श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1544, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/39–47 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस स्थानपर मनुष्य-बाघादि स्वभाववशतः परस्पर विरुद्ध चेष्टावाले होनेपर भी मित्रभावसे एक स्थानपर वास करते हैं और श्रीकृष्णके आराम (नित्यविहार) स्थान होनेके कारण क्रोध-तृष्णादि जिस धामको परित्याग करके पलायन कर गये थे, (ब्रह्मा उस अप्राकृत वृन्दावनधामको देख सके) ॥ ३९ ॥
अणुभाष्य—व्रजके बछड़ों और गोपालबालकोंका हरण करनेके त्रुटीकालके बाद ब्रह्मा पुनः व्रजमें ही परम-ऐश्वर्यसे युक्त बछड़ों तथा गोपालबालकोंको श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ामें रत देखकर श्रीकृष्णकी मायासे अत्यन्त मुग्ध हो गये। बादमें श्रीकृष्णके द्वारा कृपापूर्वक अपने मायारूपी पर्देको उठा लेनेपर ब्रह्माने सोकर उठे व्यक्तिकी भाँति चारों ओर दृष्टिपात करते ही महा-ऐश्वर्यमय श्रीवृन्दावनके दर्शन किये—
यत्र नैसर्गिकवैराः (स्वाभाविकाऽप्रतिकार्य-वैरवन्तोऽपि) नृ-मृगादयः (नराः सिंहादयः) मित्राणि इव सह आसन् (मिथः स्थितवन्तः), [तथाभूतम्] अजितावास-द्रुत-रुत्तर्षणादिकम् (अजितस्य श्रीकृष्णस्य आवासः सदावस्थानं तेन निजमहिम्ना द्रुतं पलायितं रुत्तर्षणादिकं क्रोधलोभतृष्णादयः यस्मात् तथाभूतं—वृन्दावनमपश्यदिति पूर्वेणान्वयः) ।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३९ ॥
'कृष्ण' 'कृष्ण' कह, करि' प्रभु यबे बलिल। 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र-मृग नाचिते लागिल॥ ४० ॥
नाचे, कान्दे व्याघ्रगण मृगीगण-सङ्गे। बलभद्र भट्टाचार्य देखे अपूर्व-रङ्गे॥ ४१ ॥
व्याघ्र-मृग अन्योन्ये करे आलिङ्गन। मुखे मुख दिया करे अन्योन्ये चुम्बन॥ ४२ ॥
अनुवाद—जब महाप्रभुने उन बाघों और हिरणियोंको 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलनेके लिये कहा, तब वे 'कृष्ण' नामका उच्चारण करके नृत्य करने लगे। बाघ हिरणियोंके साथ नृत्य और क्रन्दन करने लगे। बलभद्र भट्टाचार्य इस अपूर्व दृश्यको आनन्दपूर्वक देखने लगे। बाघ और हिरणियाँ एक-दूसरेका आलिङ्गन करने लगे तथा मुखसे मुखको मिलाकर एक-दूसरेका चुम्बन करने लगे॥ ४०-४२ ॥
कौतुक देखिया प्रभु हासिते लागिला। ता-सबाके ताँहा छाड़ि' आगे चलि' गेला॥ ४३ ॥
अनुवाद—इस कौतुकको देखकर महाप्रभु हँसने लगे। फिर उन सबको वहीं छोड़कर महाप्रभु आगे बढ़ गये॥ ४३ ॥
मयूरादि पक्षिगण प्रभुरे देखिया। सङ्गे चले, 'कृष्ण' बलि' नाचे मत्त हञा॥ ४४ ॥
'हरिबोल' बलि' प्रभु करे उच्चध्वनि। वृक्षलता—प्रफुल्लित, सेइ ध्वनि शुनि'॥ ४५ ॥
झारिखण्डमें समस्त स्थावर-जङ्गमका उद्धार अथवा श्रीकृष्णभक्ति देना :— 'झारिखण्डे' स्थावर-जङ्गम आछे यत। कृष्णनाम दिया कैल प्रेमेते उन्मत्त॥ ४६ ॥
अनुवाद—मोर आदि पक्षी महाप्रभुको देखकर 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते-बोलते मत्त होकर नृत्य करते हुए उनके साथ चलने लगे। जब महाप्रभु 'हरिबोल' बोलकर उच्चध्वनि करते, तब उस ध्वनिको सुनकर वृक्ष-लताएँ प्रफुल्लित हो उठते। 'झारिखण्ड'में जितने भी चर-अचर प्राणी थे, महाप्रभुने उन सबको श्रीकृष्णनाम देकर प्रेममें उन्मत्त बना दिया॥ ४४-४६ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'झारिखण्ड'—झारिखण्ड नामसे प्रसिद्ध वृन्दावन-जानेके पथमें एक विशेष वन-प्रदेश है। (वर्तमान आटगढ़, ढेङ्कानल, आङ्गुल, लाहारा, क्योञ्झड़, वामड़ा, बोनाइ, गाङ्गपुर, छोटानागपुर, यशपुर, सरगुजा आदि पर्वत-जङ्गलमय-राज्य)॥ ४६ ॥
येइ ग्रामे दिया यान, याँहा करेन स्थिति। से-सब ग्रामेर लोकेर हय 'प्रेमभक्ति'॥ ४७ ॥
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