भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1525

सोलहवाँ अध्याय 16/208-212 ] अनुवाद—शचीनन्दन महाप्रभु कुलियामें जब श्रीमाधवदासके घरपर रहे, तब लाखों-करोड़ों लोगोंने उनका दर्शन प्राप्त किया॥208॥ अनुभाष्य—'माधवदास'—श्रीकर चट्टोपाध्यायके वंशमें श्रीयुधिष्ठिर चट्टोपाध्यायने जन्मग्रहण किया था। वे और उनके सगे-सम्बन्धी बिल्व-ग्राम और पाटिलिसे नवद्वीपके अन्तर्गत 'कुलिया-पहाड़पुर' अथवा 'पाड़पुर'में आकर वास कर रहे थे। श्रीयुधिष्ठिरके बड़े पुत्र—श्रीमाधवदास, मंझले—श्रीहरिदास और छोटे—श्रीकृष्णसम्पत्ति चट्टोपाध्याय थे; उनके साधारण नाम क्रमशः—'छकड़ि', 'तिनकड़ि' और 'दुकड़ि' था। श्रीमाधवदासके पौत्र श्रीवंशीवदन और उनके पौत्र श्रीरामचन्द्र आदिके वंशधर बाघनापाड़ा और बैंची आदि स्थानोंपर आज भी वास कर रहे हैं॥208॥ अनेक अपराधियोंके उद्धारके कारण कुलिया ही 'अपराध-भञ्जनका पाट' :— सात दिन राहि' तथा लोक निस्तारिला। सब अपराधिगणे प्रकारे तारिला॥209॥ अनुवाद—महाप्रभुने सात दिन तक वहाँपर रहकर लोगोंका उद्धार किया। और सब प्रकारके अपराधियोंका भी उद्धार किया॥209॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, 1/153-154 संख्या देखें॥209॥ श्रीअद्वैतके घरमें जाना और शचीमाताके साथ मिलन :— 'शान्तिपुराचार्य'-गृहे ऐछे आइला। शची-माता मिलि' ताँर दुःख खण्डाइला॥210॥ अनुवाद—कुलिया-ग्रामसे महाप्रभु शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घरपर आये। वहाँ महाप्रभुसे मिलनेपर शचीमाताका दुःख दूर हो गया॥210॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुमारहट्टका वर्तमान नाम— 'हालिशहर' है। महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके कुछ ही दिनोंमें श्रीवास पण्डितने नवद्वीपके अपने वासस्थानको त्याग करके कुमारहट्टमें गृहका निर्माण किया था। कुमारहट्टसे महाप्रभु काञ्चनपल्लीमें अर्थात् काँचड़ापाड़ामें श्रीशिवानन्द सेनके घरपर गये तथा उसके बाद श्रीशिवानन्दके घरके निकटवर्ती स्थानपर श्रीवासुदेव दत्तके घरपर गये थे। वहाँसे श्रीनवद्वीपके पश्चिम-पारमें 'श्रीविद्यानगर'में महाप्रभुने गमन किया। (लोगोंकी भीड़के कारण) विद्यानगरसे आकर कुलिया-ग्राममें श्रीमाधवदासके घरपर रहे। वहाँ सात दिन रहकर देवानन्द आदिके अपराधोंको दूर किया। श्रीकविराज गोस्वामीके द्वारा इस स्थानपर शान्तिपुर-आचार्यके घरपर इस प्रकार आगमनकी बातका उल्लेख करनेसे बहुत लोगोंके मनमें यह सन्देह होता है कि काँचड़ापाड़ाके निकट ही कोई 'कुलिया' होगा। इस मिथ्या आशङ्कासे कोई 'नवीन कुलियापाट' उत्पन्न हुआ है, ऐसा अनुमान होता है। वास्तवमें महाप्रभु श्रीवासुदेवके घरसे ही शान्तिपुर-आचार्यके घरपर गये थे। वहाँसे वे नवद्वीपके दूसरी (पश्चिम) ओर विद्यानगरमें श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें और कुलिया-ग्राममें गये थे, इस प्रकारकी उक्ति 'श्रीचैतन्यभागवत'में, श्रीचैतन्यमङ्गलमें', 'श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें', 'प्रेमदासके भाषामें' और 'श्रीचैतन्यचरितकाव्यमें' स्पष्ट रूपसे वर्णित है; श्रीकविराज-गोस्वामीने इस यात्राका रीतिपूर्वक वर्णन नहीं किया है, इसलिये ये सब उत्पात और सन्देहमूलक घटनाएँ हुई हैं॥205-210॥ रामकेलिमें आगमन और 'कानाइ नाटशाला'से पुनः शान्तिपुरमें लौटना :— तबे 'रामकेलि'-ग्रामे प्रभु यैछे गेला। 'नाटशाला' हैते प्रभु पुनः फिरि' आइला॥211॥ शान्तिपुरे पुनः कैल दश-दिन वास। विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास॥212॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभु रामकेलि-ग्राममें गये। वहाँसे वे कानाइ नाटशाला गये और वहींसे महाप्रभु शान्तिपुर लौट आये। शान्तिपुरमें आकर उन्होंने दस दिन तक वास किया। इन सबका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥211-212॥ । 79

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