श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1523, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/207 ] पारे कुलिया-नाम ग्रामे माधवदासवाट्यामुत्तीर्णवान्। xx एवं सप्तदिनानि तत्र स्थित्वा पुनस्तटवर्त्मना एवं चलितवान्।" [अर्थात् “उसके बाद महाप्रभुका कुमारहट्टमें श्रीवास-पण्डितके घरमें आगमन हुआ। उसके बाद उस स्थानसे श्रीअद्वैतप्रभुके घरमें आगमन होनेपर नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुकी पूजा की। वहाँसे नौकाके द्वारा नवद्वीपके दूसरे पार कुलिया-नामक ग्राममें श्रीमाधवदासके घरमें पहुँचे। इस प्रकार सात दिन उस स्थानमें रहकर पुनः गङ्गातटके पथपर चलने लगे।"] श्रीचैतन्यचरितमहाकाव्यमें— “अन्यद्युः स श्रीनवद्वीपभूमेः पारे गङ्गं पश्चिमे क्वापि देशे। श्रीमान् सर्वप्राणिनां तत्तदङ्गैर्नेत्रानन्दं सम्यगागत्य तेने॥” [अर्थात् “महाप्रभु अन्य दिवस श्रीनवद्वीपभूमिके पश्चिममें गङ्गाके पारमें किसी स्थानमें (कुलिया-ग्राममें) आये और अपने सभी अङ्गोंके द्वारा समस्त प्राणियोंके नयनोंके आनन्दका विस्तार करने लगे।"] चैः भाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय— “सर्वपारिषद-सङ्गे श्रीगौरसुन्दर। आचम्बिते आसि' उत्तरिला ताँर (विद्यावाचस्पतिर) घर॥ 274॥ नवद्वीपादि सर्वादिंके हैल ध्वनि। वाचस्पति-घरे आइला न्यासिचूडामणि॥ 286॥ अनन्त अर्बुद लोक बलि' 'हरि' 'हरि'। चलिलेन देखिबारे गौराङ्ग श्रीहरि॥ 291॥ पथ नाहि पाय केहो लोकेर गहले। वनडाल भाङ्गि' लोक दशदिके चले॥ 292॥ लोकेर गहले यत अरण्य आछिल। क्षणेके सकल दिव्य पथमय हैल॥ 295॥ क्षणेके आइल सब लोक खेयाघाटे। खेयारी करिते पार पड़िल सङ्कटे॥ 305॥ सत्वरे आसिला वाचस्पति महाशय। करिलेन अनेक नौकार समुच्चय॥ 311॥ नौकार अपेक्षा आर केहो नाहि करे। नानामते पार हय ये येमते पारे॥ 312॥ हेनमते गङ्गा पार हइ' सर्वजन। सभेइ धरेन वाचस्पतिर चरण॥ 314॥ xx लुकाञा गेला प्रभु कुलिया-नगर ॥ 343ख ॥ कुलियाय आइलेन वैकुण्ठ ईश्वर। 345क। xx सर्वलोक 'हरि' बलि' वाचस्पति सङ्गे। सेइ क्षणे सभे चलिलेन महारङ्गे॥ 378॥ कुलिया-नगरे आइलेन न्यासि-मणि। सेइक्षणे सर्वदिके हैल महाध्वनि ॥ 379॥ सबे गङ्गामध्ये नदीयाय-कुलियाय। शुनि' मात्र सर्वलोके महानन्दे धाय॥ 380॥ वाचस्पतिर ग्रामे (विद्यानगरे) छिल यतेक गहल। तार कोटि कोटिगुणे पूरिल सकल॥ 381॥ लक्ष लक्ष नौका वा आइल कोथा हैते। ना जानि कतेक पार हय कतमते ॥ 383॥ लक्ष लक्ष लोक भासे जाह्नवीर जले। सभे पार हुयेन परम कुतूहले॥ 388॥ गङ्गाय हजा पार आपना आपनि। कोलोकोलि करि' सभे करे हरिध्वनि ॥ 389 ॥ क्षणेके कुलिया-ग्राम-नगर-प्रान्तर। परिपूर्ण हैल स्थल, नाहि अवसर ॥ 392 ॥ क्षणेके आइला महाशय वाचस्पति। तँहो नाहि पायेन प्रभुर कोथा स्थिति ॥ 394 ॥ xx कुलियाय प्रकाशे यतेक पापी छिल। उत्तम, मध्यम, नीच, —सबे पार हैल॥ 438 ॥ कुलिया-ग्रामेते आसि' श्रीकृष्णचैतन्य। हेन नाहि, यारे प्रभु ना करिला धन्य ॥ "541॥ [अर्थात् श्रीगौरसुन्दर अपने सभी परिकरोंके साथ अचानक उनके (श्रीविद्यावाचस्पतिके) घरमें आ पधारे। नवद्वीप आदि सभी दिशाओंमें शोर मच गया कि श्रीवाचस्पतिके घरमें संन्यासी-चूड़ामणि आये हैं। गौराङ्ग श्रीहरिके दर्शन करनेके लिये अनन्त करोड़ों लोग 'हरि हरि' कहते हुए चल पड़े। लोगोंकी इतनी भीड़ हो गयी कि किसीको चलनेका स्थान भी नहीं मिल रहा था। महाप्रभुके दर्शनोंके लिये वे सब वन और डालोंको तोड़कर मार्ग बनाते हुए चल रहे थे। जितने भी वन थे, वे सब लोगोंकी भीड़के कारण एक क्षणमें दिव्य मार्गयुक्त हो गये। एक क्षणमें सभी लोग नौका-घाटपर आ पहुँचे। इतने लोगोंको पार करानेमें माझी सङ्कटमें फँस गये। श्रीवाचस्पति महाशयने शीघ्र आकर अनेक नौकाओंको एकत्रित किया। कई लोगोंने नौकाकी । 77