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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1548

[ 17/77-82 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

आपने गरुड़के समान बना दिया है। आप 'स्वतन्त्र ईश्वर' तथा स्वयं भगवान् हैं॥” 77-79 ॥

श्रीमद्भागवत (1/1/1) की भावार्थ-दीपिकामें :- मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द-माधवम् ॥ 80 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपा गूँगोको भी वाचाल और लँगड़ेको भी पर्वत पार करा सकती है, उन 'परमानन्द-स्वरूप' माधवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 80 ॥

अनुभाष्य- यत् (यस्य) कृपा (अनुकम्पा) मूकं (वाक्शक्तिहीनमपि) वाचालं (वाक्पटुं कृष्णकीर्त्तनरतं) करोति, पङ्गुं (चलच्छक्तिहीनमपि) गिरिं (पर्वतं) लङ्घयते (कृष्णभजनाय असाध्यमपि साधयतीत्यर्थः), परमानन्द-माधवं (श्रीविष्णुस्वामिनोऽन्वयं श्रीपरमानन्दस्वामिनं स्वेष्टदेवं श्रीभगवन्तम्) अहं वन्दे।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥

भट्टका सेवाके द्वारा महाप्रभुको प्रसन्न करना :- एइमत बलभद्र करेन स्तवन। प्रेमसेवा करि' तुष्ट कैल प्रभुर मन ॥ 81 ॥

अनुवाद-इस प्रकार श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुका स्तव किया और प्रेमसेवा करके उनके मनको सन्तुष्ट कर दिया ॥ 81 ॥

काशीमें आकर महाप्रभुका मणिकर्णिका-घाटपर स्नान :- एइमत नाना-सुखे प्रभु आइला 'काशी'। मध्याह्न-स्नान कैल मणिकर्णिकाय आसि' ॥ 82 ॥

अनुवाद-इस प्रकार अति सुखपूर्वक महाप्रभु 'काशी' में आ पहुँचे। उन्होंने मणिकर्णिका घाटपर गङ्गामें दोपहरका स्नान किया ॥ 82 ॥

अनुभाष्य- 'काशी'-इसका अन्य नाम 'वाराणसी' अथवा 'अविमुक्त' है। यह अति प्राचीन पुरी है-

“असिञ्च वरुणा यत्र क्षेत्ररक्षाकृतौ कृते। वाराणसीति विख्याता तदारभ्य महामुने। असेश्च वरुणायाश्च सङ्गमं प्राप्य काशिका ॥”

[अर्थात् “हे महामुने, सत्ययुगमें वरुणा और असि नामक दो नदियोंने जिस समय इस क्षेत्रकी रक्षाकी थी, काशिका उस समयसे आरम्भ करके वरुणा और असिके सङ्गमको प्राप्त करके 'वाराणसी', इस नामसे विख्यात हुई है।"]

'मणिकर्णिका'-विष्णुके कर्णसे, किसी अन्य मतानुसार, शिवके कर्णसे मणिके इस घाटपर गिरनेके कारण इसका नाम- 'मणिकर्णिका' है। किसी औरके मतानुसार, - भवरोगके वैद्य विश्वनाथ काशीवासी मुमुर्षु (मरणोन्मुख) लोगोंके कानमें तारक-ब्रह्म 'राम'-नाम देकर उसका त्राण (उद्धार) करते हैं, इसलिये इस तीर्थका नाम 'मणिकर्णिका' है।

“नास्ति गङ्गासमं तीर्थं वाराणस्यां विशेषतः। तत्रापि मणिकर्णाख्यं तीर्थं विश्वेश्वरप्रियम् ॥”

[अर्थात् “यद्यपि गङ्गाके समान अन्य कोई तीर्थ नहीं है, उसमें भी वाराणसीका विशेष स्थान है, तथापि मणिकर्णिका नामक तीर्थ विश्वनाथका अतिप्रिय है।"]

काशीखण्डमें- “संसारिचिन्तामणिरत्र यस्मात् तं तारकं सज्जनकर्णिकायाम्। शिवोऽभिधत्ते सहसान्तःकाले तद्गीयतेऽसौ मणिकर्णिकेति ॥ मुक्तिलक्ष्मीमहापीठमणिश्चरणाम्बुजयोः। कर्णिकेयं तत प्राहुरार्या जना मणिकर्णिकाम् ॥”

[अर्थात् “क्योंकि इस स्थानपर संसारी लोगोंके चिन्तामणि-स्वरूप श्रीशिव मृत्युके समय सहसा सज्जनोंके कानोंमें उस तारकब्रह्म-नामका कीर्त्तन करते हैं, इसलिये इस स्थानने 'मणिकर्णिका' यह नाम धारण किया है। और भी मुक्तिरूपा लक्ष्मी इस महापीठकी मणिस्वरूपा हैं। उनके चरणकमलकी यह कर्णिका होनेके कारण मनुष्य इसे मणिकर्णिका कहते हैं।"] ॥ 82 ॥

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