भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1542, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1542

[ 17/23–32 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीस्वरूपके द्वारा भक्तोंको मना करना और भक्तोंका रुकना :- स्वरूप-गोसाञि सबाय कैल निवारण। निवृत्त हञा रहे सबे, जानि' प्रभुर मन ॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने उन्हें ऐसा करनेके लिये मना किया। सभी भक्त महाप्रभुकी इच्छा जानकर शान्त हो गये ॥ 23 ॥ महाप्रभुके वनके मार्गसे जानेका वर्णन; महाप्रभुकी कृपासे पशु-पक्षियोंका भी उद्धार और श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- प्रसिद्ध पथ छाड़ि' प्रभु उपपथे चलिला। 'कटक' दाहिने करि' वने प्रवेशिला ॥ 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रसिद्ध राजमार्गको छोड़कर उपपथपर चल पड़े। उन्होंने कटकको अपनी दाहिनी ओर रखकर वनमें प्रवेश किया ॥ 24 ॥ निर्जन-वने चले प्रभु कृष्णनाम लञा। हस्ती-व्याघ्र पथ छाड़े प्रभुरे देखिया ॥ 25 ॥ पाले-पाले व्याघ्र, हस्ती, गण्डार, शूकरगण। तार मध्ये आवेशे प्रभु करिला गमन ॥ 26 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभु निर्जन वनमें श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हुए जा रहे थे, तब हाथियों और बाघोंने उन्हें देखकर रास्ता दे दिया। बाघ, हाथी, गैंडे और जंगली सुअरोंके झुण्डके झुण्ड वहाँ आ गये तथा महाप्रभु आवेशमें उनके बीचमेंसे निकलकर जा रहे थे॥ 25-26 ॥ अनुभाष्य—महाभागवतमें अद्वयज्ञानकी उपलब्धिके कारण द्वितीयाभिनिवेश (अपनी देहमें अभिनिवेश) और उससे उत्पन्न भय अथवा हिंसाका अभाव होता है। वे अपने सेव्य श्रीकृष्णके भजनमें नित्य लगे रहते हैं, इसलिये उन्हें सर्वत्र श्रीकृष्णके और कार्ष्ण अर्थात् सभी श्रीकृष्णके प्रिय हैं, ऐसे दर्शन होते हैं। इसके फलस्वरूप सभी उनको अपनी प्रीतिका पात्र अथवा आत्मीय मानते हैं, इसलिये उनमें परस्परमें प्रीतिका अभाव अथवा हिंसाका अवकाश (स्थान) नहीं है। झारिखण्डके मार्गमें महाप्रभुकी भी सदा महाभागवतोचित 'व्रजमें श्रीकृष्णको ढूँढ़नेकी चेष्टा' लक्षित हुई थी ॥ 26 ॥ देखि' भट्टाचार्येर मने हय महाभय। प्रभुर प्रतापे तारा एक पाश हय ॥ 27 ॥ एकदिन पथे व्याघ्र करियाछे शयन। आवेशे तार गाये प्रभुर लागिल चरण ॥ 28 ॥ प्रभु कहे,—कह 'कृष्ण', व्याघ्र उठिल। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र नाचिते लागिल ॥ 29 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको बाघादि पशुओंके बीचसे जाते देखकर बलभद्र भट्टाचार्य बहुत डर गये, किन्तु महाप्रभुके प्रतापसे वे सब पशु एक ओर हो जाते थे। एकदिन मार्गमें एक बाघ सोया हुआ था, आवेशमें चलते हुए महाप्रभुका चरण उसके शरीरमें लग गया। महाप्रभुने बाघसे कहा,—'कृष्ण' बोलो। तभी वह बाघ उठकर 'कृष्ण', 'कृष्ण' कहकर नाचने लगा ॥ 27-29 ॥ आर दिने महाप्रभु करे नदीस्नान। मत्तहस्तीयूथ आइल करिते जलपान ॥ 30 ॥ प्रभु जले कृत्य करे, आगे हस्ती आइला। 'कृष्ण कह' बलि' प्रभु जल फेलि' मारिला ॥ 31 ॥ अनुवाद—किसी अन्य दिन महाप्रभु नदीमें स्नान कर रहे थे। उस समय मतवाले हाथियोंका दल वहाँ पानी पानेके लिये आया। महाप्रभु जलमें मन्त्र-जपादि कृत्य कर रहे थे, तभी हाथी उनके आगे आ गये। 'कृष्ण कहो' कहकर महाप्रभुने उनपर पानीका छींटा मारा ॥ 30-31 ॥ अनुभाष्य—'कृत्य'—स्नान एवं मन्त्रजप-स्मरणादि ॥ 31 ॥ सेइ जलबिन्दु-कणा लागे यार गाय। सेइ 'कृष्ण' 'कृष्ण' करे, प्रेमे नाचे, गाय ॥ 32 ॥ 96 ।