भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1521

सोलहवाँ अध्याय 16/193–200 ] राजकर्मचारीके साथ उसका मिलन और बन्धुत्व :- महापात्र ताँर सने कैल कोलाकुलि। अनेक सामग्री दिया करिल मितालि ॥ 193 ॥ अनुवाद—महापात्रने उस यवन राजाको जानेसे पहले गले लगाया तथा बहुत सी सामग्री देकर उससे मित्रता बनायी ॥ 193 ॥ अनुभाष्य—'मितालि'—उपहारके रूपमें वस्तुएँ प्रदान करके मित्रता बनाना ॥ 193 ॥ म्लेच्छके द्वारा प्रातःकालमें महाप्रभुकी यात्रामें सहायता करना, महाप्रभुका सम्मानपूर्वक आह्वान :- प्रातःकाले सेइ बहु नौका साजाञा। प्रभुके आनिते दिल विश्वास पाठाञा ॥ 194 ॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकाल उस यवन-शासकने बहुत-सी नौकाओंको सजाकर महाप्रभुको नदीके उस पार लानेके लिये अपने सचिव (विश्वासपात्र) को भेज दिया ॥ 194 ॥ राजकर्मचारीके साथ महाप्रभुका जाना और म्लेच्छके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना :- महापात्र चलि' आइला महाप्रभुर सने। म्लेच्छ आसिं' कैल प्रभुर चरण-वन्दने ॥ 195 ॥ अनुवाद—महापात्र भी महाप्रभुके साथ नौकामें आया। जब वे नदी पार करके दूसरे तटपर पहुँचे, तब यवन-शासकने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की ॥ 195 ॥ सभी सुविधाओंसे युक्त एक नयी नौका देना :- एक नवीन नौका, तार मध्ये घर। स्वगणे चढ़ाइला प्रभु ताहार उपर ॥ 196 ॥ अनुवाद—उन नौकाओंमें एक नयी नौका थी, जिसके बीचमें एक कमरा था। उस नौकापर महाप्रभु और उनके भक्तोंको चढ़ाया ॥ 196 ॥ महाप्रभुके द्वारा राजकर्मचारीको नदीके तटपर विदायी देना और उसका क्रन्दन :- महापात्रे महाप्रभु करिला विदाय। कान्दिते कान्दिते सेइ तीरे रहि' याय ॥ 197 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जब महापात्रको विदा किया, तब वह रोते-रोते उसी तटपर खड़े-खड़े महाप्रभुकी नौकाको जाते हुए देखता रहा ॥ 197 ॥ महाप्रभु-भक्त वह यवन-शासक महाप्रभुकी रक्षाके लिये 'मन्त्रेश्वर' नदीको पार करके 'पिछल्दा' तक गया :- जलदस्युभये सेइ यवन चलिल। दश नौका भरि' सेइ सैन्य सङ्गे निल ॥ 198 ॥ 'मन्त्रेश्वर'-दुष्टनदे पार कराइल। 'पिछल्दा' पर्यन्त सेइ यवन आइल ॥ 199 ॥ अनुवाद—जलमार्गके डाकुओंके भयसे वह यवन-शासक भी महाप्रभुके साथ दस नौकाओंमें अपने सैनिकोंको साथ लेकर चला। महाप्रभुकी नौकाको 'मन्त्रेश्वर' नामक भयानक नदको (अर्थात् बहुत बड़ी नदीको) पार कराकर वह पिछल्दा तक महाप्रभुके साथ आया ॥ 198-199 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'मन्त्रेश्वर'—डायमण्ड हारबारके अति निकट एक बहुत बड़े नदका नाम ही 'मन्त्रेश्वर' है; उस नदसे नौका रूपनारायण-नदके तटपर स्थित 'पिछल्दा' ग्राममें पहुँची। पिछल्दा ग्रामकी एक सीमा मन्त्रेश्वरके साथ संलग्न है ॥ 199 ॥ अनुभाष्य— 'दुष्टनद'—जल-डाकुओंसे भरा दुर्गम जलपथ; नदके अत्यधिक विशाल तथा वेगके अति तीव्र होनेके कारण वह दुर्गम है ॥ 199 ॥ पिछल्दामें उसे विदा करना, उसकी अद्भुत आर्त्ति :- ताँरे विदाय दिल प्रभु सेइ ग्राम हैते। से-काले ताँर प्रेम-चेष्टा ना पारि वर्णिते ॥ 200 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस यवन-शासकको उस ग्रामसे । 75