श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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सतरहवाँ अध्याय 17/13-22 ] एकको साथमें ले जानेसे दूसरोंके मनमें दुःख होगा। मेरे साथ जानेके लिये कोई नया व्यक्ति चाहिये जिसका मन प्रीतियुक्त हो। यदि ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाय, तो मैं उस एक व्यक्तिको अपने साथ ले जा सकता हूँ॥”13-14 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहलेके जैसे मेरे साथ काला-कृष्णदास आदिके जानेका कोई प्रयोजन नहीं है; परन्तु स्निग्ध (प्रेमवान्) हृदयवाले किसी नये सङ्गीको अपने साथ ले जा सकता हूँ॥ 14 ॥ श्रीस्वरूपका बलभद्र भट्ट और उसके एक साथी और दास-ब्राह्मणका चयन और सङ्ग ले जानेकी प्रार्थना :— स्वरूप कहे, - 'एइ बलभद्र-भट्टाचार्य। तोमाते सुस्निग्ध बड़, पण्डित, साधु, आर्य ॥ 15 ॥ महाप्रभुके सङ्गसे कर्मबुद्धिप्रबल सरल ब्राह्मणको आत्मसंशोधनका सुयोग-प्रदान :— प्रथमेइ तोमा-सङ्गे आइला गौड़ हैते। इँहार इच्छा आछे 'सर्वतीर्थ' करिते ॥ 16 ॥ बलभद्र और उसके सङ्गी ब्राह्मणके कार्योंका निर्देश :— इँहार सङ्गे आछे विप्र एक 'भृत्य' । इँहो पथे करिबेन सेवा-भिक्षा-कृत्य ॥ 17 ॥ इँहारे सङ्गे लह यदि, सबार हय 'सुख' । वन-पथे याइते तोमार कोन नाइ 'दुःख' ॥ 18 ॥ सेइ विप्र वहि' निबे वस्त्राम्बुभाजन। भट्टाचार्य भिक्षा दिबे करि' भिक्षाटन ॥"19 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, - “ये बलभद्र भट्टाचार्य हैं। ये पण्डित, साधु और भक्त हैं। आपके प्रति इनकी बहुत प्रीति है। पहले ही ये आपके साथ बङ्गालसे आये हैं और सभी तीर्थोंमें भ्रमण करनेकी इनकी इच्छा भी है। इनके साथ एक और ब्राह्मणको भी ले जाइये, वह मार्गमें सेवा और भिक्षा आदि कार्य करेगा। यदि आप इन दोनोंको अपने साथ ले जाँय तो सभीको प्रसन्नता होगी और आपको भी वनके मार्गसे जाते हुए किसी प्रकारका कोई कष्ट नहीं होगा। वह ब्राह्मण वस्त्र और जलपात्रको उठाकर चलेगा और ये भट्टाचार्य भिक्षा माँगकर आपको भोजन करायेंगे ॥" 15-19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'वस्त्राम्बुजभाजन'—वस्त्र और जलपात्र ॥ 19 ॥ अनुभाष्य — 'स्निग्ध' - (भाः 1/1/8)—“ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत” [जो शिष्य स्निग्ध-स्वभावका होता है, वह गुरुकी प्रीतिका पात्र होता है और ऐसे स्निग्ध शिष्यके निकट ही गुरुजन अति निगूढ़ रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं], इस श्लोकमें 'स्निग्धस्य'-शब्दकी टीकामें श्रीधरस्वामिपादने 'प्रेमवतः' (प्रेमिक) लिखा है ॥ 14-15 ॥ महाप्रभुकी स्वीकृति :— ताँहार वचन प्रभु अङ्गीकार कैल। बलभद्र-भट्टाचार्ये सङ्गे करि' निल ॥ 20 ॥ रात्रिमें श्रीजगन्नाथसे आज्ञा ग्रहण, रात्रिके अन्तमें गुप्त रूपसे वृन्दावन-यात्रा :— पूर्वरात्र्ये जगन्नाथ देखि' 'आज्ञा' लञा। शेष-रात्र्ये उठि' प्रभु चलिला लुकाञा ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरकी प्रार्थनाको स्वीकार करके बलभद्र भट्टाचार्यको अपने साथ ले लिया। एक रात्रि पूर्व महाप्रभुने श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके बाद उनसे वृन्दावन जानेकी आज्ञा ले ली और रात्रिके अन्तिम प्रहरमें उठकर महाप्रभु छिपकर वहाँसे चल दिये ॥ 20-21 ॥ प्रातःकालमें विरह-व्याकुल भक्तोंका महाप्रभुको ढूँढ़ना :— प्रातःकाले भक्तगण प्रभु ना देखिया। अन्वेषण करि' फिरे व्याकुल हञा ॥ 22 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें जब भक्तोंने महाप्रभुको वहाँ नहीं देखा, तब वे व्याकुल होकर उन्हें इधर-उधर ढूँढ़ने लगे ॥ 22 ॥ । 95