भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1539, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1539

सत्रहवाँ अध्याय कथासार—उस वर्ष श्रीक्षेत्रमें रथयात्रा देखकर महाप्रभुने वृन्दावन जानेका निश्चय किया। श्रीरामानन्द और श्रीस्वरूपने बलभद्र भट्टाचार्य और उनके साथी (सेवक) एक ब्राह्मणको साथमें भेजा। महाप्रभु प्रातःकाल होनेसे पहले ही रात्रिमें कटककी ओर चले। कटक पहुँचनेसे पहले ही कटकको दक्षिणमें रखकर अर्थात् कटकके उत्तरसे ही वे निर्जन वनपथसे चल दिये। वनपथमें बाघ-हाथी आदिको प्रेममें श्रीकृष्णनामका गान कराया। जहाँपर भी ग्राम मिलता, वहाँ भिक्षा करके चावल-सब्जियाँ एकत्रित कर लेते। जहाँ कोई गाँव नहीं होता, वहाँ पहलेसे ही एकत्रित चावलमेंसे बचे हुए चावलको पकाते और वनसे कुछ साग आदि संग्रह करके उसे चावलके साथ खानेके लिये पका लेते। बलभद्र भट्टाचार्यके मधुर व्यवहारसे महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार झारिखण्डके वनपथपर चलते हुए महाप्रभु वाराणसी धाम पहुँचे। मणिकर्णिका घाटपर स्नान करते समय महाप्रभुकी श्रीतपनमिश्रके साथ भेंट हुई। महाप्रभुको अपने घर ले जाकर उन्होंने बड़े आदरपूर्वक उन्हें रहनेके लिये एक सुविधाजनक स्थान दिया। महाप्रभुके पूर्व परिचित भक्त वैद्य-श्रीचन्द्रशेखर वाराणसीमें महाप्रभुकी सेवा करने लगे। एक महाराष्ट्र व्यवहारको देखकर जब संन्यासियोंमें प्रधान प्रकाशानन्द सरस्वतीको उनके विषयमें बतलाया, तब उसने महाप्रभुकी बहुत निन्दा की। वह ब्राह्मण उस बातसे दुःखी होकर महाप्रभुके पास आया और उसने महाप्रभुको वह बात बतलायी। और उसने महाप्रभुसे एक बात पूछी कि प्रकाशानन्द आदि संन्यासियोंके मुखमें 'श्रीकृष्णनाम'के नहीं आनेका क्या कारण है? महाप्रभुने उसके उत्तरमें मायावादको 'अपराध' कहकर निर्णय दिया और मायावादियोंका सङ्ग करनेसे मना करके उसपर कृपा की। (इसके बाद महाप्रभु) काशीसे प्रयागके रास्ते मथुरा पहुँचे। वहाँ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य सनोड़िया-ब्राह्मणके घरमें उसपर कृपा करके भिक्षा की। बादमें श्रीवृन्दावनके द्वादश-वनोंमें महाप्रेममें डूबे महाप्रभु शारी और शुक (मैना तथा तोता)की वार्ताको श्रवण करते हुए भ्रमण करने लगे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) वृन्दावनके पथपर जाते समय पशु-पक्षियोंको श्रीकृष्ण-प्रेम प्रदान करनेवाले श्रीकृष्णचैतन्य :- गच्छन् वृन्दावनं गौरो व्याघ्रेभैणखगान् वने। प्रेमोन्मत्तान् सहोन्नृत्यान् विदधे कृष्णजल्पिनः ॥ १ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरचन्द्रने वृन्दावन जाते हुए (मार्गेमें स्थित) वनमें बाघ, हाथी, हिरण और पक्षियोंको श्रीकृष्ण-नामके उच्चारणसे प्रेमोन्मत्त करते हुए नृत्य करवाया था॥ 1 ॥ अनुभाष्य— गौरः वृन्दावनं गच्छन् (गन्तुः बहिर्गतः सन्) वने (झारि-खण्डारण्यपथे) व्याघ्रेभैणखगान् (व्याघ्रगजमृग-पक्ष्यादीन्) प्रेमोन्मत्तान् (कृष्णप्रेमाविष्टान्) सह-उन्नृत्यान् (गौरेण सह उद्धण्डनृत्यपरान्) कृष्णजल्पिनः (कृष्णकृष्णेत्युच्चारिणः) विदधे (कारितवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ । 93

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1539, कुल 2549 में से · BharatKosha