श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1529, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/236-239 ] अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये लोकव्यवहार। अचिरात् कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥ 239 ॥ अनुवाद—सर्वज्ञ श्रीगौराङ्ग महाप्रभु तो उनके मनकी बातको जानते थे, इसलिये शिक्षाके रूपमें उन्हें कुछ आश्वासनपूर्ण वचन कहे,—“तुम धैर्य धारण करके अपने घर जाओ, पागल मत बनो। धीरे-धीरे तुम भवसागरको पार कर जाओगे। लोगोंको (बन्दर जैसा) झूठा वैराग्य मत दिखलाओ। अभी अनासक्त होकर यथायोग्य विषयोंको ग्रहण करो। हृदयमें दृढ़ निष्ठा रखो और बाहरमें लोक-व्यवहार करो। अति शीघ्र ही श्रीकृष्ण तुम्हारा उद्धार करेंगे॥ 236-239 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मर्कट वैराग्य'—हृदयमें विषय- चिन्ता और गुप्त रूपसे स्त्रियोंके साथ सहवास, किन्तु बाहरमें कौपीन, बहिर्वासादि वैराग्यके चिह्नोंको धारण करना,—ये सब 'मर्कट-वैरागी'के लक्षण है॥ 238 ॥ अनुभाष्य—'मर्कट-वैराग्य'—बन्दर जैसे बिना घर- बार और बिना वस्त्रके अपनेको वैरागी पुरुषके जैसा बाहरसे दिखाता है, किन्तु इन्द्रिय-भोगोंसे निवृत्त नहीं होता, उसी प्रकार 'लोगोंको दिखानेके लिये' किये गये, वैराग्यको ही 'मर्कट-वैराग्य' कहते हैं। जो वैराग्य शुद्धभक्तिसे उसके साथ उत्पन्न नहीं होता, अपितु श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी वस्तुके प्रति कामना अथवा वासनामें बाधा पड़नेसे उत्पन्न होता है, वह 'श्मशान-वैराग्य' अथवा 'मर्कट-वैराग्य' है। यह वैराग्य शुद्धभक्तिके अनुकूल रूपमें सम्पूर्ण जीवनस्थायी न रहकर 'क्षणिक' अथवा 'फल्गु' होता है। जो विषय श्रीकृष्णसेवाके लिये बिल्कुल ही त्याग नहीं किये जा सकते, उन विषयोंके भोगको पूर्णरूपसे अनासक्त होकर केवल स्वीकार करनेसे मनुष्य कर्मफलके अधीन नहीं होता। भ:र:सिः—पूर्व विः, दूसरी लहरीमें उद्धृत नारदीय- वचन— “यावता स्यात् स्व-निर्वाहं स्वीकुर्यात् तावदर्थवित्। आधिक्ये न्यूनतायाञ्च च्यवते परमार्थतः॥” [अर्थात् “जितने धनसे अपनी भक्तिका निर्वाह हो जाय, सांसारिक विषयोंके प्रति विवेकवान् व्यक्ति उतना ही धन स्वीकार करेंगे। उससे अधिक या कम स्वीकार करनेपर व्यक्ति अपने परमार्थके लक्ष्यको प्राप्त करनेमें सफल नहीं होगा।”] “इस श्लोकके “स्व-निर्वाहः”—शब्द (का अर्थ) श्रीजीवप्रभुने अपनी 'दुर्गमसंगमनी'-टीकामें “स्व-स्व-भक्तिनिर्वाहः” अर्थात् 'अपनी-अपनी-भक्तिका निर्वाह' कहा है। पुनः (भ:र:सि: 1/2/256 संख्या)में 'फल्गु-वैराग्य'— “प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि-वस्तुनः। मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं 'फल्गु' कथ्यते॥” अर्थात् “मुमुक्षुगण शास्त्र, श्रीमूर्त्ति, नाम, महाप्रसाद, गुरु आदि हरि सम्बन्धी वस्तुओंको भी प्राकृत समझकर उनका परित्याग कर देते हैं, इसीको फल्गु वैराग्य कहते हैं।” “श्रीहरिसेवाय याहा अनुकूल। 'विषय' बलिया त्यागे हय भूल॥” [“श्रीहरिकी सेवामें जो अनुकूल है, उसे 'विषय' कहकर त्याग करनेसे दोष होता है।”] 'युक्तवैराग्य'—(भ:र:सि: 1/2/255 संख्या)में “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः। निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥” अर्थात् “कृष्णेतर विषयोंमें आसक्तिरहित होकर और कृष्णके साथ सम्बन्ध स्थापितकर, उनके सेवानुकूल विषयमात्र ग्रहण करनेको ही युक्त वैराग्य कहते हैं।” “आसक्ति-रहित, सम्बन्ध-सहित, विषय समूह, सकलि माधव।” [“आसक्तिसे रहित होकर भगवान्के सम्बन्ध सहित सभी विषयसमूह माधवके लिये ही हैं।”] मनुष्यके विश्वास अनुसार साधारणतः जिस प्रकारका व्यवहार अच्छा होता है, वैसा उस प्रकारके लोकसमाजको दिखलाकर हृदयमें सांसारिक वस्तुओंकी आविष्टताको परित्याग करके मेरे प्रति एकनिष्ठ होकर भगवद्भक्ति । 83