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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 16/207-208 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रतीक्षा भी नहीं की और अपने-अपने सामर्थ्य और 'गङ्गास्नान करि' प्रभु राढ़-देश दिया। उपायसे गङ्गा पार कर गये। इस प्रकार गङ्गा पार क्रमे क्रमे उत्तरिला नगर 'कुलिया'॥ होकर सभी लोग श्रीवाचस्पतिके चरणोंको पकड़ रहे थे। मायेर वचने पुनः गेला नवद्वीप। बारकोणा-घाट, निज-बाड़ीर समीप॥" ××× सबसे छिपकर महाप्रभु कुलिया-नगरको चल दिये [अर्थात् "गङ्गास्नान करके महाप्रभु राढ़-देशकी और वैकुण्ठके ईश्वर कुलियामें आ गये। ××× वहाँके ओर चले और कुलिया ग्राममें रुके। शचीमाताको प्रसन्न सभी लोग श्रीवाचस्पतिके सङ्ग 'हरि' बोलते हुए करनेके लिये महाप्रभुने नवद्वीपमें प्रवेश किया और वहाँ आनन्दसे उनके साथ चल पड़े। 'संन्यासी-शिरोमणि अपने पूर्व घरके निकट बारकोणा-घाटपर कुछ समयके कुलिया नगरमें आये हैं'-उसी क्षण चारों ओर यह लिये रहे।"] प्रेमदास- महाध्वनि गूँज उठी। यह सुनते ही सब लोग महा- "नदीयार माझखाने, सकल लोकेते जाने, आनन्दसे उधर दौड़ पड़े। नदीया (नवद्वीप) और 'कुलिया-पहाड़पुर' नामे स्थान।" कुलियाके बीचमें केवल गङ्गाका व्यवधान है। [अर्थात् "सब लोग जानते हैं कि नदीयाके बीचमें श्रीवाचस्पतिके गाँवमें जितने लोग एकत्रित हुए थे, उससे कुलिया-पहाड़पुर' नामक एक स्थान है।"] श्रीनरहरि भी करोड़ों गुणा अधिक लोगोंका समागम यहाँ हो गया। चक्रवर्ती अथवा घनश्याम दासकृत भक्तिरत्नाकर (द्वादश लाखों लोग न जाने कहाँसे आ गये? न जाने कितने तरङ्ग)में- लोग किस-प्रकारसे पार होने लगे। लाखों लोग "कुलिया पहाड़पुर देख श्रीनिवास। जाह्नवीके जलमें बह रहे थे और सभी परम आनन्दसे पूर्वे 'कोलद्वीप'-पर्वताख्य-ए प्रचार॥" पार हो रहे थे। गङ्गा पार होकर एक-दूसरेके साथ गले [अर्थात् "हे श्रीनिवास ! कुलिया-पहाड़पुरको देखो, मिलकर सभी हरिध्वनि कर रहे थे। एक क्षणमें ग्राम, पहले इसे 'कोलद्वीप-पर्वत'के नामसे सब लोग जानते नगर और प्रान्त-सब परिपूर्ण हो गये, कोई स्थान थे।"] उन्हींके द्वारा रचित "नवद्वीप-परिक्रमा"में- खाली नहीं रहा। एक क्षणमें श्रीवाचस्पति महाशय भी "कुलिया-पहाड़पुर ग्राम। आ पहुँचे, परन्तु उन्हें भी पता नहीं चल सका कि पूर्वे कोलद्वीप-पर्वताख्यानन्द नाम॥" महाप्रभु कहाँ विराजमान हैं। ××× महाप्रभुके प्रकाशित [अर्थात् "कुलिया-पहाड़पुर ग्रामका पहले होनेके समय कुलियामें उत्तम, मध्यम और नीच-जितने 'कोलद्वीप-पर्वत' नाम था।"] अभी भी 'बाहिर-द्वीप'के भी पापी थे, सभीका उद्धार हो गया। ××× कुलिया-ग्राममें नामसे परिचित स्थान, वर्तमान शहर-नवद्वीप, कोलेरगञ्ज, ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं रहा जिसे महाप्रभुने वहाँ रहते कोल-आमाद, कोलेर दह, गदखालि आदि स्थान ही हुए धन्य न किया हो।"] 'कुलिया' था, इसलिये 'कुलियाका पाट' नामक आधुनिक नित्यानन्द प्रभुका नवद्वीपमें वास करते समय कल्पित जो ग्राम है, वह कभी भी 'प्राचीन' कुलिया परिकरोंके साथ सङ्कीर्तन-(चैः भाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ नहीं है ॥ 207 ॥ अः)- "खानायोड़ा, बड़गाछि, आर दो-गाछिया। कुलियामें महाप्रभुका श्रीमाधवदासके घरमें वास और गङ्गार ओपार कभु यायेन 'कुलिया'॥" 709॥ असंख्य लोगोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- [अर्थात् “श्रीनित्यानन्द प्रभु कभी-कभी गङ्गाके उस माधवदास-गृहे तथा शचीर नन्दन। पार स्थित कुलिया, खानयोड़ा, बड़गाछि, दोगाछिया आदि लक्ष-कोटि लोक तथा पाइल दरशन ॥ 208 ॥ गाँवोंमें भी जाते रहते थे।"] चैतन्य-मङ्गलमें- 78

सोलहवाँ अध्याय 16/208-212 ] अनुवाद—शचीनन्दन महाप्रभु कुलियामें जब श्रीमाधवदासके घरपर रहे, तब लाखों-करोड़ों लोगोंने उनका दर्शन प्राप्त किया॥208॥ अनुभाष्य—'माधवदास'—श्रीकर चट्टोपाध्यायके वंशमें श्रीयुधिष्ठिर चट्टोपाध्यायने जन्मग्रहण किया था। वे और उनके सगे-सम्बन्धी बिल्व-ग्राम और पाटिलिसे नवद्वीपके अन्तर्गत 'कुलिया-पहाड़पुर' अथवा 'पाड़पुर'में आकर वास कर रहे थे। श्रीयुधिष्ठिरके बड़े पुत्र—श्रीमाधवदास, मंझले—श्रीहरिदास और छोटे—श्रीकृष्णसम्पत्ति चट्टोपाध्याय थे; उनके साधारण नाम क्रमशः—'छकड़ि', 'तिनकड़ि' और 'दुकड़ि' था। श्रीमाधवदासके पौत्र श्रीवंशीवदन और उनके पौत्र श्रीरामचन्द्र आदिके वंशधर बाघनापाड़ा और बैंची आदि स्थानोंपर आज भी वास कर रहे हैं॥208॥ अनेक अपराधियोंके उद्धारके कारण कुलिया ही 'अपराध-भञ्जनका पाट' :— सात दिन राहि' तथा लोक निस्तारिला। सब अपराधिगणे प्रकारे तारिला॥209॥ अनुवाद—महाप्रभुने सात दिन तक वहाँपर रहकर लोगोंका उद्धार किया। और सब प्रकारके अपराधियोंका भी उद्धार किया॥209॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, 1/153-154 संख्या देखें॥209॥ श्रीअद्वैतके घरमें जाना और शचीमाताके साथ मिलन :— 'शान्तिपुराचार्य'-गृहे ऐछे आइला। शची-माता मिलि' ताँर दुःख खण्डाइला॥210॥ अनुवाद—कुलिया-ग्रामसे महाप्रभु शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घरपर आये। वहाँ महाप्रभुसे मिलनेपर शचीमाताका दुःख दूर हो गया॥210॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुमारहट्टका वर्तमान नाम— 'हालिशहर' है। महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके कुछ ही दिनोंमें श्रीवास पण्डितने नवद्वीपके अपने वासस्थानको त्याग करके कुमारहट्टमें गृहका निर्माण किया था। कुमारहट्टसे महाप्रभु काञ्चनपल्लीमें अर्थात् काँचड़ापाड़ामें श्रीशिवानन्द सेनके घरपर गये तथा उसके बाद श्रीशिवानन्दके घरके निकटवर्ती स्थानपर श्रीवासुदेव दत्तके घरपर गये थे। वहाँसे श्रीनवद्वीपके पश्चिम-पारमें 'श्रीविद्यानगर'में महाप्रभुने गमन किया। (लोगोंकी भीड़के कारण) विद्यानगरसे आकर कुलिया-ग्राममें श्रीमाधवदासके घरपर रहे। वहाँ सात दिन रहकर देवानन्द आदिके अपराधोंको दूर किया। श्रीकविराज गोस्वामीके द्वारा इस स्थानपर शान्तिपुर-आचार्यके घरपर इस प्रकार आगमनकी बातका उल्लेख करनेसे बहुत लोगोंके मनमें यह सन्देह होता है कि काँचड़ापाड़ाके निकट ही कोई 'कुलिया' होगा। इस मिथ्या आशङ्कासे कोई 'नवीन कुलियापाट' उत्पन्न हुआ है, ऐसा अनुमान होता है। वास्तवमें महाप्रभु श्रीवासुदेवके घरसे ही शान्तिपुर-आचार्यके घरपर गये थे। वहाँसे वे नवद्वीपके दूसरी (पश्चिम) ओर विद्यानगरमें श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें और कुलिया-ग्राममें गये थे, इस प्रकारकी उक्ति 'श्रीचैतन्यभागवत'में, श्रीचैतन्यमङ्गलमें', 'श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें', 'प्रेमदासके भाषामें' और 'श्रीचैतन्यचरितकाव्यमें' स्पष्ट रूपसे वर्णित है; श्रीकविराज-गोस्वामीने इस यात्राका रीतिपूर्वक वर्णन नहीं किया है, इसलिये ये सब उत्पात और सन्देहमूलक घटनाएँ हुई हैं॥205-210॥ रामकेलिमें आगमन और 'कानाइ नाटशाला'से पुनः शान्तिपुरमें लौटना :— तबे 'रामकेलि'-ग्रामे प्रभु यैछे गेला। 'नाटशाला' हैते प्रभु पुनः फिरि' आइला॥211॥ शान्तिपुरे पुनः कैल दश-दिन वास। विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास॥212॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभु रामकेलि-ग्राममें गये। वहाँसे वे कानाइ नाटशाला गये और वहींसे महाप्रभु शान्तिपुर लौट आये। शान्तिपुरमें आकर उन्होंने दस दिन तक वास किया। इन सबका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥211-212॥ । 79

