भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1527, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1527

सोलहवाँ अध्याय 16/217-226 ] 'सप्तग्राम'—हुगली-जिलेके अन्तर्गत 'त्रिशबिघा' रेल-स्टेशनके निकट सरस्वती नदीके तटपर अवस्थित प्राचीन बन्दरगाह और नगर है। 1592 ईसवीमें पठानोंने इस स्थानको लूटा तथा सरस्वती नदीकी धारा बन्द होनेपर 1632 ईसवीमें यह बहुत प्राचीन बन्दरगाह लगभग ध्वंस हो गयी। कहा जाता है, सतरहवीं और अठारहवीं शताब्दीमें यहाँ पुर्तगालके नाविक व्यापारके लिये समुद्री जहाजसे आगमन करते थे। उस समय दक्षिण-बङ्गालमें सप्तग्राम एक समृद्धि-सम्पन्न विशेष नगरके रूपमें प्रसिद्ध था। इस नगरमें विपुल सम्पत्तिके मालिकके रूपमें हिरण्य और गोवर्धन, दो भाई वास करते थे। उस समय उनकी वार्षिक आय बारह लाख मुद्राएँ थी। आदिलीला 11/41 संख्यामें 'उद्धारण दत्त'के प्रसङ्गमें अनुभाष्यका प्रथम अंश देखें। श्रीमन्महाप्रभुके कालमें नवद्वीप समृद्ध नगर होनेपर भी वह हिरण्य और गोवर्धनके आश्रित विद्यानुशीलनमें रत ब्राह्मणोंका ही वासस्थान मात्र था। वे शुद्ध ब्राह्मण हिरण्य और गोवर्धनके आश्रित रहकर उन्हींके द्वारा दिये गये धन, भूमि और ग्राम आदिके द्वारा अध्यापन करना और जीवनयात्राका निर्वाह करते थे। हिरण्य और गोवर्धनकी ब्राह्मणोंके प्रति असाधारण मर्यादा थी और उनको मुक्तहस्तसे दान देनेके विषयमें किसी प्रकारकी हिचकिचाहट नहीं थी॥ 217-219 ॥ महाप्रभुके साथ परिचयका आदि कारण :— नीलाम्बर चक्रवर्ती—आराध्य दुँहार। चक्रवर्ती करे दुँहाय 'भ्रातृ'-व्यवहार ॥ 220 ॥ मिश्र-पुरन्दरेर पूर्वे करयाछेन सेवने। अतएव प्रभु भाल जाने दुइजने ॥ 221 ॥ अनुवाद—ये दोनों भाई श्रीनीलाम्बर चक्रवर्तीको आराध्य मानते थे, परन्तु श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती इन दोनोंके साथ भाई जैसा व्यवहार करते थे। इन दोनों भाइयोंने पहले श्रीजगन्नाथ मिश्रकी भी बहुत सेवा की थी, इसलिये महाप्रभु इन दोनों भाइयोंको भली-भाँति जानते थे॥ 220-221 ॥ श्रीरघुनाथका परिचय :— सेइ गोवर्धनेर पुत्र—रघुनाथ दास। बाल्यकाल हैते तैं हो विषये उदास ॥ 222 ॥ अनुवाद—उन श्रीगोवर्धनके पुत्र श्रीरघुनाथ दास थे। श्रीरघुनाथ दास बचपनसे ही सांसारिक विषयोंके प्रति उदासीन रहते थे॥ 222 ॥ शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुके श्रीचरणोंके दर्शन :— संन्यास करि' प्रभु यबे शान्तिपुर आइला। तबे आसि' रघुनाथ प्रभुरे मिलिला ॥ 223 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभु संन्यास लेकर शान्तिपुर आये थे, तब श्रीरघुनाथने आकर महाप्रभुसे भेंट की थी॥ 223 ॥ महाप्रभुके श्रीचरणोंमें श्रीरघुनाथके द्वारा शरण-ग्रहण :— प्रभुर चरणे पड़े प्रेमाविष्ट हञा। प्रभु पादस्पर्शन कैल करुणा करिया ॥ 224 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ प्रेमाविष्ट होकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और महाप्रभुने करुणा करके उन्हें चरणसे स्पर्श किया॥ 224 ॥ पिताके सम्बन्धसे स्नेहशील श्रीअद्वैतकी कृपासे श्रीरघुनाथको महाप्रभुके श्रीचरणोंका सङ्ग :— ताँर पिता सदा करे आचार्य-सेवन। अतएव आचार्य ताँरे हैला परसन्न ॥ 225 ॥ आचार्य-प्रसादे पाइल प्रभुर उच्छिष्ट-पात। प्रभुर चरण देखे दिन पाँच-सात ॥ 226 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके पिता सदा श्रीअद्वैताचार्यकी सेवा करते थे, इसलिये श्रीअद्वैताचार्य उनके परिवारके प्रति बहुत प्रसन्न थे। श्रीअद्वैताचार्यकी कृपासे श्रीरघुनाथको महाप्रभुके उच्छिष्ट प्रसादकी प्राप्ति हुई। श्रीरघुनाथने पाँच-सात दिन तक वहीं रहकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी सेवा की॥ 225-226 ॥ 81