श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1549, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय 17/83-87 ] उसी समय तपन मिश्रका भी स्नान और महाप्रभुके दर्शनसे पहले उनको विस्मय :- सेइकाले तपनमिश्र करे गङ्गास्नान। प्रभु देखि' हैल ताँर विस्मय किछु ज्ञान ॥ 83 ॥ 'पूर्वे शुनियाछि प्रभु करयाछेन संन्यास' । निश्चय करिया, हैल हृदये उल्लास ॥ 84 ॥ बादमें प्रसन्नताके आँसू :- प्रभुर चरण धरि' करेन रोदन। प्रभु तारे उठाया कैल आलिङ्गन ॥ 85 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीतपन मिश्र गङ्गास्नान कर रहे थे और महाप्रभुको वहाँ देखकर वे विस्मित हो गये। वे विचार करने लगे—'मैंने पहले सुना है कि महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया है।' यह बात स्मरण करके उनके हृदयमें बहुत उल्लास हुआ। तब श्रीतपन मिश्र महाप्रभुके चरण पकड़कर रोने लगे। महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 83-85 ॥ महाप्रभुको लेकर मिश्रका विश्वेश्वर और बिन्दुमाधवके दर्शन :- प्रभु लञा गेला विश्वेश्वर-दरशने। तबे आसि' देखे बिन्दुमाधव-चरणे ॥ 86 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र महाप्रभुको विश्वेश्वर शिवके दर्शन करानेके लिये ले गये। उसके बाद महाप्रभुने श्रीबिन्दुमाधवके चरणकमलोंके दर्शन किये ॥ 86 ॥ अनुभाष्य—'बिन्दु-माधव'—प्राचीन विष्णुमन्दिर है; आजकल 'पञ्चगङ्गा'के ऊपर अवस्थित 'वेणीमाधव'के नामसे प्रसिद्ध मन्दिर है। 'पञ्चनदी' अर्थात् धूतपापा, किरणा, सरस्वती, गङ्गा और यमुना—इन पाँच नदियोंमेंसे केवलमात्र गङ्गा ही प्रवाहित होती दिखायी देती हैं। कहा जाता है कि श्रीमन्महाप्रभुने जिस प्राचीन बिन्दु-माधव- मन्दिरके दर्शन किये उसको 'हिन्दू-विद्वेषी' मुगल-सम्राट औरङ्गजेबने विध्वंस करके वहाँ एक बहुत बड़ी मस्जिद स्थापित की थी। वर्तमान मन्दिरके पासमें ही एक बहुत बड़ी प्राचीन मस्जिद है। श्रीमन्दिरमें चतुर्भुज श्रीनारायण और लक्ष्मीदेवीके विग्रह तथा उनके सामने श्रीगरुड़के एवं बगलमें श्रीराम-सीता और लक्ष्मणादि तथा श्रीहनुमानके श्रीविग्रह विराजमान हैं। [टीका लिखनेके समय] महाराष्ट्र अन्तर्गत सातारा-जिलेमें आउन्धैर वैष्णव-सम्प्रदायके अनुगत महाराष्ट्र पन्थ महाराज ही श्रीविग्रहसेवाके और मन्दिरके समस्त व्ययको चला रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि लगभग दो सौ वर्षोंसे इस राजवंशके हाथोंमें श्रीवेणीमाधवकी सेवाका भार सौंपा हुआ था; इस वंशके प्रथम सेवाइत 'प्रतिनिधि'का नाम-महाराज जगजीवन राव साहेब था॥ 86 ॥ महाप्रभुको अपने घरमें लाना और महाप्रभुको पाकर मिश्रका आनन्द :- घरे लञा आइला प्रभुके आनन्दित हञा। सेवा करि' नृत्य करे वस्त्र उड़ाञा ॥ 87 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र बड़े आनन्दसे महाप्रभुको अपने घरपर ले आये और उनकी सेवा की। वे इतने प्रसन्न थे कि वे वस्त्रको लहराकर नृत्य करने लगे ॥ 87 ॥ अनुभाष्य—' (श्रीतपनमिश्रके) घरमें'—काशीमें रहते समय श्रीमन्महाप्रभु बहुत ही निकटमें 'पञ्चनदी-घाट'पर स्नान आदि करके सबसे पहले श्रीबिन्दुमाधवजीके दर्शन करते, उसके बाद श्रीतपन-मिश्रके घरमें भिक्षा ग्रहण करते। ऐसा सुना जाता है कि एक लोक-कहावतके अनुसार इस मन्दिरसे कुछ दूरीपर जिस वटवृक्षके नीचे श्रीमन्महाप्रभु विश्राम करते थे, उन्हींके नामके अनुसार वह बादमें “चैतन्यवट” एवं क्रमशः “यतनवट”के नामसे आज भी प्रसिद्ध है। वर्तमान समयमें वहाँ एक गलीके अन्दर श्रीवल्लभाचार्यकी ही एक समाधिका । 103