[ 16/211-219 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्यभागवतमें अन्त्यखण्डमें तीसरा अध्याय देखें॥212॥ अनुभाष्य-श्रीरूप-सनातनके दर्शन (मिलन) हेतु ही महाप्रभुका रामकेलिमें आगमन, मिलन और वार्तालाप-मध्यलीला, 1/166-226 संख्या और 'कानाइ नाटशाला'-गमन-मध्यलीला, 1/227-231 संख्या देखें। शान्तिपुरमें दस दिन-मध्यलीला, 1/232-233 संख्या देखें॥ 211-212 ॥ पहले अध्यायमें सूत्ररूपमें अनेक घटनाओंका पहले ही वर्णन, ग्रन्थके कलेवरकी वृद्धिके भयसे पुनः वर्णन करनेकी अनिच्छा :- अतएव इँहा तार ना कैलुँ विस्तार। पुनरुक्ति हय, ग्रन्थ बाड़ये अपार॥ 213 ॥ तार मध्ये मिलिला यैछे रूप-सनातन। नृसिंहानन्द कैल यैछे पथेर साजन॥ 214 ॥ सूत्रमध्ये सेइ लीला आमि त' वर्णिलुँ। अतएव पुनः ताहा इँहा ना लिखिलुँ ॥ 215 ॥ अनुवाद-इस स्थानपर मैं इनका विस्तारसे वर्णन नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने पहले ही ऐसा किया है। इसके द्वारा पुनरुक्ति होगी और ग्रन्थ भी बहुत बड़ा हो जायेगा। मैंने पहले ही (मध्यलीला पहले अध्यायमें) इनका संक्षेपसे वर्णन किया है कि महाप्रभु कैसे श्रीरूप-श्रीसनातनसे मिले और श्रीनृसिंहानन्दने कैसे मार्गको सजाया? इसलिये पुनः उसे यहाँपर नहीं लिख रहा हूँ॥ 213-215 ॥ अनुभाष्य- 'नृसिंहानन्द'-आदिलीला 10/35 संख्या और मध्यलीला 1/155-162 संख्या देखें॥ 214-215 ॥ शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथका महाप्रभुके साथ साक्षात्कार :- पुनरपि प्रभु यदि 'शान्तिपुर' आइला। रघुनाथ-दास आसिं प्रभुरे मिलिला॥ 216 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब पुनः शान्तिपुर लौटकर आये, तब श्रीरघुनाथदासने आकर महाप्रभुसे भेंट की॥ 216 ॥ श्रीरघुनाथका पितृ-परिचय :- 'हिरण्य', 'गोवर्धन',-दुइ सहोदर। सप्तग्रामे बारलक्ष मुद्रार ईश्वर॥ 217 ॥ महैश्वर्ययुक्त दुँहे-वदान्य, ब्राह्मण्य। सदाचारी, सत्कुलीन, धार्मिकाग्रगण्य॥ 218 ॥ नदीया-वासी ब्राह्मणेर उपजीव्य-प्राय। अर्थ, भूमि, ग्राम दिया करेन सहाय॥ 219 ॥ अनुवाद-'हिरण्य' और 'गोवर्धन'-ये दो सगे भाई थे। ये सप्तग्राममें रहते थे और इनकी वार्षिक आय बारह लाख मुद्राएँ थी। दोनों ही महा-ऐश्वर्यशाली, दानी तथा ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले थे। वे सदाचारी, सत्कुलीन तथा धार्मिकोंमें अग्रगण्य थे। लगभग सभी नदीयावासी ब्राह्मणोंकी जीविका इन दोनों भाइयोंपर निर्भर करती थी। दोनों भाई धन, भूमि तथा गाँव देकर नदीयाके ब्राह्मणोंकी सहायता करते थे॥ 217-219 ॥ अनुभाष्य- 'हिरण्य और गोवर्धन'-हुगली जिलेमें सप्तग्रामके निकट श्रीकृष्णपुर-ग्राम-निवासी कायस्थकुलमें जन्में दो सगे भाई थे। इनकी वंशगत उपाधि विशेष रूपसे पता नहीं चलती, फिर भी ये सत्कुलीन थे। बड़े भाईका नाम 'हिरण्य' मजूमदार एवं छोटे भाईका नाम 'गोवर्धन' मजूमदार था। श्रीरघुनाथ दास गोवर्धनके ही पुत्र थे। इनके पुरोहित बलराम आचार्य-श्रीहरिदास ठाकुरके कृपापात्र थे (अन्त्यलीला, 3/165-166 संख्या) और इनके गुरु-पुरोहित यदुनन्दन आचार्य-श्रीवासुदेव दत्तके अनुगृहीत थे (अन्त्यलीला, 6/161 संख्या); इनके सम्बन्धमें अधिक जानकारीके लिये-अन्त्यलीला, 3/165, 171-174, 188-189, 198, 201 और 206 संख्या एवं अन्त्यलीला, 6/17-34, 37-40 संख्या देखें; महाप्रभुके श्रीमुखसे इनके आचरणका वर्णन अन्त्यलीला, 6/195-198 संख्यामें देखें। 80 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/217-226 ] 'सप्तग्राम'—हुगली-जिलेके अन्तर्गत 'त्रिशबिघा' रेल-स्टेशनके निकट सरस्वती नदीके तटपर अवस्थित प्राचीन बन्दरगाह और नगर है। 1592 ईसवीमें पठानोंने इस स्थानको लूटा तथा सरस्वती नदीकी धारा बन्द होनेपर 1632 ईसवीमें यह बहुत प्राचीन बन्दरगाह लगभग ध्वंस हो गयी। कहा जाता है, सतरहवीं और अठारहवीं शताब्दीमें यहाँ पुर्तगालके नाविक व्यापारके लिये समुद्री जहाजसे आगमन करते थे। उस समय दक्षिण-बङ्गालमें सप्तग्राम एक समृद्धि-सम्पन्न विशेष नगरके रूपमें प्रसिद्ध था। इस नगरमें विपुल सम्पत्तिके मालिकके रूपमें हिरण्य और गोवर्धन, दो भाई वास करते थे। उस समय उनकी वार्षिक आय बारह लाख मुद्राएँ थी। आदिलीला 11/41 संख्यामें 'उद्धारण दत्त'के प्रसङ्गमें अनुभाष्यका प्रथम अंश देखें। श्रीमन्महाप्रभुके कालमें नवद्वीप समृद्ध नगर होनेपर भी वह हिरण्य और गोवर्धनके आश्रित विद्यानुशीलनमें रत ब्राह्मणोंका ही वासस्थान मात्र था। वे शुद्ध ब्राह्मण हिरण्य और गोवर्धनके आश्रित रहकर उन्हींके द्वारा दिये गये धन, भूमि और ग्राम आदिके द्वारा अध्यापन करना और जीवनयात्राका निर्वाह करते थे। हिरण्य और गोवर्धनकी ब्राह्मणोंके प्रति असाधारण मर्यादा थी और उनको मुक्तहस्तसे दान देनेके विषयमें किसी प्रकारकी हिचकिचाहट नहीं थी॥ 217-219 ॥ महाप्रभुके साथ परिचयका आदि कारण :— नीलाम्बर चक्रवर्ती—आराध्य दुँहार। चक्रवर्ती करे दुँहाय 'भ्रातृ'-व्यवहार ॥ 220 ॥ मिश्र-पुरन्दरेर पूर्वे करयाछेन सेवने। अतएव प्रभु भाल जाने दुइजने ॥ 221 ॥ अनुवाद—ये दोनों भाई श्रीनीलाम्बर चक्रवर्तीको आराध्य मानते थे, परन्तु श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती इन दोनोंके साथ भाई जैसा व्यवहार करते थे। इन दोनों भाइयोंने पहले श्रीजगन्नाथ मिश्रकी भी बहुत सेवा की थी, इसलिये महाप्रभु इन दोनों भाइयोंको भली-भाँति जानते थे॥ 220-221 ॥ श्रीरघुनाथका परिचय :— सेइ गोवर्धनेर पुत्र—रघुनाथ दास। बाल्यकाल हैते तैं हो विषये उदास ॥ 222 ॥ अनुवाद—उन श्रीगोवर्धनके पुत्र श्रीरघुनाथ दास थे। श्रीरघुनाथ दास बचपनसे ही सांसारिक विषयोंके प्रति उदासीन रहते थे॥ 222 ॥ शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुके श्रीचरणोंके दर्शन :— संन्यास करि' प्रभु यबे शान्तिपुर आइला। तबे आसि' रघुनाथ प्रभुरे मिलिला ॥ 223 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभु संन्यास लेकर शान्तिपुर आये थे, तब श्रीरघुनाथने आकर महाप्रभुसे भेंट की थी॥ 223 ॥ महाप्रभुके श्रीचरणोंमें श्रीरघुनाथके द्वारा शरण-ग्रहण :— प्रभुर चरणे पड़े प्रेमाविष्ट हञा। प्रभु पादस्पर्शन कैल करुणा करिया ॥ 224 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ प्रेमाविष्ट होकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और महाप्रभुने करुणा करके उन्हें चरणसे स्पर्श किया॥ 224 ॥ पिताके सम्बन्धसे स्नेहशील श्रीअद्वैतकी कृपासे श्रीरघुनाथको महाप्रभुके श्रीचरणोंका सङ्ग :— ताँर पिता सदा करे आचार्य-सेवन। अतएव आचार्य ताँरे हैला परसन्न ॥ 225 ॥ आचार्य-प्रसादे पाइल प्रभुर उच्छिष्ट-पात। प्रभुर चरण देखे दिन पाँच-सात ॥ 226 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके पिता सदा श्रीअद्वैताचार्यकी सेवा करते थे, इसलिये श्रीअद्वैताचार्य उनके परिवारके प्रति बहुत प्रसन्न थे। श्रीअद्वैताचार्यकी कृपासे श्रीरघुनाथको महाप्रभुके उच्छिष्ट प्रसादकी प्राप्ति हुई। श्रीरघुनाथने पाँच-सात दिन तक वहीं रहकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी सेवा की॥ 225-226 ॥ 81

