाणका अभाव है। किसीके मतानुसार, - पूर्वोक्त 'भद्रक'के स्थानपर 'रेमुणा' पाठ ही सङ्गत है; किन्तु भद्रकसे श्रीरायका लौटकर जाना ही अधिकतर सङ्गत लगता है। 'भद्रक' - बालेश्वरसे चार योजन (40 मील) दक्षिणमें अवस्थित है और 'रेमुणा' - प्राय आधा योजन (5 मील) पश्चिममें अवस्थित है॥ 153 ॥ श्रीरायकी मूर्च्छा, महाप्रभुका क्रन्दन :- भूमेते पड़िला राय नाहिक चेतन। राये कोले करि' प्रभु करये क्रन्दन ॥ 154 ॥ अनुवाद - तभी श्रीरामानन्दराय भूमिपर गिर पड़े और अचेतन हो गये। महाप्रभु उनको अपनी गोदीमें लेकर क्रन्दन करने लगे ॥ 154 ॥ श्रीरायका महाप्रभुसे विच्छेद अवर्णनीय :- रायेर विदाय-भाव ना याय सहन। कहिते ना पारि एइ ताहार वर्णन ॥ 155 ॥ अनुवाद - श्रीरामानन्द रायका महाप्रभुसे विरहका वर्णन करना बहुत कठिन है, यह असहनीय है, इसलिये मैं उसका और वर्णन नहीं कर सकता ॥ 155 ॥ उड़ीसाकी सीमापर आगमन; राज-कर्मचारियोंके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- तबे 'ओढ़ तथा राज-अधिकारी प्रभुरे मिलिला ॥ 156 ॥ दिन दुइ-चारि तँहो करिल सेवन। आगे चलिवारे सेइ कहे विवरण ॥ 157 ॥ 70 |