भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1540

[ 17/3-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला शरत्कालमें जानेके इच्छुक महाप्रभुका श्रीस्वरूप-रायके साथ परामर्श :- शरत्काल हैल, प्रभुर चलिते हैल मति। रामानन्द-स्वरूप-सङ्गे निभृते युकति ॥ ३॥ "मोर सहाय करि यदि, तुमि दुइ जन। तबे आमि यात्रा देखि श्रीवृन्दावन ॥ ४ ॥ दूसरे किसीको साथ नहीं ले जानेकी इच्छा :- रात्र्ये उठि' वनपथे पलाञा याब। एकाकी याइब, काहाँ सङ्गे ना लइब ॥ ५ ॥ केह यदि सङ्ग लइते पाछे उठि' धाय। सबारे राखिबा, येन केह नाहि याय ॥ ६ ॥ भगवान्‌की भक्तोंसे उनकी कृपाकी याचना :- प्रसन्न हञा आज्ञा दिबा, ना मानिबा 'दुःख'। तोमा-सबार 'सुखे', पथेstr हबे मोर 'सुख' ॥ ७॥ अनुवाद-शरत् ऋतुके आनेपर महाप्रभुने वृन्दावन जानेका निर्णय किया। उन्होंने श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदरके साथ एकान्तमें बैठकर परामर्श किया, - "तुम दोनों यदि मेरी सहायता करो, तभी मैं जाकर श्रीवृन्दावनका दर्शन कर सकता हूँ। मैं प्रातःकाल होनेसे पहले ही रात्रिमें उठकर वनके मार्गसे यहाँसे शीघ्रतासे चला जाऊँगा। मैं अकेला ही जाऊँगा, किसीको भी अपने साथ नहीं लूँगा। यदि कोई मेरे साथ चलनेके लिये मेरे पीछे-पीछे दौड़ने लगे, तब तुम दोनों उन्हें रोक लेना, जिससे कोई मेरे पीछे नहीं आ पाये। तुम मुझे प्रसन्न होकर आज्ञा देना, मनमें दुःख नहीं करना। तुम सबके सुखी होनेसे मेरी यात्रा सुखमय होगी ॥" 3-7 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरायका महाप्रभुसे निवेदन :- दुइजन कहे, - "तुमि ईश्वर 'स्वतन्त्र'। येइ इच्छा, सेइ करिबा, नह 'परतन्त्र' ॥ ४ ॥ भक्तोंके सुखमें ही भगवान्‌की प्रसन्नता :- किन्तु आमा-दुँहार शुन एक निवेदने। 'तोमार सुखे आमार सुख' - कहिला आपने ॥ ९ ॥ भगवान्‌की प्रसन्नतामें ही भक्तका सुख :- आमा-दुँहार मने तबे बड़ 'सुख' हय। एक निवेदन यदि धर, दयामय ॥ 10 ॥ एक वैष्णव-ब्राह्मणको साथमें ले जानेकी प्रार्थना :- 'उत्तम ब्राह्मण' एक सङ्गे अवश्य चाहि। भिक्षा करि' भिक्षा दिबे, याबे पात्र वहि' ॥ 11 ॥ वनपथे याइते नाहि 'भोज्यान्न'-ब्राह्मण। आज्ञा कर,-सङ्गे चलुक विप्र एकजने ॥ "12॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दने कहा,- "आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आपकी जैसी इच्छा होगी, आप वैसा ही करेंगे, आप किसीके अधीन नहीं हैं। किन्तु हम दोनोंका एक निवेदन सुनिये। आपने स्वयं ही अभी कहा है कि 'तुम्हारी प्रसन्नतामें ही मेरी प्रसन्नता है', इसलिये हे दयामय ! हम दोनोंके मनमें तभी बहुत सुख होगा, जब आप हमारा एक निवेदन मानेंगे। आपके साथ एक उत्तम वैष्णव ब्राह्मणको अवश्य ही जाना चाहिये जो भिक्षा माँगकर आपको भोजन कराये और आपका पात्रादि उठाकर चले। वनके मार्गमें जाते समय आपको ऐसा ब्राह्मण नहीं मिलेगा, जिसके अन्नका भोजन करनेमें दोष नहीं हो। आप आज्ञा दीजिये कि आपके साथ एक ब्राह्मण भी जाय ॥" 8-12 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भोज्यान्न ब्राह्मण' - जिसका अन्न भोज्य है अर्थात् जिसके अन्नका भोजन करनेमें कोई दोष नहीं है, ऐसा ब्राह्मण ॥ 12 ॥ महाप्रभुकी अपने किसी परिकरको साथमें लेनेकी अनिच्छा, मनके अनुसार सङ्गीके लक्षण-निर्देश :- प्रभु कहे,-"निज-सङ्गी काँहो ना लइब। एकजने निले, आनेर मने दुःख हइब ॥ 13 ॥ नूतन सङ्गी हइबेक, - स्निग्ध याँर मन। ऐछे यबे पाइ, तबे लइ 'एक' जन ॥" 14 ॥ अनुवाद - महाप्रभुने कहा, - "मैं अपने सङ्गी भक्तोंमेंसे किसीको भी अपने साथ लेकर नहीं जाऊँगा, क्योंकि 94 |