[ 16/227-238 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुसे बिछुड़नेपर उनकी विरहमें उन्मत्त श्रीरघुनाथ :- प्रभु ताँरे विदाय दिया गेला नीलाचल। तेँहो घरे आसि' हैला प्रेमेते पागल ॥ 227 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथको विदायी देकर महाप्रभु नीलाचल चले गये। श्रीरघुनाथ घर लौटकर प्रेममें पागल हो गये ॥ 227 ॥ पहले बार-बार भाग जानेकी चेष्टाएँ और पिताके द्वारा बन्धन :- बार बार पलाय तेँहो नीलाद्रि याइते। पिता ताँरे बान्धि' राखे, आनि' पथ हैते ॥ 228 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ बार-बार श्रीजगन्नाथपुरी जानेके लिये घरसे भागनेका प्रयास करते, किन्तु उनके पिता उन्हें मार्गसे बँधवाकर वापिस ले आते ॥ 228 ॥ ग्यारह प्रहरियोंकी व्यवस्था, इसलिये महाप्रभुके दर्शनके अभावका दुःख :- पञ्च पाइक ताँरे राखे रात्रि-दिने। चारि सेवक, दुइ ब्राह्मण रहे ताँर सने ॥ 229 ॥ एकादश जन ताँरे राखे निरन्तर। नीलाचल याइते ना पाय, दुःखित अन्तर ॥ 230 ॥ अनुवाद—पाँच पहरेदार दिन-रात श्रीरघुनाथकी निगरानी करते। उनके पिताजीने उनकी सेवाके लिये चार सेवक और रसोईके लिये दो ब्राह्मण रखे। कुल मिलाकर ग्यारह लोग श्रीरघुनाथको निरन्तर नियन्त्रणमें रखते। इसी कारण श्रीरघुनाथ नीलाचल नहीं जा सकते थे तथा उसके लिये उनके मनमें बहुत दुःख था ॥ 229-230 ॥ अब महाप्रभुके शान्तिपुरमें आते ही पितासे उनके दर्शनके लिये जानेकी याचना :- एबे यदि महाप्रभु शान्तिपुर आइला। शुनिया पितारे रघुनाथ निवेजिला ॥ 231 ॥ “आज्ञा देह', याञा देखि प्रभुर चरण। अन्यथा ना रहे मोर शरीरे जीवन ॥” 232 ॥ अनुवाद—अब महाप्रभुके शान्तिपुर आनेके विषयमें सुनकर श्रीरघुनाथने अपने पितासे निवेदन किया,—“आप मुझे महाप्रभुके चरणोंके दर्शन करनेकी आज्ञा दीजिये, अन्यथा मेरे शरीरमें प्राण नहीं रहेंगे ॥” 231-232 ॥ पिताके द्वारा पुत्रको महाप्रभुके निकट भेजना :- शुनि' ताँर पिता बहु लोक-द्रव्य दिया। पाठाइल बलि' 'शीघ्र आसिबे फिरिया' ॥ 233 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथका निवेदन सुनकर उनके पिताजीने बहुतसे सेवकों और सामानके साथ उन्हें 'जल्दी लौटकर आ जाना' कहकर महाप्रभुके दर्शनके लिये भेज दिया ॥ 233 ॥ शान्तिपुरमें आकर प्रहरियोंके बन्धनसे मुक्त होनेके विषयमें चिन्तन :- सातदिन शान्तिपुरे प्रभु-सङ्गे रहे। रात्रि-दिवसे एइ मनःकथा कहे ॥ 234 ॥ 'रक्षककेर हाते मुञि केमने छुटिब ! केमने प्रभुर सङ्गे नीलाचले याब?' ॥ 235 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ सात दिन तक शान्तिपुरमें महाप्रभुके साथ रहे। दिन-रात वे मनमें इस बातका चिन्तन करते,—'पहरेदारोंके हाथोंसे मैं किस प्रकार छूटूँगा? किस प्रकार मैं महाप्रभुके साथ नीलाचल जाऊँगा?' ॥ 234-235 ॥ बद्धजीवकी लीलाका अभिनय करनेवाले श्रीरघुनाथको महाप्रभुके द्वारा शिक्षा देना :- सर्वज्ञ गौराङ्ग-प्रभु जानि' ताँर मन। शिक्षा-रूपे कहे ताँरे आश्वास-वचन ॥ 236 ॥ युक्तवैराग्य ग्रहण और फल्गु-वैराग्य त्यागका उपदेश :- “स्थिर हञा घरे याओ, ना हओ वातुल। क्रमे क्रमे पाय लोक भवसिन्धुकूल ॥ 237 ॥ मर्कट-वैराग्य ना कर लोक देखाञा। यथायोग्य विषय भुञ्ज' अनासक्त हञा ॥ 238 ॥ 82 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/236-239 ] अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये लोकव्यवहार। अचिरात् कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥ 239 ॥ अनुवाद—सर्वज्ञ श्रीगौराङ्ग महाप्रभु तो उनके मनकी बातको जानते थे, इसलिये शिक्षाके रूपमें उन्हें कुछ आश्वासनपूर्ण वचन कहे,—“तुम धैर्य धारण करके अपने घर जाओ, पागल मत बनो। धीरे-धीरे तुम भवसागरको पार कर जाओगे। लोगोंको (बन्दर जैसा) झूठा वैराग्य मत दिखलाओ। अभी अनासक्त होकर यथायोग्य विषयोंको ग्रहण करो। हृदयमें दृढ़ निष्ठा रखो और बाहरमें लोक-व्यवहार करो। अति शीघ्र ही श्रीकृष्ण तुम्हारा उद्धार करेंगे॥ 236-239 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मर्कट वैराग्य'—हृदयमें विषय- चिन्ता और गुप्त रूपसे स्त्रियोंके साथ सहवास, किन्तु बाहरमें कौपीन, बहिर्वासादि वैराग्यके चिह्नोंको धारण करना,—ये सब 'मर्कट-वैरागी'के लक्षण है॥ 238 ॥ अनुभाष्य—'मर्कट-वैराग्य'—बन्दर जैसे बिना घर- बार और बिना वस्त्रके अपनेको वैरागी पुरुषके जैसा बाहरसे दिखाता है, किन्तु इन्द्रिय-भोगोंसे निवृत्त नहीं होता, उसी प्रकार 'लोगोंको दिखानेके लिये' किये गये, वैराग्यको ही 'मर्कट-वैराग्य' कहते हैं। जो वैराग्य शुद्धभक्तिसे उसके साथ उत्पन्न नहीं होता, अपितु श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी वस्तुके प्रति कामना अथवा वासनामें बाधा पड़नेसे उत्पन्न होता है, वह 'श्मशान-वैराग्य' अथवा 'मर्कट-वैराग्य' है। यह वैराग्य शुद्धभक्तिके अनुकूल रूपमें सम्पूर्ण जीवनस्थायी न रहकर 'क्षणिक' अथवा 'फल्गु' होता है। जो विषय श्रीकृष्णसेवाके लिये बिल्कुल ही त्याग नहीं किये जा सकते, उन विषयोंके भोगको पूर्णरूपसे अनासक्त होकर केवल स्वीकार करनेसे मनुष्य कर्मफलके अधीन नहीं होता। भ:र:सिः—पूर्व विः, दूसरी लहरीमें उद्धृत नारदीय- वचन— “यावता स्यात् स्व-निर्वाहं स्वीकुर्यात् तावदर्थवित्। आधिक्ये न्यूनतायाञ्च च्यवते परमार्थतः॥” [अर्थात् “जितने धनसे अपनी भक्तिका निर्वाह हो जाय, सांसारिक विषयोंके प्रति विवेकवान् व्यक्ति उतना ही धन स्वीकार करेंगे। उससे अधिक या कम स्वीकार करनेपर व्यक्ति अपने परमार्थके लक्ष्यको प्राप्त करनेमें सफल नहीं होगा।”] “इस श्लोकके “स्व-निर्वाहः”—शब्द (का अर्थ) श्रीजीवप्रभुने अपनी 'दुर्गमसंगमनी'-टीकामें “स्व-स्व-भक्तिनिर्वाहः” अर्थात् 'अपनी-अपनी-भक्तिका निर्वाह' कहा है। पुनः (भ:र:सि: 1/2/256 संख्या)में 'फल्गु-वैराग्य'— “प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि-वस्तुनः। मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं 'फल्गु' कथ्यते॥” अर्थात् “मुमुक्षुगण शास्त्र, श्रीमूर्त्ति, नाम, महाप्रसाद, गुरु आदि हरि सम्बन्धी वस्तुओंको भी प्राकृत समझकर उनका परित्याग कर देते हैं, इसीको फल्गु वैराग्य कहते हैं।” “श्रीहरिसेवाय याहा अनुकूल। 'विषय' बलिया त्यागे हय भूल॥” [“श्रीहरिकी सेवामें जो अनुकूल है, उसे 'विषय' कहकर त्याग करनेसे दोष होता है।”] 'युक्तवैराग्य'—(भ:र:सि: 1/2/255 संख्या)में “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः। निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥” अर्थात् “कृष्णेतर विषयोंमें आसक्तिरहित होकर और कृष्णके साथ सम्बन्ध स्थापितकर, उनके सेवानुकूल विषयमात्र ग्रहण करनेको ही युक्त वैराग्य कहते हैं।” “आसक्ति-रहित, सम्बन्ध-सहित, विषय समूह, सकलि माधव।” [“आसक्तिसे रहित होकर भगवान्‌के सम्बन्ध सहित सभी विषयसमूह माधवके लिये ही हैं।”] मनुष्यके विश्वास अनुसार साधारणतः जिस प्रकारका व्यवहार अच्छा होता है, वैसा उस प्रकारके लोकसमाजको दिखलाकर हृदयमें सांसारिक वस्तुओंकी आविष्टताको परित्याग करके मेरे प्रति एकनिष्ठ होकर भगवद्भक्ति । 83

