श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1545, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/47-56 ] महाप्रभुके मुखसे कीर्तित श्रीनाम श्रवण करनेवालेको श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति, उसके मुखसे कीर्तित श्रीकृष्णनामकी श्रवण-कीर्तन-धारासे लोगोंका उद्धार :- केह यदि ताँर मुखे शुने कृष्णनाम। ताँर मुखे आन शुने, ताँर मुखे आन ॥ 48 ॥ महाप्रभुके गमन पथपर श्रवण-कीर्तनकी परम्परासे सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :- सबे 'कृष्ण' 'हरि' बलि' नाचे, कान्दे, हासे। परम्पराय 'वैष्णव' हइल सर्वदेशे ॥ 49 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जिस भी ग्रामसे होकर गुजरते अथवा जिस भी ग्राममें रहते, उन सब ग्रामोंके लोगोंमें 'प्रेमभक्ति' उदित हो जाती। कोई यदि महाप्रभुके मुखसे श्रीकृष्णनाम श्रवण करता, उस व्यक्तिके मुखसे अन्य कोई सुनता और उस अन्य व्यक्तिके मुखसे अन्य एक व्यक्ति सुनता, इस प्रकार परम्परासे सभी देशोंमें प्रायः सभी वैष्णव बन गये। सभी 'कृष्ण', 'हरि' बोलते हुए नृत्य करते, क्रन्दन करते तथा हँसते ॥ 47-49 ॥ अनुभाष्य- 'आन'-अन्य व्यक्ति ॥ 48 ॥ बहिरङ्ग लोगोंके सामने प्रेम-चेष्टाको छिपानेपर भी महाप्रभुके दर्शन और नाम-कीर्तनके श्रवणसे ही लोगोंको भक्तिकी प्राप्ति :- यद्यपि प्रभु लोक-सङ्घट्टे त्रासे। प्रेम 'गुप्त' करेन, बाहिरे ना प्रकाशे ॥ 50 ॥ तथापि ताँर दर्शन-श्रवण-प्रभावे। सकल देशेर लोक हैल 'वैष्णवे' ॥ 51 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु लोगोंकी भीड़के भयसे अपने प्रेमको छिपा लेते, बाहरमें प्रकाशित नहीं करते, तथापि उनके दर्शन और श्रवणके प्रभावसे सभी देशोंके लोग वैष्णव बन गये ॥ 50-51 ॥ सर्वत्र ही भारतवर्षके लोगोंका उद्धार-साधन :- गौड़, बङ्ग, उत्कल, दक्षिण-देशे गिया। लोकेर निस्तार कैल आपने भ्रमिया ॥ 52 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने गौड़देश (पश्चिम बङ्गाल), बङ्ग (बाङ्गलादेश), उत्कल (उड़ीसा) और दक्षिण भारतमें स्वयं जाकर भ्रमण करके लोगोंका उद्धार किया ॥ 52 ॥ झारिखण्डमें अत्यन्त श्रीकृष्णबहिर्मुख लोगोंका भी उद्धार करना :- मथुरा याइवार छले आसेन झारिखण्ड। भिन्नप्राय लोक ताँहा परम-पाषण्ड ॥ 53 ॥ नाम-प्रेम दिया कैल सबार निस्तार। चैतन्येर गूढ़लीला बुझिते शक्ति कार ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभु मथुरा जानेके छलसे झारिखण्डमें आये। वहाँके लोग प्राय असभ्य और परम-पाखण्डी थे। महाप्रभुने नाम-प्रेम प्रदान करके उन सबका भी उद्धार किया। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़लीलाको समझनेकी शक्ति किसमें है? ॥ 53-54 ॥ अनुभाष्य- 'भिन्नप्राय'-सुसभ्य समाजसे अलग अर्थात् 'प्रायः असभ्य' ॥ 53 ॥ महाप्रभुमें महाभागवतोचित व्रजलीलाका उद्दीपन :- वन देखि' भ्रम हय-एइ 'वृन्दावन'। शैल देखि' मने हय-एइ 'गोवर्धन' ॥ 55 ॥ याँहा नदी देखे, ताँहा मानये-'कालिन्दी'। महाप्रेमावेशे नाचे प्रभु पड़े कान्दि' ॥ 56 ॥ अनुवाद-झारिखण्डके वनको देखकर महाप्रभुको वह वृन्दावन प्रतीत होता। तथा मार्गमें पर्वत देखकर महाप्रभुको लगता कि यह गोवर्धन है। इसी प्रकार जब भी किसी नदीको देखते, तो उसे कालिन्दी (यमुना) मानने लगते। इस प्रकार वृन्दावनकी स्फूर्तिसे महाप्रेमके आवेशमें नाचते-नाचते महाप्रभु क्रन्दन करते हुए भूमिपर गिर पड़ते ॥ 55-56 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/11, 273 और 276 संख्या एवं भाः 10/30/9 और 10/35/9 श्लोक आदि विशेष रूपसे आलोच्य हैं ॥ 55-56 ॥ । 99