भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1526, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1526

[ 16/211-219 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्यभागवतमें अन्त्यखण्डमें तीसरा अध्याय देखें॥212॥ अनुभाष्य-श्रीरूप-सनातनके दर्शन (मिलन) हेतु ही महाप्रभुका रामकेलिमें आगमन, मिलन और वार्तालाप-मध्यलीला, 1/166-226 संख्या और 'कानाइ नाटशाला'-गमन-मध्यलीला, 1/227-231 संख्या देखें। शान्तिपुरमें दस दिन-मध्यलीला, 1/232-233 संख्या देखें॥ 211-212 ॥ पहले अध्यायमें सूत्ररूपमें अनेक घटनाओंका पहले ही वर्णन, ग्रन्थके कलेवरकी वृद्धिके भयसे पुनः वर्णन करनेकी अनिच्छा :- अतएव इँहा तार ना कैलुँ विस्तार। पुनरुक्ति हय, ग्रन्थ बाड़ये अपार॥ 213 ॥ तार मध्ये मिलिला यैछे रूप-सनातन। नृसिंहानन्द कैल यैछे पथेर साजन॥ 214 ॥ सूत्रमध्ये सेइ लीला आमि त' वर्णिलुँ। अतएव पुनः ताहा इँहा ना लिखिलुँ ॥ 215 ॥ अनुवाद-इस स्थानपर मैं इनका विस्तारसे वर्णन नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने पहले ही ऐसा किया है। इसके द्वारा पुनरुक्ति होगी और ग्रन्थ भी बहुत बड़ा हो जायेगा। मैंने पहले ही (मध्यलीला पहले अध्यायमें) इनका संक्षेपसे वर्णन किया है कि महाप्रभु कैसे श्रीरूप-श्रीसनातनसे मिले और श्रीनृसिंहानन्दने कैसे मार्गको सजाया? इसलिये पुनः उसे यहाँपर नहीं लिख रहा हूँ॥ 213-215 ॥ अनुभाष्य- 'नृसिंहानन्द'-आदिलीला 10/35 संख्या और मध्यलीला 1/155-162 संख्या देखें॥ 214-215 ॥ शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथका महाप्रभुके साथ साक्षात्कार :- पुनरपि प्रभु यदि 'शान्तिपुर' आइला। रघुनाथ-दास आसिं प्रभुरे मिलिला॥ 216 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब पुनः शान्तिपुर लौटकर आये, तब श्रीरघुनाथदासने आकर महाप्रभुसे भेंट की॥ 216 ॥ श्रीरघुनाथका पितृ-परिचय :- 'हिरण्य', 'गोवर्धन',-दुइ सहोदर। सप्तग्रामे बारलक्ष मुद्रार ईश्वर॥ 217 ॥ महैश्वर्ययुक्त दुँहे-वदान्य, ब्राह्मण्य। सदाचारी, सत्कुलीन, धार्मिकाग्रगण्य॥ 218 ॥ नदीया-वासी ब्राह्मणेर उपजीव्य-प्राय। अर्थ, भूमि, ग्राम दिया करेन सहाय॥ 219 ॥ अनुवाद-'हिरण्य' और 'गोवर्धन'-ये दो सगे भाई थे। ये सप्तग्राममें रहते थे और इनकी वार्षिक आय बारह लाख मुद्राएँ थी। दोनों ही महा-ऐश्वर्यशाली, दानी तथा ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले थे। वे सदाचारी, सत्कुलीन तथा धार्मिकोंमें अग्रगण्य थे। लगभग सभी नदीयावासी ब्राह्मणोंकी जीविका इन दोनों भाइयोंपर निर्भर करती थी। दोनों भाई धन, भूमि तथा गाँव देकर नदीयाके ब्राह्मणोंकी सहायता करते थे॥ 217-219 ॥ अनुभाष्य- 'हिरण्य और गोवर्धन'-हुगली जिलेमें सप्तग्रामके निकट श्रीकृष्णपुर-ग्राम-निवासी कायस्थकुलमें जन्में दो सगे भाई थे। इनकी वंशगत उपाधि विशेष रूपसे पता नहीं चलती, फिर भी ये सत्कुलीन थे। बड़े भाईका नाम 'हिरण्य' मजूमदार एवं छोटे भाईका नाम 'गोवर्धन' मजूमदार था। श्रीरघुनाथ दास गोवर्धनके ही पुत्र थे। इनके पुरोहित बलराम आचार्य-श्रीहरिदास ठाकुरके कृपापात्र थे (अन्त्यलीला, 3/165-166 संख्या) और इनके गुरु-पुरोहित यदुनन्दन आचार्य-श्रीवासुदेव दत्तके अनुगृहीत थे (अन्त्यलीला, 6/161 संख्या); इनके सम्बन्धमें अधिक जानकारीके लिये-अन्त्यलीला, 3/165, 171-174, 188-189, 198, 201 और 206 संख्या एवं अन्त्यलीला, 6/17-34, 37-40 संख्या देखें; महाप्रभुके श्रीमुखसे इनके आचरणका वर्णन अन्त्यलीला, 6/195-198 संख्यामें देखें। 80 ।

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1526, कुल 2549 में से · BharatKosha