[ 16/238-244 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करो; इस प्रकार निष्कपट हृदयसे श्रीकृष्णसेवा होनेपर श्रीकृष्ण ही तुम्हारा संसार बन्धनसे उद्धार करेंगे। “अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये लोक व्यवहार” यह बात पूर्वोक्त “यथायोग्य विषय भुञ्ज' अनासक्त हञा” बातकी ही व्याख्या मात्र है। 'निष्ठा' - श्रीकृष्णनिष्ठा अर्थात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुकी कामना अथवा तृष्णाका परित्याग करके अहैतुक-कृष्णानुशीलनमें निश्चय युक्त होकर अवस्थान। 'लोक-व्यवहार', -भःरःसिः पूर्व विः द्वितीय लहरीमें उद्धृत, पञ्चरात्रवचन- “लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता ॥” [अर्थात् “हे मुने ! भगवद्भक्तिकी इच्छा करनेवालेको चाहिये कि वह लौकिकी अथवा वैदिकी जो भी क्रिया या चेष्टा करे, वह श्रीहरिकी सेवाके अनुकूल हो अर्थात् उन्हें प्रसन्न करनेवाली हो।”] ॥ 238-239 ॥ महाप्रभुके वृन्दावनसे आकर नीलाचलमें वासके समय साक्षात्कार करनेकी आज्ञा :- वृन्दावन देखि' यबे आसिब नीलाचले। तबे तुमि आमा-पाश आसिह कोन छले ॥ 240 ॥ अनुवाद-मैं जब वृन्दावनके दर्शन करके नीलाचल लौटूँगा, तब तुम भी मेरे पास किसी छलसे आ जाना ॥ 240 ॥ अहैतुकी श्रीकृष्णकृपाके प्रभावसे ही श्रीकृष्णप्राप्तिकी योग्यता :- से-छल सेकाले कृष्ण स्फुराबे तोमारे। कृष्णकृपा याँरे, ताँरे के राखिते पारे ॥” 241 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण वह छल उस समय तुम्हें स्फुरित करा देंगे। जिसपर श्रीकृष्णकी कृपा होती है, उसे कौन रोक सकता है ? ॥” 241 ॥ महाप्रभुसे विदायी लेकर घरमें युक्तवैराग्यका आचरण :- एत कहि' महाप्रभु ताँरे विदाय दिल। घरे आसि' महाप्रभुर शिक्षा आचरिल ॥ 242 ॥ बाह्य वैराग्य, वातुलता सकल छाड़िया। यथायोग्य कार्य करे अनासक्त हञा ॥ 243 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने उन्हें विदायी दी। श्रीरघुनाथने घरपर आकर जैसा महाप्रभुने कहा था, वैसा ही आचरण किया। उन्होंने बाहरी वैराग्य तथा पागलपन आदि सब कुछ छोड़ दिया। वे अनासक्त होकर गृहके सब कर्त्तव्य निभाने लगे ॥ 242-243 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरघुनाथदास शान्तिपुरसे सप्तग्राममें आकर महाप्रभुकी शिक्षाका आचरण करने लगे। हृदयमें ही वैराग्यका अवलम्बन करके उन्होंने बाहरसे किसी वैराग्य-चेष्टा अथवा पागलपनको नहीं रखा, अनासक्त होकर यथायोग्य घरके कार्य करने लगे ॥ 242-243 ॥ अनुभाष्य-लोगोंकी दृष्टिमें तो उन्होंने विषय- त्यागरूपी उन्मत्तताको छोड़ दिया, किन्तु वे अनासक्त होकर श्रीकृष्णसेवाके अनुकूल भावसे यथा-उपयोगी कार्य आदि सम्पन्न करने लगे ॥ 243 ॥ श्रीरघुनाथके आचरणसे पिता-माताको सुख, प्रहरियोंके घेरेमें शिथिलता :- देखि' ताँर पिता-माता बड़ सुख पाइल। ताँहार आवरण किछु शिथिल हइल ॥ 244 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथको गृहके कार्योंमें रुचि लेते देखकर उनके पिता-माता बहुत प्रसन्न हुए। इसलिये उन्होंने उनकी पहरेदारी कुछ ढीली कर दी ॥ 244 ॥ अनुभाष्य-श्रीरघुनाथके बाहरी वैराग्यके चिह्नोंको शिथिल देखकर पिता-माताके संसारमें लिप्त हृदयमें विशेष आनन्द दिखलायी दिया। श्रीरघुनाथके आवरणके रूपमें पाँच पहरेदार, चार दास और दो ब्राह्मण, कुल मिलाकर ग्यारह लोगोंको लगाकर रखनेकी और आवश्यकता उन्हें प्रतीत नहीं हुई। श्रीरघुनाथको सांसारिक दायित्वको क्रमशः ग्रहण करते देख पहरेदारोंकी संख्या कम कर दी गयी। 84 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/236-259 ] अन्त्यलीला, 6/13-15 संख्या देखें॥ 236-244 ॥ श्रीनिताइ श्रीअद्वैतादि सभी भक्तोंसे महाप्रभुके द्वारा पुरी होकर वृन्दावन-जानेके अनुमोदनकी याचना :- इँहा प्रभु एक एक करि' सब भक्तगण। अद्वैत-नित्यानन्दादि यत भक्तजन ॥ 245 ॥ सबा आलिङ्गन करि' कहेन गोसाञि। “सबे आज्ञा देह'—आमि नीलाचले याइ ॥ 246 ॥ उस वर्ष पुरीमें जानेके लिये सभीको निषेध-आज्ञा :- सबार सहित इँहा आमार हइल मिलन। ए वर्ष 'नीलाद्रि' केह ना करिह गमन ॥ 247 ॥ इहाँ हैते अवश्य आमि 'वृन्दावन' याब। सबे आज्ञा देह', तबे निर्विघ्ने आसिब ॥"248 ॥ अनुवाद—इधर शान्तिपुरमें महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द आदि अपने सभी भक्तोंको एक-एक करके उन सबका आलिङ्गन करनेके बाद कहा, —“आप सब अब मुझे आज्ञा दीजिये तो मैं नीलाचल जाऊँ। आप सबके साथ मेरा यहाँपर मिलन हो ही गया है, इसलिये इस वर्ष किसीको भी जगन्नाथ पुरीमें आनेकी आवश्यकता नहीं है। श्रीजगन्नाथपुरीसे मैं अवश्य ही वृन्दावन जाऊँगा। यदि आप सब मुझे आज्ञा देंगे, तो मैं निर्विघ्न वहाँसे लौटकर आऊँगा ॥ 245-248 ॥ शचीमातासे दीनतापूर्वक अनुमति ग्रहण :- मातार चरणे धरि' बहु विनय कैल। वृन्दावन याइते ताँर आज्ञा लइल ॥ 249 ॥ माताको शान्तिपुरसे नवद्वीप भेजना, पुरी-यात्रा :- तबे नवद्वीपे ताँरे दिल पाठाञा। नीलाद्रि चलिला, सङ्गे भक्तगण लञा ॥ 250 ॥ पुरीमें आगमन :- सेइ सब लोक पथे करेन सेवन। सुखे नीलाचले आइला शचीर नन्दन ॥ 251 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने शचीमाताके चरणोंको पकड़कर उनकी आज्ञाके लिये प्रार्थना की। माताने तब उनको वृन्दावन जानेके लिये आज्ञा प्रदान की। तब महाप्रभुने शचीमाताको नवद्वीप भेज दिया और स्वयं अपने भक्तोंको साथ लेकर वे जगन्नाथ पुरीकी ओर चल दिये। मार्गमें उन सब लोगोंने महाप्रभुकी सेवा की। इस प्रकार श्रीशचीनन्दन सुखपूर्वक नीलाचल आ पहुँचे ॥ 249-251 ॥ श्रीजगन्नाथ-दर्शन, सर्वत्र आगमनके संवादका प्रचार :- प्रभु आसि' जगन्नाथ दरशन कैल। 'महाप्रभु आइला'—ग्रामे कोलाहल हैल ॥ 252 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने आकर श्रीजगन्नाथके दर्शन किये। 'महाप्रभु लौट आये हैं'—यह बात पूरे जगन्नाथपुरीमें फैल गयी ॥ 252 ॥ भक्तोंके द्वारा महाप्रभुका साक्षात्कार :- आनन्दित भक्तगण आसिया मिलिला। प्रेम-आलिङ्गन प्रभु सबारे करिला ॥ 253 ॥ काशीमिश्र, रामानन्द, प्रद्युम्न, सार्वभौम। वाणीनाथ, शिखि-आदि यत भक्तगण ॥ 254 ॥ सभीको पहले वृन्दावन-यात्रामें विघ्नका वर्णन :- गदाधर-पण्डित आसि' प्रभुरे मिलिला। सबार अग्रेते प्रभु कहिते लागिला ॥ 255 ॥ “वृन्दावन याब आमि गौड़देश दिया। निज-मातार, गङ्गार चरण देखिया ॥ 256 ॥ एत मते करि' कैलुँ गौड़ेरे गमन। सहस्रेक सङ्गे हैल निज-भक्तगण ॥ 257 ॥ लक्ष लक्ष लोक आइसे कौतुक देखिते। लोकेर संघट्टे पथ ना पारि चलिते ॥ 258 ॥ यथा रहि, तथा घर-प्राचीर हय चूर्ण। यथा नेत्र पड़े तथा लोक देखि पूर्ण ॥ 259 ॥ अनुवाद—सभी भक्त आकर बड़े आनन्दसे महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने सभीको प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया। । 85

[ 16/253-267 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकाशीमिश्र, श्रीरामानन्द राय, श्रीप्रद्युम्न, श्रीसार्वभौम सेवक हैं। दोनों ही विद्या-भक्ति-बुद्धिबलमें बहुत भट्टाचार्य, श्रीवाणीनाथ, श्रीशिखि माहिति आदि जितने अनुभवी हैं, तथापि वे दोनों स्वयंको तृणसे भी अधिक भक्त थे, वे सब आकर महाप्रभुसे मिले। श्रीगदाधर हीन मानते हैं। उन दोनोंकी दीनताको देखकर, सुनकर पण्डित भी तब आकर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभु सभीके तो पत्थर भी पिघल जाँय। मैंने उनके व्यवहारसे सामने कहने लगे, - "मैंने बङ्गालसे होकर वृन्दावन सन्तुष्ट होकर उन दोनोंसे कहा, - 'तुम दोनों उत्तम जानेका निर्णय इसलिये किया था कि वहाँ अपनी माता होनेपर भी अपनेको हीन मानते हो, इसलिये श्रीकृष्ण और गङ्गादेवीके चरणोंके दर्शन करते हुए जाऊँगा। इस अतिशीघ्र ही तुम दोनोंका उद्धार करेंगे ॥ '260-264 ॥ विचारसे मैं बङ्गाल गया था। परन्तु वहाँ हजारों भक्त अनुभाष्य-तुम लोग इस संसारमें 'परम उत्तम' मेरे साथ चलने लगे। लाखों-लाखों लोग कौतूहलपूर्वक होकर भी स्वयंको 'सबसे अधिक अधम' मान रहे हो। मुझे देखनेके लिये आते। लोगोंकी भीड़के कारण मैं इसलिये श्रीकृष्ण तुम्हें इस 'संसार-बन्धन' (?)से मुक्त रास्तेमें चल नहीं पाता था। मैं जहाँ भी रहता, वहाँ करके अपने नित्यदास्यमें नियुक्त करेंगे। यद्यपि तुम इतनी अधिक भीड़ होती कि वहाँपर घर-दीवार आदि साक्षात् नित्यसिद्ध ब्रजपरिकर हो, तथापि ऐसी लीला भी टूट जाते। मैं जहाँ भी देखता, मुझे लोगोंकी भीड़ कर रहे हो कि लोगोंको उनकी बाहरी दृष्टिसे अथवा ही दिखलायी देती ॥ 253-259 ॥ जड़ेन्द्रियोंके द्वारा बद्धजीव ही दिखायी देते हो ॥ 264 ॥ रामकेलि ग्राममें श्रीरूप-सनातनके साथ विदायीके समय श्रीसनातनके द्वारा मिलन और उनके परिचयका वर्णन :- महाप्रभुको सतर्क करना :- कष्टे-सृष्ट्ये करि' गेलाङ रामकेलि-ग्राम। एत कहि' आमि यबे विदाय ताँरे दिल। आमार ठाञि आइला 'रूप' 'सनातन' नाम॥ 260॥ गमनकाले सनातन 'प्रहेली' कहिल॥ 265॥ दुइ भाइ-भक्तराज, कृष्णकृपा-पात्र। बहुतसे विभिन्न उद्देश्यवाले लोगोंके व्यवहारे-राजमन्त्री हय राजपात्र॥ 261॥ साथ वृन्दावन-दर्शन अनुचित :- विद्या-भक्ति-बुद्धि-बले परम प्रवीण। 'याँर सङ्गे हय एइ लोक लक्ष-कोटि। तबु आपनाके माने तृण हैते हीन॥ 262॥ वृन्दावन याइवार एइ नहे परिपाटी ॥ '266॥ ताँर दैन्य देखि' शुनि' पाषाण विदरे। अनुवाद-इतना कहकर मैंने जब उन्हें विदायी दी, आमि तुष्ट हञा तबे कहिलुँ दोँहारे॥ 263॥ तब जाते समय सनातनने एक गूढ़ बात कही, - 'जिनके श्रीरूप-सनातनके प्रति महाप्रभुका उपदेश :- साथ लाखों-करोड़ों लोग हो, (उन्हें यह समझना चाहिये 'उत्तम हञा हीन करि' मानह आपनारे। कि) वृन्दावन जानेकी यह परिपाटी नहीं है ॥ '265-266॥ अचिरे करिबे कृष्ण तोमार उद्धारे॥ '264॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'प्रहेली' - प्रहेलिका, पहेली ॥ 265 ॥ अनुवाद-बड़े कष्टसे मैं रामकेलि ग्राममें गया। ऐसा होनेपर भी महाप्रभुकी लोगोंकी भीड़के वहाँ मेरे पास रूप और सनातन-दो भाई आये। दोनों साथ यात्रा, बादमें श्रीसनातनके वचनपर भाई बहुत उन्नत भक्त और श्रीकृष्णके कृपापात्र हैं। विचार करके लोगोंके सङ्गका त्याग :- व्यवहारिक दृष्टिसे दोनों राजमन्त्री होनेके कारण राजाके तबु आमि शुनिलुँ मात्र, ना कैलुँ अवधान। प्राते चलि' आइलाङ 'कानाइर नाटशाला'- ग्राम॥ 267॥ 86 |

