श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1522, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/200-207 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
विदायी दी। उस समय उसकी जैसी प्रेममें दशा थी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 200 ॥ श्रीचैतन्यलीलाको श्रवण करनेवालेका ही जन्म सार्थक :- अलौकिक लीला करे श्रीकृष्णचैतन्य। येइ इहा सुने ताँर जन्म, देह—धन्य ॥ 201 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु अलौकिक लीलाएँ करते हैं। जो इन लीलाओंका श्रवण करता है, उसीका ही जन्म और देह धारण करना धन्य है ॥ 201 ॥ महाप्रभुका उसी नौकासे पाणिहाटीमें राघव-भवनमें आगमन, माझीपर कृपा :- सेइ नौका चड़ि' प्रभु आइला 'पाणिहाटि'। नाविकेरे पराइल प्रभु निज-कृपा-साटी ॥ 202 ॥ **अनुवाद—**उसी नौकापर चढ़कर महाप्रभु 'पाणिहाटि' तक आये। नाविकको महाप्रभुने अपना वस्त्र कृपाके रूपमें प्रदान किया ॥ 202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाणिहाटी'—गङ्गाके तटपर श्रीपाट खड़दहसे थोड़ी ही दूरीपर 'पाणिहाटी' ग्राम है ॥ 202 ॥ महाप्रभुके आगमनसे लोगोंकी भीड़ :- 'प्रभु आइला' बलि' लोके हैल कोलाहल। मनुष्य भरिल सब, किवा जल, स्थल ॥ 203 ॥ अनुवाद—'महाप्रभु आये हैं'—ऐसा सुनकर लोगोंमें कोलाहल मच गया। क्या जल, क्या स्थल—सभी स्थान लोगोंसे भर गये ॥ 203 ॥ भीड़के कारण बहुत कठिनाईसे श्रीराघवके द्वारा महाप्रभुको अपने घरमें लाना :- राघव-पण्डित आसि' प्रभु लञा गेला। पथे याइते लोकभिड़े कष्टे-सृष्ट्ये आइला ॥ 204 ॥ अनुवाद— श्रीराघव-पण्डित आकर महाप्रभुको अपने घर ले गये। मार्गमें जाते समय लोगोंकी भीड़के कारण उन्हें महाप्रभुको लानेमें बहुत कठिनाई हुई ॥ 204 ॥
राघव-भवनमें एक दिन रहकर कुमारहट्टमें श्रीवासके घरमें आगमन :- एकदिन प्रभु तथा करिया निवास। प्राते कुमारहट्टे आइला,—याँहा श्रीनिवास ॥ 205 ॥ **अनुवाद—**महाप्रभु केवल एक दिन श्रीराघव-पण्डितके घरमें रहे। अगले दिन प्रातःकाल वे कुमारहट्ट आ गये, जहाँ श्रीवास पण्डित रहते थे ॥ 205 ॥ उसके बाद उसके निकट ही पहले श्रीशिवानन्दके घरमें, बादमें श्रीवासुदेवके घरमें आगमन :- ताँहा हैते आगे गेला शिवानन्द-घर। वासुदेव-गृहे पाछे आइला ईश्वर ॥ 206 ॥ **अनुवाद—**श्रीवास पण्डितके घरसे महाप्रभु श्रीशिवानन्द सेनके घरपर गये तथा बादमें वे श्रीवासुदेव-दत्तके घरपर आये ॥ 206 ॥ उसके बाद विद्यानगरमें श्रीविद्यावाचस्पतिके घर आना, बहुत भीड़ देखकर गुप्त रूपसे कुलियामें आगमन :- 'वाचस्पति-गृहे' प्रभु येमते रहिला। लोक-भिड़ भये यैछे 'कुलिया' आइला ॥ 207 ॥ **अनुवाद—**उसके बाद वे विद्या-वाचस्पतिके घरपर कुछ समय रहे, परन्तु वहाँ लोगोंकी भीड़ लग गयी। उससे बचनेके लिये वे कुलियामें आये ॥ 207 ॥ **अनुभाष्य—**वाचस्पतिके घरमें महाप्रभु पाँच दिन तक रहे,—मध्यलीला 1/151 संख्या देखें। *'वाचस्पति-गृह'—*कोलद्वीपके निकट जहुद्वीपके अन्तर्गत 'विद्यानगर'में है; उस स्थानपर देवानन्द पण्डितका वास था—चैःभाः मध्यखण्ड, इक्कीसवाँ अध्याय और अन्त्यलीला तीसरा अध्याय देखें। *'कुलिया'—*श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके नवम अङ्कमें (रायके द्वारा प्रेरित एवं नवद्वीपसे कटक लौटे व्यक्तियोंकी राजाके प्रति उक्ति)— “ततः कुमारहट्टे श्रीवासपण्डित-वाट्यामभ्याययौ। ×× ततोऽद्वैतवाटीमभ्येत्य हरिदासेनाभिवन्दितस्तथैव तरणीवर्त्मना नवद्वीपस्य
76 ।