श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1547, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/66-79 ] अनुवाद - महाप्रभु झरनेके गर्म पानीमें तीन बार स्नान करते। प्रातः और सायंकाल-इन दो सन्ध्याओंमें बहुत सी लकड़ी जलाकर अग्निका ताप लेते ॥ 66 ॥ भट्टको महाप्रभुके द्वारा पहली वृन्दावनकी यात्राका वर्णन :- निरन्तर प्रेमावेशे निर्जने गमन। सुख अनुभवि' प्रभु कहेन वचन ॥ 67 ॥ “शुन, भट्टाचार्य, – आमि गेलाङ बहु-देश। वनपथे दुःखेर काँहा नाहि पाइ लेश ॥ 68 ॥ कृष्ण-कृपालु, आमाय बहुत कृपा कैला। वनपथे आनि' आमाय बड़ सुख दिला ॥ 69 ॥ पूर्वे वृन्दावन याइते करिलाङ विचार। माता, गङ्गा, भक्तगणे देखिब एकबार ॥ 70 ॥ भक्तगण-सङ्गे अवश्य करिब मिलन। भक्तगणे सङ्गे लञा याब 'वृन्दावन' ॥ 71 ॥ एत भावि' गौड़देशे करिलुँ गमन। माता, गङ्गा, भक्ते देखि' सुखी हैल मन ॥ 72 ॥ भक्तगणे लञा तबे चलिलाङ रङ्गे। लक्षकोटि लोक ताँहा हैल आमा-सङ्गे ॥ 73 ॥ सनातन-मुखे कृष्ण आमा शिखाइला। ताहा विघ्न करि' वनपथे लञा आइला ॥ 74 ॥ श्रीकृष्णकृपाकी महिमासूचक उक्ति :- कृपार समुद्र, दीन-हीने दयामय। कृष्णकृपा बिना कोन 'सुख' नाहि हय ॥” 75 ॥ अनुवाद - निरन्तर प्रेममें आविष्ट निर्जन वनमें जाते समय बहुत सुखका अनुभव करके महाप्रभुने बलभद्र भट्टाचार्यसे कहा, – “हे भट्टाचार्य, सुनो ! मैं वनके मार्गसे अनेक स्थानोंपर गया, किन्तु मैंने कहींपर दुःखका लेशमात्र भी नहीं पाया। श्रीकृष्ण बहुत कृपालु हैं, उन्होंने मुझपर बहुत कृपा की है। वे कृपा करके मुझे वनके मार्गमें लाये हैं और मुझे बहुत सुख प्रदान किया है। मैंने पहले भी वृन्दावन जानेका विचार किया था। मैंने सोचा था कि माता शची, गङ्गा तथा भक्तोंके एकबार दर्शन करूँगा। भक्तोंके साथ अवश्य ही भेंट करूँगा और भक्तोंको साथ लेकर 'वृन्दावन' जाऊँगा। ऐसा सोचकर मैं गौड़देश गया था, शचीमाता, भगवती गङ्गा तथा भक्तोंको देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ था। मैं आनन्दपूर्वक भक्तोंको साथ लेकर वृन्दावनके लिये चल पड़ा था। लाखों-करोड़ों लोग मेरे साथ चलने लगे। सनातनके मुखसे श्रीकृष्णने मुझे शिक्षा प्रदान की और उस यात्रामें विघ्न उत्पन्न करके अब वनके मार्गसे वृन्दावनकी ओर ले जा रहे हैं। कृपाके सागर, दीन-हीनके प्रति दयामय श्रीकृष्णकी कृपाके बिना किसी प्रकारके 'सुख'की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥” 67-75 ॥ भट्टकी सेवासे महाप्रभुके द्वारा कृतज्ञता-ज्ञापन :- भट्टाचार्ये आलिङ्गिया ताँहारे कहिल। “तोमार प्रसादे आमि एत सुख पाइल ॥” 76 ॥ अनुवाद - महाप्रभुने बलभद्र भट्टाचार्यका आलिङ्गन करके कहा, – “तुम्हारी कृपासे मुझे इतने सुखकी प्राप्ति हुई है ॥” 76 ॥ भट्टकी दैन्य-उक्ति और स्तव :- तँहो कहेन, – “तुमि 'कृष्ण', तुमि 'दयामय'। अधम जीव मुञि, मोरे हइला सदय ॥ 77 ॥ मुञि छार, मोरे तुमि सङ्गे लञा आइला। कृपा करि' मोर हाते 'प्रभु' भिक्षा कैला ॥ 78 ॥ अधम-काकेरे कैला गरुड़-समान। 'स्वतन्त्र ईश्वर' तुमि-स्वयं भगवान् ॥” 79 ॥ अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने कहा, – “आप साक्षात् 'श्रीकृष्ण' हैं, इसलिये आप 'दयामय' हैं। मैं तो एक अधम जीव हूँ, किन्तु आपने मेरे प्रति दया की है। मैं बहुत पतित व्यक्ति हूँ, तथापि आप मुझे अपने साथ ले आये हैं। हे प्रभो ! बहुत कृपा करके आपने मेरे हाथसे बने भोजनको स्वीकार किया है। अधम कौवेको । 101