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण दिया गया है:

रात्रिकाले मने आमि विचार करिल। सनातन मोरे किवा ‘प्रहेली’ कहिल ॥ 268 ॥ भालमत’ कहिल, — मोर एत लोक सङ्गे। लोक देखि’ कहिबे मोरे — ‘एइ एक ढङ्गे’ ॥ 269 ॥ अनुवाद—उस समय मैंने उस बातको केवल सुन लिया, किन्तु उसपर कोई अधिक ध्यान नहीं दिया। और प्रातःकाल मैं ‘कानाइ नाटशाला’-ग्राममें चला आया। वहाँ रातके समय मैंने मनमें विचार किया कि सनातनने मुझसे क्या ‘पहेली’ कही थी। तब मैंने समझा कि सनातनने ठीक ही तो कहा है। मेरे साथ तो इतने लोगोंकी भीड़ है, दूसरे लोग इतनी भीड़को देखकर मुझे कहेंगे, —‘यह एक ढोंगी है ॥’267-269 ॥ निगूढ़ भजनस्थल वृन्दावनमें अति अन्तरङ्ग मर्मों भक्तके अतिरिक्त बहिरङ्ग लोगोंका अनधिकार :— ‘दुर्लभ’ ‘दुर्गम’ सेइ ‘निर्जन’ वृन्दावन। एकाकी याइब, किवा सङ्गे एकजन ॥ 270 ॥ पूर्व महाजन श्रीमाधवपुरीका अकेले ही वृन्दावन जाना :— माधवेन्द्रपुरी तथा गेला एकेश्वरे। दुग्धदान-छले कृष्ण-साक्षात् हइल ताँरे ॥ 271 ॥ अनुवाद—‘दुर्लभ’, ‘दुर्गम’ उस ‘निर्जन’ वृन्दावनमें मैं अकेला ही जाऊँगा या फिर केवल किसी एक व्यक्तिके साथ। श्रीमाधवेन्द्रपुरी वहाँ अकेले ही गये थे, दूध देनेके छलसे श्रीकृष्णने उन्हें अपने दर्शन दिये थे॥ 270-271 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 4/20-33, 172 और 179 संख्या देखें ॥ 271 ॥ महाप्रभुके द्वारा बहुत लोगोंकी भीड़का अनादर :— वादियार वाजि पाति’ चलिलाङ तथारे। बहु-सङ्गे वृन्दावन गमन ना करे ॥ 272 ॥ एका याइब, किवा सङ्गे भृत्य एकजने। तबे से शोभय वृन्दावनेर गमन ॥ 273 ॥ वृन्दावन याब काँहा ‘एकाकी’ हञा! सैन्य सङ्गे चलियाछि ढाक बाजाञा ! ॥ 274 ॥ अनुवाद—तब मैं समझा कि मैं तो बाजीगरकी भाँति ढोल पीटते हुए वृन्दावनके लिये जा रहा हूँ। बहुतसे लोगोंके साथ वहाँ नहीं जाना चाहिये। मैं अकेला ही जाऊँगा या फिर किसी एक सेवकको अपने साथ लूँगा। तभी वृन्दावन-यात्रा शोभनीय होगी। कहाँ तो मुझे अकेले ही वृन्दावन जाना चाहिये! और कहाँ मैं ढोल बजाते हुए सेनाके साथमें चल पड़ा हूँ॥ 272-274 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वादिया’ अर्थात् बाजीगर खेल दिखानेके लिये जब किसी स्थानपर बैठते हैं, तब जिस प्रकार लोगोंकी भीड़ होती है, उसी प्रकार लोगोंकी भीड़को लेकर मैं वृन्दावन जा रहा हूँ, यह अच्छा नहीं है ॥ 272 ॥ वृन्दावन जाना छोड़कर महाप्रभुका पुनः गङ्गाके तटपर आगमन :— धिक्, धिक् आपनाके बलि’ हइलाङ अस्थिर। निवृत्त हञा पुनः आइलाङ गङ्गातीर ॥ 275 ॥ कम भक्तोंके साथ पुरीमें आगमन :— भक्तगणे राखिया आइनु स्थाने-स्थाने। आमा-सङ्गे आइला सबे पाँच-छय जने ॥ 276 ॥ सभीसे निर्विघ्न वृन्दावन-जानेका परामर्श माँगना :— निर्विघ्ने एबे कैछे याइब वृन्दावने। सबे मेलि’ युक्ति देह’ हञा परसन्ने ॥ 277 ॥ छोड़कर जानेसे दुःखी श्रीगदाधरको प्रेमके द्वारा सन्तुष्ट करना :— गदाधरे छाड़ि’ गेनु, इँहो दुःख पाइल। सेइहेतु वृन्दावन याइते नारिल ॥”278 ॥ अनुवाद—मैं स्वयंको धिक्कार देते हुए क्षुब्ध हो गया। इस प्रकार वृन्दावन जानेकी अभिलाषाको छोड़कर मैं पुनः गङ्गातटपर आ गया। मैं भक्तोंको उनके-उनके

