भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1524, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1524

[ 16/207-208 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रतीक्षा भी नहीं की और अपने-अपने सामर्थ्य और 'गङ्गास्नान करि' प्रभु राढ़-देश दिया। उपायसे गङ्गा पार कर गये। इस प्रकार गङ्गा पार क्रमे क्रमे उत्तरिला नगर 'कुलिया'॥ होकर सभी लोग श्रीवाचस्पतिके चरणोंको पकड़ रहे थे। मायेर वचने पुनः गेला नवद्वीप। बारकोणा-घाट, निज-बाड़ीर समीप॥" ××× सबसे छिपकर महाप्रभु कुलिया-नगरको चल दिये [अर्थात् "गङ्गास्नान करके महाप्रभु राढ़-देशकी और वैकुण्ठके ईश्वर कुलियामें आ गये। ××× वहाँके ओर चले और कुलिया ग्राममें रुके। शचीमाताको प्रसन्न सभी लोग श्रीवाचस्पतिके सङ्ग 'हरि' बोलते हुए करनेके लिये महाप्रभुने नवद्वीपमें प्रवेश किया और वहाँ आनन्दसे उनके साथ चल पड़े। 'संन्यासी-शिरोमणि अपने पूर्व घरके निकट बारकोणा-घाटपर कुछ समयके कुलिया नगरमें आये हैं'-उसी क्षण चारों ओर यह लिये रहे।"] प्रेमदास- महाध्वनि गूँज उठी। यह सुनते ही सब लोग महा- "नदीयार माझखाने, सकल लोकेते जाने, आनन्दसे उधर दौड़ पड़े। नदीया (नवद्वीप) और 'कुलिया-पहाड़पुर' नामे स्थान।" कुलियाके बीचमें केवल गङ्गाका व्यवधान है। [अर्थात् "सब लोग जानते हैं कि नदीयाके बीचमें श्रीवाचस्पतिके गाँवमें जितने लोग एकत्रित हुए थे, उससे कुलिया-पहाड़पुर' नामक एक स्थान है।"] श्रीनरहरि भी करोड़ों गुणा अधिक लोगोंका समागम यहाँ हो गया। चक्रवर्ती अथवा घनश्याम दासकृत भक्तिरत्नाकर (द्वादश लाखों लोग न जाने कहाँसे आ गये? न जाने कितने तरङ्ग)में- लोग किस-प्रकारसे पार होने लगे। लाखों लोग "कुलिया पहाड़पुर देख श्रीनिवास। जाह्नवीके जलमें बह रहे थे और सभी परम आनन्दसे पूर्वे 'कोलद्वीप'-पर्वताख्य-ए प्रचार॥" पार हो रहे थे। गङ्गा पार होकर एक-दूसरेके साथ गले [अर्थात् "हे श्रीनिवास ! कुलिया-पहाड़पुरको देखो, मिलकर सभी हरिध्वनि कर रहे थे। एक क्षणमें ग्राम, पहले इसे 'कोलद्वीप-पर्वत'के नामसे सब लोग जानते नगर और प्रान्त-सब परिपूर्ण हो गये, कोई स्थान थे।"] उन्हींके द्वारा रचित "नवद्वीप-परिक्रमा"में- खाली नहीं रहा। एक क्षणमें श्रीवाचस्पति महाशय भी "कुलिया-पहाड़पुर ग्राम। आ पहुँचे, परन्तु उन्हें भी पता नहीं चल सका कि पूर्वे कोलद्वीप-पर्वताख्यानन्द नाम॥" महाप्रभु कहाँ विराजमान हैं। ××× महाप्रभुके प्रकाशित [अर्थात् "कुलिया-पहाड़पुर ग्रामका पहले होनेके समय कुलियामें उत्तम, मध्यम और नीच-जितने 'कोलद्वीप-पर्वत' नाम था।"] अभी भी 'बाहिर-द्वीप'के भी पापी थे, सभीका उद्धार हो गया। ××× कुलिया-ग्राममें नामसे परिचित स्थान, वर्तमान शहर-नवद्वीप, कोलेरगञ्ज, ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं रहा जिसे महाप्रभुने वहाँ रहते कोल-आमाद, कोलेर दह, गदखालि आदि स्थान ही हुए धन्य न किया हो।"] 'कुलिया' था, इसलिये 'कुलियाका पाट' नामक आधुनिक नित्यानन्द प्रभुका नवद्वीपमें वास करते समय कल्पित जो ग्राम है, वह कभी भी 'प्राचीन' कुलिया परिकरोंके साथ सङ्कीर्तन-(चैः भाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ नहीं है ॥ 207 ॥ अः)- "खानायोड़ा, बड़गाछि, आर दो-गाछिया। कुलियामें महाप्रभुका श्रीमाधवदासके घरमें वास और गङ्गार ओपार कभु यायेन 'कुलिया'॥" 709॥ असंख्य लोगोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- [अर्थात् “श्रीनित्यानन्द प्रभु कभी-कभी गङ्गाके उस माधवदास-गृहे तथा शचीर नन्दन। पार स्थित कुलिया, खानयोड़ा, बड़गाछि, दोगाछिया आदि लक्ष-कोटि लोक तथा पाइल दरशन ॥ 208 ॥ गाँवोंमें भी जाते रहते थे।"] चैतन्य-मङ्गलमें- 78

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1524, कुल 2549 में से · BharatKosha