भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1535

सोलहवाँ अध्याय 16/280-288 ] यह है कि भौम-वृन्दावन चिन्मय वृन्दावनसे अभिन्न है। प्राकृत-सहजिया स्वयंको 'व्रजवासी' अथवा 'धामवासी' कहकर अभिमान अथवा प्रचार करके भी वास्तवमें चिन्मय वृन्दावनवासके स्थानपर अपने इन्द्रिय-तर्पणक्षेत्र घोर संसारमें ही वास करके जञ्जालकी वृद्धि करते हैं। श्रीदामोदर स्वरूप नित्य व्रजवासी होनेपर भी उनके चरित्रमें भौम-वृन्दावनमें जानेका प्रसङ्ग नहीं सुना जाता; श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवास पण्डित, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीरामानन्द राय, श्रीशिखि माहाति, श्रीमाधवी देवी, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी आदिकी भी वैसी यात्रा किसी ग्रन्थमें वर्णित नहीं है। परन्तु शुद्धभक्तिहीन बहुतसे प्राकृत-सहजिया, कर्मी, ज्ञानी या अन्याभिलाषी व्यक्तियोंके भी भौम-वृन्दावनमें वास, दर्शन अथवा गमनादिका प्रसङ्ग साधारण लोगोंके मुखसे सुना जाता है। भक्तिहीन लोगोंको श्रीधाममें वास स्वर्ग, मुक्ति अथवा पाप-पुण्य-वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले फल ही प्रदान करता है। “प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्ति-विलोचनेन”- श्लोकका अभिप्रेत दिव्य-निर्मल-नेत्रयुक्त शुद्धभक्तोंका ही अप्राकृत श्रीधाम वृन्दावनमें वास-यथार्थ और सत्य है। महाप्रभुके परवर्ती कालमें खेतरि-ग्राममें ठाकुर नरोत्तम, याजिग्राममें श्रीनिवासाचार्य और उनके बादके समयमें गौड़देशमें श्रीजगन्नाथदास बाबाजी महाराज, कालनामें श्रीभगवान-दास, नवद्वीपधाममें श्रीमद् गौरकिशोर दास बाबाजी महाराज, कलिकातामें श्रीश्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर आदि श्रीनाममें एकनिष्ठ भक्तोंने अवश्य ही श्रीवृन्दावनके अतिरिक्त अन्य किसी धाममें कभी भी वास नहीं किया॥ 280-281॥ सोलहवें अध्यायके अनुभाष्यका अनुवाद समाप्त। सभी भक्तोंकी यही प्रार्थना :- शुनि' सब भक्त कहे प्रभुर चरणे। “सबाकार इच्छा पण्डित कैल निवेदने॥” 284॥ अनुवाद-यह बात सुनकर महाप्रभुके चरणोंमें बैठे हुए सभी भक्तोंने कहा,—“श्रीगदाधर पण्डितने हम सबकी इच्छाको ही व्यक्त किया है॥” 284॥ सभीकी इच्छानुसार महाप्रभुका चार मास पुरीमें रहना :- सबार इच्छाय प्रभु चारि मास रहिला। शुनिय़ा प्रतापरुद्र आनन्दित हैला॥ 285॥ अनुवाद-सभी भक्तोंकी इच्छा जानकर महाप्रभु चार मास नीलाचलमें रहनेके लिये सहमत हो गये। यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र बहुत आनन्दित हुए॥ 285॥ टोटामें अपने घरमें पण्डितका महाप्रभुको भिक्षा-दान :- सेइ दिन गदाधर कैल निमन्त्रण। ताँहा भिक्षा कैल प्रभु लञा भक्तगण॥ 286॥ अनुवाद-उस दिन श्रीगदाधर पण्डितने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथ लेकर वहींपर भिक्षा ग्रहण की॥ 286॥ श्रीगदाधरका प्रेम और महाप्रभुकी उनके प्रति वश्यता-मर्त्य जीवोंके लिये अचिन्त्य :- भिक्षाते पण्डितेर स्नेह, प्रभुर आस्वादन। मनुष्येर शक्त्ये दुइ ना याय वर्णन॥ 287॥ एइमत गौरलीला अनन्त, अपार। संक्षेपे कहिये, कथन ना याय विस्तार॥ 288॥ अनुवाद-साधारण मनुष्यमें ऐसा सामर्थ्य नहीं है कि वह श्रीगदाधर पण्डितके भोजन करानेमें उनके स्नेहका और महाप्रभुके द्वारा उसके आस्वादनका वर्णन कर सके। इस प्रकार श्रीगौरलीला अनन्त और अपार है। मैं किसी प्रकारसे उसका संक्षेपमें ही वर्णन कर रहा हूँ। विस्तृत रूपसे कोई भी उसका वर्णन नहीं कर सकता॥ 287-288॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीगदाधर पण्डितके निकट महाप्रभुके भिक्षा ग्रहण करनेके समय श्रीगदाधर पण्डितका जो स्नेह है और महाप्रभु जो उस स्नेहयुक्त प्रसाद- अन्नका आस्वादन करते हैं, -ये दोनों विषय ही । 89