[ 16/275-283 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थानपर छोड़कर आया हूँ, मेरे साथ लगभग पाँच-छः भक्त ही आये हैं। अब तो आप सब मुझसे प्रसन्न होंगे, इसलिये अब मैं निर्विघ्न कैसे वृन्दावन जाऊँ, आप सभी मिलकर मुझे परामर्श दीजिये। मैं गदाधर पण्डितको यहाँ छोड़कर गया था, इससे इन्हें बहुत दुःख हुआ। इसी कारण मैं वृन्दावन नहीं जा पाया॥" 275-278 ॥ महाप्रभुके प्रति दाक्षिण्य-भावसे युक्त श्रीगदाधरकी सदैन्य-प्रेमोक्ति :- तबे गदाधर-पण्डित प्रेमाविष्ट हञा। प्रभु-पद धरि' कहे विनय करिया॥ 279 ॥ जिस स्थानपर महाप्रभु, वह स्थान ही वृन्दावन, वृन्दावनके अतिरिक्त श्रीकृष्णकी मधुरलीला नहीं :- “तुमि याँहा-याँहा रह, ताँहा 'वृन्दावन' । ताँहा यमुना, गङ्गा, सर्वतीर्थगण ॥ 280 ॥ लोकशिक्षाके लिये ही महाप्रभुका वृन्दावनमें गमन :- तबु वृन्दावन याह' लोक शिखाइते। सेइ त' करिबे, तोमार येइ लय चित्ते ॥ 281 ॥ वर्षाके चार मास पुरीमें रहनेका अनुरोध :- एइ आगे आइला, प्रभु, वर्षार चारिमास । एइ चारि मास कर नीलाचले वास ॥ 282 ॥ बादमें स्वतन्त्र महाप्रभु अपनी इच्छासे जाँय, इसमें भक्तोंको कोई आपत्ति नहीं :- पाछे सेइ आचरिबा, येइ तोमार मन। आपन-इच्छाय चल, रह, -के करे वारण॥" 283 ॥ अनुवाद-तब श्रीगदाधर पण्डितने प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर नम्रतापूर्वक कहा,-"आप जहाँ-जहाँ रहते हैं, वहीं वृन्दावन है। वहींपर ही यमुना, गङ्गा और सभी तीर्थ रहते हैं। तो भी आप लोकशिक्षाके लिये वृन्दावन जाते हैं। अन्यथा आप तो वही करेंगे, जो आपके मनमें होगा। अभी वर्षाके चार मास (चातुर्मास्य) आनेवाले हैं, इसलिये हमारी प्रार्थना है कि आप ये चार मास नीलाचलमें ही वास कीजिये। बादमें जैसा आपका मन करे, वैसा ही कीजियेगा। आप अपनी इच्छासे चाहे जाँय अथवा रहें, आपको कोई रोक नहीं सकता॥" 279-283 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुने इससे पहले ही रथके आगे नृत्य करते समय अपने भक्तोंके सामने अपने भावोंको प्रकाशित किया था। श्रीमहाप्रभुका हृदय ही श्रीराधाकान्तकी लीलाभूमि वृन्दावन है; तथापि लोक-शिक्षाके लिये उन्होंने जगत्में प्रकाशित भौम-वृन्दावनकी ओर गमन किया। प्राकृत-दृष्टिसे युक्त विषय भोगोंमें मत्त साधारण लोगोंकी धारणा यह है कि भौम-वृन्दावन अप्राकृत नहीं है। यह भोगरत इन्द्रियोंके भोगोंके लिये अन्य जड़ीय स्थानोंकी भाँति ही एक विशेष स्थान है। जिस प्रकार अन्यान्य जड़ वस्तुओंके सङ्गके प्रभावसे जड़ीय भाव उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार वृन्दावनको इन्द्रिय-भोग्य मानकर अथवा जड़-बुद्धिसे उसके दर्शन करनेपर, किसी पारमार्थिक नित्य मङ्गल अर्थात् अद्वयज्ञान- श्रीकृष्णकी सेवा नहीं होती। यह बात श्रीमहाप्रभुके वाक्य "मोर मन-वृन्दावन" और श्रीभागवतके 'आहुश्च ते' पद्यके द्वारा प्रमाणित हुई है। (भाः 10/84/8)- “यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः। यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचि- ज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥" [अर्थात् "जो मनुष्य त्रिधातुओं (कफ-वात-पित्त) से बने जड़ शरीरमें आत्मबुद्धि, स्त्री-पुत्रादिमें ममत्वबुद्धि, जन्मभूमिमें पूजनीयबुद्धि तथा जलादिमें तीर्थबुद्धि रखता है-किन्तु इन समस्त बुद्धिके मध्य किसी प्रकारकी बुद्धि भगवद्भक्तोंमें नहीं हो, तो वह गाय आदि (घास चरनेवाले) पशुओंमें भी गधा ही है।"] वास्तवमें मायाबद्ध जीवोंको शिक्षा देनेके लिये ही महाप्रभुने भगवान्के अप्राकृत लीलास्थल वृन्दावन-गमन तथा दर्शन आदिकी लीलाका आचरण किया था। बद्धजीव यदि यह भूलकर वृन्दावनको भी प्रपञ्चका एक 'विषयभोगक्षेत्र' माने, तब वह महाप्रभुकी शिक्षाके विरुद्ध होगा। शुद्ध-भागवतगणोंके भाव अथवा धारणा 88 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/280-288 ] यह है कि भौम-वृन्दावन चिन्मय वृन्दावनसे अभिन्न है। प्राकृत-सहजिया स्वयंको 'व्रजवासी' अथवा 'धामवासी' कहकर अभिमान अथवा प्रचार करके भी वास्तवमें चिन्मय वृन्दावनवासके स्थानपर अपने इन्द्रिय-तर्पणक्षेत्र घोर संसारमें ही वास करके जञ्जालकी वृद्धि करते हैं। श्रीदामोदर स्वरूप नित्य व्रजवासी होनेपर भी उनके चरित्रमें भौम-वृन्दावनमें जानेका प्रसङ्ग नहीं सुना जाता; श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवास पण्डित, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीरामानन्द राय, श्रीशिखि माहाति, श्रीमाधवी देवी, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी आदिकी भी वैसी यात्रा किसी ग्रन्थमें वर्णित नहीं है। परन्तु शुद्धभक्तिहीन बहुतसे प्राकृत-सहजिया, कर्मी, ज्ञानी या अन्याभिलाषी व्यक्तियोंके भी भौम-वृन्दावनमें वास, दर्शन अथवा गमनादिका प्रसङ्ग साधारण लोगोंके मुखसे सुना जाता है। भक्तिहीन लोगोंको श्रीधाममें वास स्वर्ग, मुक्ति अथवा पाप-पुण्य-वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले फल ही प्रदान करता है। “प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्ति-विलोचनेन”- श्लोकका अभिप्रेत दिव्य-निर्मल-नेत्रयुक्त शुद्धभक्तोंका ही अप्राकृत श्रीधाम वृन्दावनमें वास-यथार्थ और सत्य है। महाप्रभुके परवर्ती कालमें खेतरि-ग्राममें ठाकुर नरोत्तम, याजिग्राममें श्रीनिवासाचार्य और उनके बादके समयमें गौड़देशमें श्रीजगन्नाथदास बाबाजी महाराज, कालनामें श्रीभगवान-दास, नवद्वीपधाममें श्रीमद् गौरकिशोर दास बाबाजी महाराज, कलिकातामें श्रीश्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर आदि श्रीनाममें एकनिष्ठ भक्तोंने अवश्य ही श्रीवृन्दावनके अतिरिक्त अन्य किसी धाममें कभी भी वास नहीं किया॥ 280-281॥ सोलहवें अध्यायके अनुभाष्यका अनुवाद समाप्त। सभी भक्तोंकी यही प्रार्थना :- शुनि' सब भक्त कहे प्रभुर चरणे। “सबाकार इच्छा पण्डित कैल निवेदने॥” 284॥ अनुवाद-यह बात सुनकर महाप्रभुके चरणोंमें बैठे हुए सभी भक्तोंने कहा,—“श्रीगदाधर पण्डितने हम सबकी इच्छाको ही व्यक्त किया है॥” 284॥ सभीकी इच्छानुसार महाप्रभुका चार मास पुरीमें रहना :- सबार इच्छाय प्रभु चारि मास रहिला। शुनिय़ा प्रतापरुद्र आनन्दित हैला॥ 285॥ अनुवाद-सभी भक्तोंकी इच्छा जानकर महाप्रभु चार मास नीलाचलमें रहनेके लिये सहमत हो गये। यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र बहुत आनन्दित हुए॥ 285॥ टोटामें अपने घरमें पण्डितका महाप्रभुको भिक्षा-दान :- सेइ दिन गदाधर कैल निमन्त्रण। ताँहा भिक्षा कैल प्रभु लञा भक्तगण॥ 286॥ अनुवाद-उस दिन श्रीगदाधर पण्डितने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथ लेकर वहींपर भिक्षा ग्रहण की॥ 286॥ श्रीगदाधरका प्रेम और महाप्रभुकी उनके प्रति वश्यता-मर्त्य जीवोंके लिये अचिन्त्य :- भिक्षाते पण्डितेर स्नेह, प्रभुर आस्वादन। मनुष्येर शक्त्ये दुइ ना याय वर्णन॥ 287॥ एइमत गौरलीला अनन्त, अपार। संक्षेपे कहिये, कथन ना याय विस्तार॥ 288॥ अनुवाद-साधारण मनुष्यमें ऐसा सामर्थ्य नहीं है कि वह श्रीगदाधर पण्डितके भोजन करानेमें उनके स्नेहका और महाप्रभुके द्वारा उसके आस्वादनका वर्णन कर सके। इस प्रकार श्रीगौरलीला अनन्त और अपार है। मैं किसी प्रकारसे उसका संक्षेपमें ही वर्णन कर रहा हूँ। विस्तृत रूपसे कोई भी उसका वर्णन नहीं कर सकता॥ 287-288॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीगदाधर पण्डितके निकट महाप्रभुके भिक्षा ग्रहण करनेके समय श्रीगदाधर पण्डितका जो स्नेह है और महाप्रभु जो उस स्नेहयुक्त प्रसाद- अन्नका आस्वादन करते हैं, -ये दोनों विषय ही । 89

[ 16/287-290 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मनुष्यकी शक्तिसे वर्णन नहीं किये जा सकते ॥ 287 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। सोलहवें अध्यायके अमृतप्रवाह भाष्यका अनुवाद समाप्त। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 290 ॥ साक्षात् अनन्त भी श्रीगौरलीलाके अन्तको इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे पुनर्गौड़गमन-विलासो नाम पानेमें समर्थ नहीं :- षोड़श-परिच्छेदः। सहस्र-वदने कहे आपने 'अनन्त'। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी तबु एक लीलार तँहो नाहि पाय अन्त ॥ 289 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका अनुवाद-स्वयं श्रीअनन्तदेव अपने सहस्र मुखोंसे वर्णन कर रहा है॥ 290 ॥ महाप्रभुकी लीलाका गान करते हैं, किन्तु तब भी वे श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यखण्ड पुनः गौड़गमन-विलास-नामक एक लीलाका भी अन्त नहीं पाते ॥ 289 ॥ सोलहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 90 ।

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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 92 ।

सत्रहवाँ अध्याय कथासार—उस वर्ष श्रीक्षेत्रमें रथयात्रा देखकर महाप्रभुने वृन्दावन जानेका निश्चय किया। श्रीरामानन्द और श्रीस्वरूपने बलभद्र भट्टाचार्य और उनके साथी (सेवक) एक ब्राह्मणको साथमें भेजा। महाप्रभु प्रातःकाल होनेसे पहले ही रात्रिमें कटककी ओर चले। कटक पहुँचनेसे पहले ही कटकको दक्षिणमें रखकर अर्थात् कटकके उत्तरसे ही वे निर्जन वनपथसे चल दिये। वनपथमें बाघ-हाथी आदिको प्रेममें श्रीकृष्णनामका गान कराया। जहाँपर भी ग्राम मिलता, वहाँ भिक्षा करके चावल-सब्जियाँ एकत्रित कर लेते। जहाँ कोई गाँव नहीं होता, वहाँ पहलेसे ही एकत्रित चावलमेंसे बचे हुए चावलको पकाते और वनसे कुछ साग आदि संग्रह करके उसे चावलके साथ खानेके लिये पका लेते। बलभद्र भट्टाचार्यके मधुर व्यवहारसे महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार झारिखण्डके वनपथपर चलते हुए महाप्रभु वाराणसी धाम पहुँचे। मणिकर्णिका घाटपर स्नान करते समय महाप्रभुकी श्रीतपनमिश्रके साथ भेंट हुई। महाप्रभुको अपने घर ले जाकर उन्होंने बड़े आदरपूर्वक उन्हें रहनेके लिये एक सुविधाजनक स्थान दिया। महाप्रभुके पूर्व परिचित भक्त वैद्य-श्रीचन्द्रशेखर वाराणसीमें महाप्रभुकी सेवा करने लगे। एक महाराष्ट्र व्यवहारको देखकर जब संन्यासियोंमें प्रधान प्रकाशानन्द सरस्वतीको उनके विषयमें बतलाया, तब उसने महाप्रभुकी बहुत निन्दा की। वह ब्राह्मण उस बातसे दुःखी होकर महाप्रभुके पास आया और उसने महाप्रभुको वह बात बतलायी। और उसने महाप्रभुसे एक बात पूछी कि प्रकाशानन्द आदि संन्यासियोंके मुखमें 'श्रीकृष्णनाम'के नहीं आनेका क्या कारण है? महाप्रभुने उसके उत्तरमें मायावादको 'अपराध' कहकर निर्णय दिया और मायावादियोंका सङ्ग करनेसे मना करके उसपर कृपा की। (इसके बाद महाप्रभु) काशीसे प्रयागके रास्ते मथुरा पहुँचे। वहाँ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य सनोड़िया-ब्राह्मणके घरमें उसपर कृपा करके भिक्षा की। बादमें श्रीवृन्दावनके द्वादश-वनोंमें महाप्रेममें डूबे महाप्रभु शारी और शुक (मैना तथा तोता)की वार्ताको श्रवण करते हुए भ्रमण करने लगे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) वृन्दावनके पथपर जाते समय पशु-पक्षियोंको श्रीकृष्ण-प्रेम प्रदान करनेवाले श्रीकृष्णचैतन्य :- गच्छन् वृन्दावनं गौरो व्याघ्रेभैणखगान् वने। प्रेमोन्मत्तान् सहोन्नृत्यान् विदधे कृष्णजल्पिनः ॥ १ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरचन्द्रने वृन्दावन जाते हुए (मार्गेमें स्थित) वनमें बाघ, हाथी, हिरण और पक्षियोंको श्रीकृष्ण-नामके उच्चारणसे प्रेमोन्मत्त करते हुए नृत्य करवाया था॥ 1 ॥ अनुभाष्य— गौरः वृन्दावनं गच्छन् (गन्तुः बहिर्गतः सन्) वने (झारि-खण्डारण्यपथे) व्याघ्रेभैणखगान् (व्याघ्रगजमृग-पक्ष्यादीन्) प्रेमोन्मत्तान् (कृष्णप्रेमाविष्टान्) सह-उन्नृत्यान् (गौरेण सह उद्धण्डनृत्यपरान्) कृष्णजल्पिनः (कृष्णकृष्णेत्युच्चारिणः) विदधे (कारितवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ । 93

