श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1528, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/227-238 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुसे बिछुड़नेपर उनकी विरहमें उन्मत्त श्रीरघुनाथ :- प्रभु ताँरे विदाय दिया गेला नीलाचल। तेँहो घरे आसि' हैला प्रेमेते पागल ॥ 227 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथको विदायी देकर महाप्रभु नीलाचल चले गये। श्रीरघुनाथ घर लौटकर प्रेममें पागल हो गये ॥ 227 ॥ पहले बार-बार भाग जानेकी चेष्टाएँ और पिताके द्वारा बन्धन :- बार बार पलाय तेँहो नीलाद्रि याइते। पिता ताँरे बान्धि' राखे, आनि' पथ हैते ॥ 228 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ बार-बार श्रीजगन्नाथपुरी जानेके लिये घरसे भागनेका प्रयास करते, किन्तु उनके पिता उन्हें मार्गसे बँधवाकर वापिस ले आते ॥ 228 ॥ ग्यारह प्रहरियोंकी व्यवस्था, इसलिये महाप्रभुके दर्शनके अभावका दुःख :- पञ्च पाइक ताँरे राखे रात्रि-दिने। चारि सेवक, दुइ ब्राह्मण रहे ताँर सने ॥ 229 ॥ एकादश जन ताँरे राखे निरन्तर। नीलाचल याइते ना पाय, दुःखित अन्तर ॥ 230 ॥ अनुवाद—पाँच पहरेदार दिन-रात श्रीरघुनाथकी निगरानी करते। उनके पिताजीने उनकी सेवाके लिये चार सेवक और रसोईके लिये दो ब्राह्मण रखे। कुल मिलाकर ग्यारह लोग श्रीरघुनाथको निरन्तर नियन्त्रणमें रखते। इसी कारण श्रीरघुनाथ नीलाचल नहीं जा सकते थे तथा उसके लिये उनके मनमें बहुत दुःख था ॥ 229-230 ॥ अब महाप्रभुके शान्तिपुरमें आते ही पितासे उनके दर्शनके लिये जानेकी याचना :- एबे यदि महाप्रभु शान्तिपुर आइला। शुनिया पितारे रघुनाथ निवेजिला ॥ 231 ॥ “आज्ञा देह', याञा देखि प्रभुर चरण। अन्यथा ना रहे मोर शरीरे जीवन ॥” 232 ॥ अनुवाद—अब महाप्रभुके शान्तिपुर आनेके विषयमें सुनकर श्रीरघुनाथने अपने पितासे निवेदन किया,—“आप मुझे महाप्रभुके चरणोंके दर्शन करनेकी आज्ञा दीजिये, अन्यथा मेरे शरीरमें प्राण नहीं रहेंगे ॥” 231-232 ॥ पिताके द्वारा पुत्रको महाप्रभुके निकट भेजना :- शुनि' ताँर पिता बहु लोक-द्रव्य दिया। पाठाइल बलि' 'शीघ्र आसिबे फिरिया' ॥ 233 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथका निवेदन सुनकर उनके पिताजीने बहुतसे सेवकों और सामानके साथ उन्हें 'जल्दी लौटकर आ जाना' कहकर महाप्रभुके दर्शनके लिये भेज दिया ॥ 233 ॥ शान्तिपुरमें आकर प्रहरियोंके बन्धनसे मुक्त होनेके विषयमें चिन्तन :- सातदिन शान्तिपुरे प्रभु-सङ्गे रहे। रात्रि-दिवसे एइ मनःकथा कहे ॥ 234 ॥ 'रक्षककेर हाते मुञि केमने छुटिब ! केमने प्रभुर सङ्गे नीलाचले याब?' ॥ 235 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ सात दिन तक शान्तिपुरमें महाप्रभुके साथ रहे। दिन-रात वे मनमें इस बातका चिन्तन करते,—'पहरेदारोंके हाथोंसे मैं किस प्रकार छूटूँगा? किस प्रकार मैं महाप्रभुके साथ नीलाचल जाऊँगा?' ॥ 234-235 ॥ बद्धजीवकी लीलाका अभिनय करनेवाले श्रीरघुनाथको महाप्रभुके द्वारा शिक्षा देना :- सर्वज्ञ गौराङ्ग-प्रभु जानि' ताँर मन। शिक्षा-रूपे कहे ताँरे आश्वास-वचन ॥ 236 ॥ युक्तवैराग्य ग्रहण और फल्गु-वैराग्य त्यागका उपदेश :- “स्थिर हञा घरे याओ, ना हओ वातुल। क्रमे क्रमे पाय लोक भवसिन्धुकूल ॥ 237 ॥ मर्कट-वैराग्य ना कर लोक देखाञा। यथायोग्य विषय भुञ्ज' अनासक्त हञा ॥ 238 ॥ 82 ।