श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 16/275-283 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थानपर छोड़कर आया हूँ, मेरे साथ लगभग पाँच-छः भक्त ही आये हैं। अब तो आप सब मुझसे प्रसन्न होंगे, इसलिये अब मैं निर्विघ्न कैसे वृन्दावन जाऊँ, आप सभी मिलकर मुझे परामर्श दीजिये। मैं गदाधर पण्डितको यहाँ छोड़कर गया था, इससे इन्हें बहुत दुःख हुआ। इसी कारण मैं वृन्दावन नहीं जा पाया॥" 275-278 ॥ महाप्रभुके प्रति दाक्षिण्य-भावसे युक्त श्रीगदाधरकी सदैन्य-प्रेमोक्ति :- तबे गदाधर-पण्डित प्रेमाविष्ट हञा। प्रभु-पद धरि' कहे विनय करिया॥ 279 ॥ जिस स्थानपर महाप्रभु, वह स्थान ही वृन्दावन, वृन्दावनके अतिरिक्त श्रीकृष्णकी मधुरलीला नहीं :- “तुमि याँहा-याँहा रह, ताँहा 'वृन्दावन' । ताँहा यमुना, गङ्गा, सर्वतीर्थगण ॥ 280 ॥ लोकशिक्षाके लिये ही महाप्रभुका वृन्दावनमें गमन :- तबु वृन्दावन याह' लोक शिखाइते। सेइ त' करिबे, तोमार येइ लय चित्ते ॥ 281 ॥ वर्षाके चार मास पुरीमें रहनेका अनुरोध :- एइ आगे आइला, प्रभु, वर्षार चारिमास । एइ चारि मास कर नीलाचले वास ॥ 282 ॥ बादमें स्वतन्त्र महाप्रभु अपनी इच्छासे जाँय, इसमें भक्तोंको कोई आपत्ति नहीं :- पाछे सेइ आचरिबा, येइ तोमार मन। आपन-इच्छाय चल, रह, -के करे वारण॥" 283 ॥ अनुवाद-तब श्रीगदाधर पण्डितने प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर नम्रतापूर्वक कहा,-"आप जहाँ-जहाँ रहते हैं, वहीं वृन्दावन है। वहींपर ही यमुना, गङ्गा और सभी तीर्थ रहते हैं। तो भी आप लोकशिक्षाके लिये वृन्दावन जाते हैं। अन्यथा आप तो वही करेंगे, जो आपके मनमें होगा। अभी वर्षाके चार मास (चातुर्मास्य) आनेवाले हैं, इसलिये हमारी प्रार्थना है कि आप ये चार मास नीलाचलमें ही वास कीजिये। बादमें जैसा आपका मन करे, वैसा ही कीजियेगा। आप अपनी इच्छासे चाहे जाँय अथवा रहें, आपको कोई रोक नहीं सकता॥" 279-283 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुने इससे पहले ही रथके आगे नृत्य करते समय अपने भक्तोंके सामने अपने भावोंको प्रकाशित किया था। श्रीमहाप्रभुका हृदय ही श्रीराधाकान्तकी लीलाभूमि वृन्दावन है; तथापि लोक-शिक्षाके लिये उन्होंने जगत्में प्रकाशित भौम-वृन्दावनकी ओर गमन किया। प्राकृत-दृष्टिसे युक्त विषय भोगोंमें मत्त साधारण लोगोंकी धारणा यह है कि भौम-वृन्दावन अप्राकृत नहीं है। यह भोगरत इन्द्रियोंके भोगोंके लिये अन्य जड़ीय स्थानोंकी भाँति ही एक विशेष स्थान है। जिस प्रकार अन्यान्य जड़ वस्तुओंके सङ्गके प्रभावसे जड़ीय भाव उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार वृन्दावनको इन्द्रिय-भोग्य मानकर अथवा जड़-बुद्धिसे उसके दर्शन करनेपर, किसी पारमार्थिक नित्य मङ्गल अर्थात् अद्वयज्ञान- श्रीकृष्णकी सेवा नहीं होती। यह बात श्रीमहाप्रभुके वाक्य "मोर मन-वृन्दावन" और श्रीभागवतके 'आहुश्च ते' पद्यके द्वारा प्रमाणित हुई है। (भाः 10/84/8)- “यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः। यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचि- ज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥" [अर्थात् "जो मनुष्य त्रिधातुओं (कफ-वात-पित्त) से बने जड़ शरीरमें आत्मबुद्धि, स्त्री-पुत्रादिमें ममत्वबुद्धि, जन्मभूमिमें पूजनीयबुद्धि तथा जलादिमें तीर्थबुद्धि रखता है-किन्तु इन समस्त बुद्धिके मध्य किसी प्रकारकी बुद्धि भगवद्भक्तोंमें नहीं हो, तो वह गाय आदि (घास चरनेवाले) पशुओंमें भी गधा ही है।"] वास्तवमें मायाबद्ध जीवोंको शिक्षा देनेके लिये ही महाप्रभुने भगवान्के अप्राकृत लीलास्थल वृन्दावन-गमन तथा दर्शन आदिकी लीलाका आचरण किया था। बद्धजीव यदि यह भूलकर वृन्दावनको भी प्रपञ्चका एक 'विषयभोगक्षेत्र' माने, तब वह महाप्रभुकी शिक्षाके विरुद्ध होगा। शुद्ध-भागवतगणोंके भाव अथवा धारणा 88 ।