भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1546

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[ 17/57-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— पथे याइते भट्टाचार्य शाक-मूल-फल। याँहा येइ पायेन, ताँहा लयेन सकल ॥ 57 ॥ अनुवाद— मार्गमें चलते-चलते बलभद्र भट्टाचार्यको जहाँपर जो भी शाक-मूल-फल आदि मिलता, वे सब कुछ ले लेते ॥ 57 ॥ मार्गमें वैष्णव-ब्राह्मणोंके द्वारा ही महाप्रभु-सेवा :— ये-ग्रामे रहेन प्रभु, तथाय ब्राह्मण। पाँच-सात जन आसि' करे निमन्त्रण ॥ 58 ॥ केह अन्न आनि' देय भट्टाचार्य-स्थाने। केह दुग्ध, दधि, केह घृत, खण्ड आने ॥ 59 ॥ दीक्षित-ब्राह्मणोंके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— याँहा विप्र नाहि, ताँहा 'शूद्रमहाजन'। आसि' सबे भट्टाचार्ये करे निमन्त्रण ॥ 60 ॥ अनुवाद— महाप्रभु जिस ग्राममें पहुँचते, वहाँके पाँच-सात ब्राह्मण आकर उन्हें निमन्त्रण देते। कोई बलभद्र भट्टाचार्यको अन्न लाकर दे देता तथा अन्य कोई उन्हें दूध, दही, घी तथा चीनी आदि लाकर देता। जिस गाँवमें ब्राह्मण नहीं होते, वहाँ ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य कुलमें जन्में भक्त आकर बलभद्र भट्टाचार्यको निमन्त्रण देते ॥ 58-60 ॥ अनुभाष्य— जिस स्थानपर जन्मजात ब्राह्मण नहीं होते, वहाँ 'शूद्रमहाजन' अर्थात् जन्मजात शूद्र होनेपर भी जो दैक्ष-ब्राह्मण (दीक्षित होनेके कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त) महाजन थे, उन्हींके घरपर भट्टाचार्यका निमन्त्रण हुआ था। शाङ्कर-संन्यासी जन्मजात ब्राह्मणके घरके अतिरिक्त अन्यत्र भिक्षा-ग्रहण नहीं करते। परन्तु महाप्रभुने जिस स्थानपर वैष्णव-ब्राह्मणका अभाव था, वहाँ ब्राह्मण परिवारमें जन्म अथवा उपनयन संस्कारके द्वारा द्वितीय जन्मको नहीं मानकर महाप्रभुने 'वैष्णवत्व' अथवा शुद्धभक्तिको लक्ष्य करके ही दीक्षित ब्राह्मणादिके द्वारा प्रदत्त द्रव्यों (वस्तुओं)को ग्रहण किया था ॥ 60 ॥ वनके मार्गमें आहार आदिकी व्यवस्था :— भट्टाचार्य पाक करे वन्य-व्यञ्जन। वन्य-व्यञ्जने प्रभुर आनन्दित मन ॥ 61 ॥ दुइ-चारिदिनेर अन्न राखेन संहति। याँहा शून्य वन, लोकेर नाहिक वसति ॥ 62 ॥ ताँहा सेइ अन्न भट्टाचार्य करे पाक। फल-मूले व्यञ्जन करे, वन्य नाना शाक ॥ 63 ॥ परम सन्तोष प्रभुर वन्य-भोजने। महासुख पान, ये दिन रहेन निर्जने ॥ 64 ॥ अनुवाद— बलभद्र भट्टाचार्य वनसे एकत्रित किये व्यञ्जनोंकी रसोई बनाते और उन वनके व्यञ्जनोंको महाप्रभु बड़े आनन्दपूर्वक ग्रहण करते। बलभद्र भट्टाचार्य दो-चार दिनके लिये चावलको संग्रह करके अपने साथमें रखते थे। वनमें जहाँपर लोग वास नहीं करते थे, वहाँपर बलभद्र भट्टाचार्य उस चावलको पकाते और उसके साथ खानेके लिये वनमेंसे प्राप्त फल-मूल तथा अनेक प्रकारके साग बनाते। महाप्रभु वनके भोजनसे अत्यन्त सन्तुष्ट होते। और जब भी उन्हें निर्जन स्थानमें रहनेका अवसर प्राप्त होता, तो वे बहुत प्रसन्न होते ॥ 61-64 ॥ भट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा और उनका साथी महाप्रभुका वाहक :— भट्टाचार्य सेवा करे, स्नेहे यैछे 'दास'। ताँर विप्र बहे जलपात्र-बहिर्वास ॥ 65 ॥ अनुवाद— बलभद्र भट्टाचार्य महाप्रभुसे इतना स्नेह करते कि वे दासकी भाँति उनकी सेवामें लगे रहते। और उनका सङ्गी ब्राह्मण महाप्रभुके जलपात्र तथा बहिर्वास वस्त्रको उठाकर चलता ॥ 65 ॥ झरनेमें महाप्रभुका तीनों सन्ध्याओंमें स्नान और लकड़ी जलाकर शीतको दूर करना :— निर्झरिते उष्णोदके स्नान तिनबार। दुइसन्ध्या अग्निताप काष्ठेर अपार ॥ 66 ॥ 100 |