[ 17/3-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला शरत्कालमें जानेके इच्छुक महाप्रभुका श्रीस्वरूप-रायके साथ परामर्श :- शरत्काल हैल, प्रभुर चलिते हैल मति। रामानन्द-स्वरूप-सङ्गे निभृते युकति ॥ ३॥ "मोर सहाय करि यदि, तुमि दुइ जन। तबे आमि यात्रा देखि श्रीवृन्दावन ॥ ४ ॥ दूसरे किसीको साथ नहीं ले जानेकी इच्छा :- रात्र्ये उठि' वनपथे पलाञा याब। एकाकी याइब, काहाँ सङ्गे ना लइब ॥ ५ ॥ केह यदि सङ्ग लइते पाछे उठि' धाय। सबारे राखिबा, येन केह नाहि याय ॥ ६ ॥ भगवान्‌की भक्तोंसे उनकी कृपाकी याचना :- प्रसन्न हञा आज्ञा दिबा, ना मानिबा 'दुःख'। तोमा-सबार 'सुखे', पथेstr हबे मोर 'सुख' ॥ ७॥ अनुवाद-शरत् ऋतुके आनेपर महाप्रभुने वृन्दावन जानेका निर्णय किया। उन्होंने श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदरके साथ एकान्तमें बैठकर परामर्श किया, - "तुम दोनों यदि मेरी सहायता करो, तभी मैं जाकर श्रीवृन्दावनका दर्शन कर सकता हूँ। मैं प्रातःकाल होनेसे पहले ही रात्रिमें उठकर वनके मार्गसे यहाँसे शीघ्रतासे चला जाऊँगा। मैं अकेला ही जाऊँगा, किसीको भी अपने साथ नहीं लूँगा। यदि कोई मेरे साथ चलनेके लिये मेरे पीछे-पीछे दौड़ने लगे, तब तुम दोनों उन्हें रोक लेना, जिससे कोई मेरे पीछे नहीं आ पाये। तुम मुझे प्रसन्न होकर आज्ञा देना, मनमें दुःख नहीं करना। तुम सबके सुखी होनेसे मेरी यात्रा सुखमय होगी ॥" 3-7 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरायका महाप्रभुसे निवेदन :- दुइजन कहे, - "तुमि ईश्वर 'स्वतन्त्र'। येइ इच्छा, सेइ करिबा, नह 'परतन्त्र' ॥ ४ ॥ भक्तोंके सुखमें ही भगवान्‌की प्रसन्नता :- किन्तु आमा-दुँहार शुन एक निवेदने। 'तोमार सुखे आमार सुख' - कहिला आपने ॥ ९ ॥ भगवान्‌की प्रसन्नतामें ही भक्तका सुख :- आमा-दुँहार मने तबे बड़ 'सुख' हय। एक निवेदन यदि धर, दयामय ॥ 10 ॥ एक वैष्णव-ब्राह्मणको साथमें ले जानेकी प्रार्थना :- 'उत्तम ब्राह्मण' एक सङ्गे अवश्य चाहि। भिक्षा करि' भिक्षा दिबे, याबे पात्र वहि' ॥ 11 ॥ वनपथे याइते नाहि 'भोज्यान्न'-ब्राह्मण। आज्ञा कर,-सङ्गे चलुक विप्र एकजने ॥ "12॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दने कहा,- "आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आपकी जैसी इच्छा होगी, आप वैसा ही करेंगे, आप किसीके अधीन नहीं हैं। किन्तु हम दोनोंका एक निवेदन सुनिये। आपने स्वयं ही अभी कहा है कि 'तुम्हारी प्रसन्नतामें ही मेरी प्रसन्नता है', इसलिये हे दयामय ! हम दोनोंके मनमें तभी बहुत सुख होगा, जब आप हमारा एक निवेदन मानेंगे। आपके साथ एक उत्तम वैष्णव ब्राह्मणको अवश्य ही जाना चाहिये जो भिक्षा माँगकर आपको भोजन कराये और आपका पात्रादि उठाकर चले। वनके मार्गमें जाते समय आपको ऐसा ब्राह्मण नहीं मिलेगा, जिसके अन्नका भोजन करनेमें दोष नहीं हो। आप आज्ञा दीजिये कि आपके साथ एक ब्राह्मण भी जाय ॥" 8-12 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भोज्यान्न ब्राह्मण' - जिसका अन्न भोज्य है अर्थात् जिसके अन्नका भोजन करनेमें कोई दोष नहीं है, ऐसा ब्राह्मण ॥ 12 ॥ महाप्रभुकी अपने किसी परिकरको साथमें लेनेकी अनिच्छा, मनके अनुसार सङ्गीके लक्षण-निर्देश :- प्रभु कहे,-"निज-सङ्गी काँहो ना लइब। एकजने निले, आनेर मने दुःख हइब ॥ 13 ॥ नूतन सङ्गी हइबेक, - स्निग्ध याँर मन। ऐछे यबे पाइ, तबे लइ 'एक' जन ॥" 14 ॥ अनुवाद - महाप्रभुने कहा, - "मैं अपने सङ्गी भक्तोंमेंसे किसीको भी अपने साथ लेकर नहीं जाऊँगा, क्योंकि 94 |

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सतरहवाँ अध्याय 17/13-22 ] एकको साथमें ले जानेसे दूसरोंके मनमें दुःख होगा। मेरे साथ जानेके लिये कोई नया व्यक्ति चाहिये जिसका मन प्रीतियुक्त हो। यदि ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाय, तो मैं उस एक व्यक्तिको अपने साथ ले जा सकता हूँ॥”13-14 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहलेके जैसे मेरे साथ काला-कृष्णदास आदिके जानेका कोई प्रयोजन नहीं है; परन्तु स्निग्ध (प्रेमवान्) हृदयवाले किसी नये सङ्गीको अपने साथ ले जा सकता हूँ॥ 14 ॥ श्रीस्वरूपका बलभद्र भट्ट और उसके एक साथी और दास-ब्राह्मणका चयन और सङ्ग ले जानेकी प्रार्थना :— स्वरूप कहे, - 'एइ बलभद्र-भट्टाचार्य। तोमाते सुस्निग्ध बड़, पण्डित, साधु, आर्य ॥ 15 ॥ महाप्रभुके सङ्गसे कर्मबुद्धिप्रबल सरल ब्राह्मणको आत्मसंशोधनका सुयोग-प्रदान :— प्रथमेइ तोमा-सङ्गे आइला गौड़ हैते। इँहार इच्छा आछे 'सर्वतीर्थ' करिते ॥ 16 ॥ बलभद्र और उसके सङ्गी ब्राह्मणके कार्योंका निर्देश :— इँहार सङ्गे आछे विप्र एक 'भृत्य' । इँहो पथे करिबेन सेवा-भिक्षा-कृत्य ॥ 17 ॥ इँहारे सङ्गे लह यदि, सबार हय 'सुख' । वन-पथे याइते तोमार कोन नाइ 'दुःख' ॥ 18 ॥ सेइ विप्र वहि' निबे वस्त्राम्बुभाजन। भट्टाचार्य भिक्षा दिबे करि' भिक्षाटन ॥"19 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, - “ये बलभद्र भट्टाचार्य हैं। ये पण्डित, साधु और भक्त हैं। आपके प्रति इनकी बहुत प्रीति है। पहले ही ये आपके साथ बङ्गालसे आये हैं और सभी तीर्थोंमें भ्रमण करनेकी इनकी इच्छा भी है। इनके साथ एक और ब्राह्मणको भी ले जाइये, वह मार्गमें सेवा और भिक्षा आदि कार्य करेगा। यदि आप इन दोनोंको अपने साथ ले जाँय तो सभीको प्रसन्नता होगी और आपको भी वनके मार्गसे जाते हुए किसी प्रकारका कोई कष्ट नहीं होगा। वह ब्राह्मण वस्त्र और जलपात्रको उठाकर चलेगा और ये भट्टाचार्य भिक्षा माँगकर आपको भोजन करायेंगे ॥" 15-19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'वस्त्राम्बुजभाजन'—वस्त्र और जलपात्र ॥ 19 ॥ अनुभाष्य — 'स्निग्ध' - (भाः 1/1/8)—“ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत” [जो शिष्य स्निग्ध-स्वभावका होता है, वह गुरुकी प्रीतिका पात्र होता है और ऐसे स्निग्ध शिष्यके निकट ही गुरुजन अति निगूढ़ रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं], इस श्लोकमें 'स्निग्धस्य'-शब्दकी टीकामें श्रीधरस्वामिपादने 'प्रेमवतः' (प्रेमिक) लिखा है ॥ 14-15 ॥ महाप्रभुकी स्वीकृति :— ताँहार वचन प्रभु अङ्गीकार कैल। बलभद्र-भट्टाचार्ये सङ्गे करि' निल ॥ 20 ॥ रात्रिमें श्रीजगन्नाथसे आज्ञा ग्रहण, रात्रिके अन्तमें गुप्त रूपसे वृन्दावन-यात्रा :— पूर्वरात्र्ये जगन्नाथ देखि' 'आज्ञा' लञा। शेष-रात्र्ये उठि' प्रभु चलिला लुकाञा ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरकी प्रार्थनाको स्वीकार करके बलभद्र भट्टाचार्यको अपने साथ ले लिया। एक रात्रि पूर्व महाप्रभुने श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके बाद उनसे वृन्दावन जानेकी आज्ञा ले ली और रात्रिके अन्तिम प्रहरमें उठकर महाप्रभु छिपकर वहाँसे चल दिये ॥ 20-21 ॥ प्रातःकालमें विरह-व्याकुल भक्तोंका महाप्रभुको ढूँढ़ना :— प्रातःकाले भक्तगण प्रभु ना देखिया। अन्वेषण करि' फिरे व्याकुल हञा ॥ 22 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें जब भक्तोंने महाप्रभुको वहाँ नहीं देखा, तब वे व्याकुल होकर उन्हें इधर-उधर ढूँढ़ने लगे ॥ 22 ॥ । 95

