भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1530, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1530

[ 16/238-244 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करो; इस प्रकार निष्कपट हृदयसे श्रीकृष्णसेवा होनेपर श्रीकृष्ण ही तुम्हारा संसार बन्धनसे उद्धार करेंगे। “अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये लोक व्यवहार” यह बात पूर्वोक्त “यथायोग्य विषय भुञ्ज' अनासक्त हञा” बातकी ही व्याख्या मात्र है। 'निष्ठा' - श्रीकृष्णनिष्ठा अर्थात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुकी कामना अथवा तृष्णाका परित्याग करके अहैतुक-कृष्णानुशीलनमें निश्चय युक्त होकर अवस्थान। 'लोक-व्यवहार', -भःरःसिः पूर्व विः द्वितीय लहरीमें उद्धृत, पञ्चरात्रवचन- “लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता ॥” [अर्थात् “हे मुने ! भगवद्भक्तिकी इच्छा करनेवालेको चाहिये कि वह लौकिकी अथवा वैदिकी जो भी क्रिया या चेष्टा करे, वह श्रीहरिकी सेवाके अनुकूल हो अर्थात् उन्हें प्रसन्न करनेवाली हो।”] ॥ 238-239 ॥ महाप्रभुके वृन्दावनसे आकर नीलाचलमें वासके समय साक्षात्कार करनेकी आज्ञा :- वृन्दावन देखि' यबे आसिब नीलाचले। तबे तुमि आमा-पाश आसिह कोन छले ॥ 240 ॥ अनुवाद-मैं जब वृन्दावनके दर्शन करके नीलाचल लौटूँगा, तब तुम भी मेरे पास किसी छलसे आ जाना ॥ 240 ॥ अहैतुकी श्रीकृष्णकृपाके प्रभावसे ही श्रीकृष्णप्राप्तिकी योग्यता :- से-छल सेकाले कृष्ण स्फुराबे तोमारे। कृष्णकृपा याँरे, ताँरे के राखिते पारे ॥” 241 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण वह छल उस समय तुम्हें स्फुरित करा देंगे। जिसपर श्रीकृष्णकी कृपा होती है, उसे कौन रोक सकता है ? ॥” 241 ॥ महाप्रभुसे विदायी लेकर घरमें युक्तवैराग्यका आचरण :- एत कहि' महाप्रभु ताँरे विदाय दिल। घरे आसि' महाप्रभुर शिक्षा आचरिल ॥ 242 ॥ बाह्य वैराग्य, वातुलता सकल छाड़िया। यथायोग्य कार्य करे अनासक्त हञा ॥ 243 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने उन्हें विदायी दी। श्रीरघुनाथने घरपर आकर जैसा महाप्रभुने कहा था, वैसा ही आचरण किया। उन्होंने बाहरी वैराग्य तथा पागलपन आदि सब कुछ छोड़ दिया। वे अनासक्त होकर गृहके सब कर्त्तव्य निभाने लगे ॥ 242-243 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरघुनाथदास शान्तिपुरसे सप्तग्राममें आकर महाप्रभुकी शिक्षाका आचरण करने लगे। हृदयमें ही वैराग्यका अवलम्बन करके उन्होंने बाहरसे किसी वैराग्य-चेष्टा अथवा पागलपनको नहीं रखा, अनासक्त होकर यथायोग्य घरके कार्य करने लगे ॥ 242-243 ॥ अनुभाष्य-लोगोंकी दृष्टिमें तो उन्होंने विषय- त्यागरूपी उन्मत्तताको छोड़ दिया, किन्तु वे अनासक्त होकर श्रीकृष्णसेवाके अनुकूल भावसे यथा-उपयोगी कार्य आदि सम्पन्न करने लगे ॥ 243 ॥ श्रीरघुनाथके आचरणसे पिता-माताको सुख, प्रहरियोंके घेरेमें शिथिलता :- देखि' ताँर पिता-माता बड़ सुख पाइल। ताँहार आवरण किछु शिथिल हइल ॥ 244 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथको गृहके कार्योंमें रुचि लेते देखकर उनके पिता-माता बहुत प्रसन्न हुए। इसलिये उन्होंने उनकी पहरेदारी कुछ ढीली कर दी ॥ 244 ॥ अनुभाष्य-श्रीरघुनाथके बाहरी वैराग्यके चिह्नोंको शिथिल देखकर पिता-माताके संसारमें लिप्त हृदयमें विशेष आनन्द दिखलायी दिया। श्रीरघुनाथके आवरणके रूपमें पाँच पहरेदार, चार दास और दो ब्राह्मण, कुल मिलाकर ग्यारह लोगोंको लगाकर रखनेकी और आवश्यकता उन्हें प्रतीत नहीं हुई। श्रीरघुनाथको सांसारिक दायित्वको क्रमशः ग्रहण करते देख पहरेदारोंकी संख्या कम कर दी गयी। 84 ।