श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1515, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/145-150 ] धृतरथचरणः (धृतं रथचरणं चक्रं येन सः) चलद्गुः (संरम्भेण चलन्ती कम्पमाना गौः धरा यस्मात् सः) गतोत्तरीयः (गतं पथि पतितम् उत्तरीयं तेनैव संरम्भेण यस्य सः) इभं (गजं) हन्तुं (विनाशयितुं) हरिः (सिंहः) इव अभ्ययात् (अग्रतः अधावत्), [सः मे गतिर्भूयात् इति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—'अस्त्र धारण किये बिना मैं पाण्डवोंकी रक्षा करूँगा'—अपनी इस प्रतिज्ञाको त्यागकर मेरा सङ्कल्पको—'मैं श्रीकृष्णसे शस्त्र धारण करवाकर रहूँगा' अधिक सत्य करनेके लिये श्रीकृष्ण रथसे सहसा कूद पड़े और रथके पहियेको चक्रकी भाँति धारण करके प्रबल वेगसे मेरी ओर झपटे, जिस प्रकार हाथीका वध करनेके लिये सिंह प्रबल वेगसे दौड़ पड़ता है। वेगसे दौड़नेके कारण उनके कन्धेसे उत्तरीय वस्त्र गिर गया और पृथ्वी काँपने लगी [वे मेरी गति हों, अगले श्लोकके इस वाक्यके साथ इस श्लोकका अन्वय करें] ॥145॥ महाप्रभुके द्वारा पण्डितकी प्रतिज्ञाकी रक्षा :— एइमत प्रभु तोमार विच्छेद सहिया। तोमार प्रतिज्ञा रक्षा कैल यत्न करिया॥146॥ अनुवाद—इसी प्रकार स्वयं तुम्हारे वियोगको सहन करते हुए महाप्रभुने बड़े यत्नसे तुम्हारी प्रतिज्ञाकी रक्षा की है॥146॥ श्रीपण्डितको लेकर श्रीभट्टाचार्यका पुरीमें आगमन :— एइमत कहि' ताँरे प्रबोध करिला। दुइजने शोकाकुल नीलाचल आइला॥147॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने इस प्रकार कहकर श्रीगदाधर पण्डितको ढाढ़स बँधाया और दोनों ही बड़े शोकमें डूबकर नीलाचल लौट आये॥147॥ श्रीकृष्णके उद्देश्यसे भक्तके द्वारा अनायास ही स्वधर्म-त्याग, श्रीकृष्णका इसी कारण ऋण :— प्रभु लागि' धर्म-कर्म छाड़े भक्तगण। भक्त-धर्म-हानि प्रभुर ना याय सहन॥148॥ अनुवाद—भक्त भगवान्के लिये सब प्रकारके धर्म-कर्मको छोड़नेके लिये तत्पर रहते हैं, परन्तु भगवान्से भक्तोंके धर्मकी हानि सहन नहीं होती॥148॥ भगवान्के विरहमें भक्तकी कातरता स्वाभाविक ही है, किन्तु भक्तके विरहमें भगवान्की कातरता ही 'प्रेम-विवर्त्त' है; उसके श्रवणसे जीवको श्रीचैतन्यकी प्राप्ति :— 'प्रेमेर विवर्त्त' इहा शुने येइ जन। अचिरे मिलये ताँरे चैतन्य-चरण॥149॥ अनुवाद—इस 'प्रेमके विवर्त्त'को जो व्यक्ति श्रवण करता है, उसे अति शीघ्र श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त होता है॥149॥ महाप्रभुका याजपुरमें दोनों महापात्रोंको विदा करना :— दुइ राजपात्र येइ प्रभुसङ्गे याय। 'याजपुर' आसि' प्रभु तारे दिलेन विदाय॥150॥ अनुवाद—जो दो राजपात्र महाप्रभुके साथ जा रहे थे, याजपुर पहुँचनेपर महाप्रभुने उन दोनोंको विदायी दी॥150॥ अनुभाष्य—'याजपुर'—कटक जिलेका एक उपखण्ड है। यह वैतरणी नदीके दक्षिण तटपर अवस्थित है। बायें तटपर ऋषियोंके द्वारा यज्ञ-कार्य करनेसे इस स्थानका नाम 'याजपुर' हुआ है। किसीके मतानुसार 'ययाति नगर'से 'याजपुर' नाम हुआ है। महाभारतके वनपर्वमें 114 अः— "एते कलिङ्गाः कौन्तेय यत्र वैतरणी नदी। यत्राऽयजत धर्मोऽपि देवान् शरणमेत्य वै॥4॥ अत्र वै ऋषयोऽन्ये च पुरा क्रतुभिरीजिरे॥"6ख॥ [अर्थात् लोमश ऋषिने कहा,—"हे कुन्तीपुत्र! यह कलिङ्ग देश है, जिसमें वैतरणी नदी बहती है। जहाँ धर्मने भी देवताओंकी शरणमें जाकर यज्ञ किया था। प्राचीनकालमें ऋषियों तथा अन्य लोगोंने भी यहाँ बहुतसे यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।"] यहाँ असंख्य देवमूर्तियाँ हैं; उनमेंसे श्रीवराहदेवकी । 69