[ 17/23–32 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीस्वरूपके द्वारा भक्तोंको मना करना और भक्तोंका रुकना :- स्वरूप-गोसाञि सबाय कैल निवारण। निवृत्त हञा रहे सबे, जानि' प्रभुर मन ॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने उन्हें ऐसा करनेके लिये मना किया। सभी भक्त महाप्रभुकी इच्छा जानकर शान्त हो गये ॥ 23 ॥ महाप्रभुके वनके मार्गसे जानेका वर्णन; महाप्रभुकी कृपासे पशु-पक्षियोंका भी उद्धार और श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- प्रसिद्ध पथ छाड़ि' प्रभु उपपथे चलिला। 'कटक' दाहिने करि' वने प्रवेशिला ॥ 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रसिद्ध राजमार्गको छोड़कर उपपथपर चल पड़े। उन्होंने कटकको अपनी दाहिनी ओर रखकर वनमें प्रवेश किया ॥ 24 ॥ निर्जन-वने चले प्रभु कृष्णनाम लञा। हस्ती-व्याघ्र पथ छाड़े प्रभुरे देखिया ॥ 25 ॥ पाले-पाले व्याघ्र, हस्ती, गण्डार, शूकरगण। तार मध्ये आवेशे प्रभु करिला गमन ॥ 26 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभु निर्जन वनमें श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हुए जा रहे थे, तब हाथियों और बाघोंने उन्हें देखकर रास्ता दे दिया। बाघ, हाथी, गैंडे और जंगली सुअरोंके झुण्डके झुण्ड वहाँ आ गये तथा महाप्रभु आवेशमें उनके बीचमेंसे निकलकर जा रहे थे॥ 25-26 ॥ अनुभाष्य—महाभागवतमें अद्वयज्ञानकी उपलब्धिके कारण द्वितीयाभिनिवेश (अपनी देहमें अभिनिवेश) और उससे उत्पन्न भय अथवा हिंसाका अभाव होता है। वे अपने सेव्य श्रीकृष्णके भजनमें नित्य लगे रहते हैं, इसलिये उन्हें सर्वत्र श्रीकृष्णके और कार्ष्ण अर्थात् सभी श्रीकृष्णके प्रिय हैं, ऐसे दर्शन होते हैं। इसके फलस्वरूप सभी उनको अपनी प्रीतिका पात्र अथवा आत्मीय मानते हैं, इसलिये उनमें परस्परमें प्रीतिका अभाव अथवा हिंसाका अवकाश (स्थान) नहीं है। झारिखण्डके मार्गमें महाप्रभुकी भी सदा महाभागवतोचित 'व्रजमें श्रीकृष्णको ढूँढ़नेकी चेष्टा' लक्षित हुई थी ॥ 26 ॥ देखि' भट्टाचार्येर मने हय महाभय। प्रभुर प्रतापे तारा एक पाश हय ॥ 27 ॥ एकदिन पथे व्याघ्र करियाछे शयन। आवेशे तार गाये प्रभुर लागिल चरण ॥ 28 ॥ प्रभु कहे,—कह 'कृष्ण', व्याघ्र उठिल। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र नाचिते लागिल ॥ 29 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको बाघादि पशुओंके बीचसे जाते देखकर बलभद्र भट्टाचार्य बहुत डर गये, किन्तु महाप्रभुके प्रतापसे वे सब पशु एक ओर हो जाते थे। एकदिन मार्गमें एक बाघ सोया हुआ था, आवेशमें चलते हुए महाप्रभुका चरण उसके शरीरमें लग गया। महाप्रभुने बाघसे कहा,—'कृष्ण' बोलो। तभी वह बाघ उठकर 'कृष्ण', 'कृष्ण' कहकर नाचने लगा ॥ 27-29 ॥ आर दिने महाप्रभु करे नदीस्नान। मत्तहस्तीयूथ आइल करिते जलपान ॥ 30 ॥ प्रभु जले कृत्य करे, आगे हस्ती आइला। 'कृष्ण कह' बलि' प्रभु जल फेलि' मारिला ॥ 31 ॥ अनुवाद—किसी अन्य दिन महाप्रभु नदीमें स्नान कर रहे थे। उस समय मतवाले हाथियोंका दल वहाँ पानी पानेके लिये आया। महाप्रभु जलमें मन्त्र-जपादि कृत्य कर रहे थे, तभी हाथी उनके आगे आ गये। 'कृष्ण कहो' कहकर महाप्रभुने उनपर पानीका छींटा मारा ॥ 30-31 ॥ अनुभाष्य—'कृत्य'—स्नान एवं मन्त्रजप-स्मरणादि ॥ 31 ॥ सेइ जलबिन्दु-कणा लागे यार गाय। सेइ 'कृष्ण' 'कृष्ण' करे, प्रेमे नाचे, गाय ॥ 32 ॥ 96 ।

सतरहवाँ अध्याय 17/32-39 ] केह भूमे पड़े, केह करये चित्कार। देखि' भट्टाचार्येर मने हय चमत्कार ॥ 33 ॥ अनुवाद—उस पानीकी एक बूँदका कण भी जिसके शरीरसे स्पर्श किया, वही 'कृष्ण', 'कृष्ण' कहने लगा और प्रेममें नाचने तथा गाने लगा। कोई भूमिपर गिर पड़ा, कोई आवेशमें चीत्कार करने लगा। यह सब देखकर भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये॥ 32-33 ॥ पथे याइते करे प्रभु उच्च सङ्कीर्त्तन। मधुर कण्ठध्वनि शुनि' आइसे मृगीगण ॥ 34 ॥ डाहिने-वामे ध्वनि शुनि' याय प्रभु-सङ्गे। प्रभु तार अङ्ग मुछे, श्लोक पड़े रङ्गे ॥ 35 ॥ अनुवाद—कभी मार्गमें चलते हुए महाप्रभु उच्च-स्वरसे कीर्तन कर रहे थे, उनके कण्ठकी मधुर ध्वनिको सुनकर हिरणियाँ उनके निकट आने लगीं। कीर्तनकी ध्वनिको सुनते-सुनते हिरणियाँ महाप्रभुके दाहिनी और बायीं और उनके साथ-साथ चलने लगीं। महाप्रभुने उनके अङ्गोंको सहलाते हुए कुतूहलसे एक श्लोक पढ़ा॥ 34-35 ॥ श्रीमद्भागवत (10/21/11)में :— धन्याः स्म मूढ़मतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥ 36 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये मूढ़ मतिवाली सभी हिरणियाँ ही धन्य हैं, क्योंकि उन्होंने विचित्र-वेशवाले नन्दनन्दनको प्राप्त करके और उनके वेणुकी ध्वनिको सुनकर कृष्णसारोंके (अपने पति हिरणोंके) साथ प्रणयरूपी अवलोकनके (प्रेम भरी चितवनके) द्वारा उनकी पूजा की थी॥ 36 ॥ अनुभाष्य—शरत्काल आनेपर श्रीकृष्णने वन-वनमें वेणुको बजाते हुए भ्रमण करना आरम्भ किया, उनकी वेणुध्वनिको श्रवण करके श्रीकृष्णसङ्ग-कामसे व्याकुल होकर गोपियोंका गीत— हे सखि, मूढ़मतयः (मूढ़ा विवेकहीना मतिः यासां तथाभूताः) अपि (त्रियग्जातयोऽपि) एताः हरिण्यः (मृग्यः) धन्याः (कृतार्थाः सन्ति) स्म, —याः (हरिण्यः) वेणुरणितं (वेणुनादम्) आकर्ण्य (श्रुत्वा) सहकृष्णसाराः (कृष्णसारैर्मृगैः स्वपतिभिः सहिताः एव) उपात्तविचित्रवेशम् (उपात्ताः स्वीकृताः विचित्राः वेशाः वनमाला-बर्हापीडा-गुञ्जावतंसादिरूपाः येन् तं) नन्दनन्दनं [प्रति] प्रणयावलोकैः (प्रणयसहितैः अवलोकनैः) विरचितां (भूषितां) पूजां दधुः (कृतवत्यः)। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि ! पशु होते हुए भी विवेकहीन मतिवाली ये हिरणियाँ धन्य हैं। इन्होंने वेणुनादसे आकृष्ट होकर अपने पतियोंके सहित विचित्र वेशधारी [वनमाला, मोरपंख, गुञ्जा-कुण्डलादिधारी] श्रीनन्दनन्दनकी प्रणय अवलोकनके द्वारा पूजा की॥ 36 ॥ हेनकाले व्याघ्र तथा आइल पाँच-सात। व्याघ्र-मृगी मिलि' चले महाप्रभुर साथ ॥ 37 ॥ देखि' महाप्रभुर 'वृन्दावन'-स्मृति हैल। वृन्दावन-गुण-वर्णन श्लोक पड़िल ॥ 38 ॥ अनुवाद—इतनेमें ही पाँच-सात बाघ भी वहाँ आ गये। बाघ और हिरणियाँ एक साथ मिलकर महाप्रभुके साथ चलने लगे। बाघ और हिरणियोंको एकसाथ चलते देखकर महाप्रभुको वृन्दावनकी स्मृति हो आयी। तब उन्होंने श्रीवृन्दावनके गुणोंका वर्णन करते हुए एक श्लोक पढ़ा ॥ 37-38 ॥ वृन्दावनमें अद्वयज्ञानका विरोधी भाव नहीं :— (श्रीमद्भागवत 10/13/60)में— यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् नृ-मृगादयः। मित्राणीवाजितावास-द्रुत-रुट्-तर्षणादिकम् ॥ 39 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 39 ॥ 97