श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1550, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/87-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थान देखा जाता है; किन्तु श्रीगौरसुन्दरका कोई स्मृतिचिह्न दिखायी नहीं देता। श्रीवल्लभाचार्यके अनुगत भक्त भी उन्हें 'महाप्रभु'के नामसे पुकारते हैं। यह सम्भव है कि श्रीमन्महाप्रभु 'यतनवट'में विश्राम करते थे, किन्तु श्रीचन्द्रशेखरका भवन, श्रीतपनमिश्रका घर, मायावादि- मण्डलीके अधिपति प्रकाशानन्द-सरस्वतीके स्थानादि चिह्न तक अब लुप्त हो गये हैं। तथापि कुछ दूरीपर कोलकत्ता-निवासी परलोकगत शशीभूषण नियोगी महाशयके भवनमें श्रीगौरनित्यानन्दके श्रीअर्च्यविग्रह प्रतिष्ठित हैं। उनकी सास माता और ससुर श्रीनारायणचन्द्र घोष महाशयकी देखरेखमें वर्तमान समयमें सेवा चल रही है॥ ४7॥ सपरिवार महाप्रभुका चरणामृत-पान और भट्टको सम्मान :- प्रभुर चरणोदक सवंशे कैल पान। भट्टाचार्येर पूजा कैल करिया सम्मान ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने महाप्रभुके चरणोंको धोया और अपने परिवारसहित उस चरणामृतका पान किया। उन्होंने बलभद्र भट्टाचार्यकी भी सम्मानपूर्वक पूजा की॥ 88॥ भट्टके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा दान :- प्रभुरे निमन्त्रण करि' घरे भिक्षा दिल। बलभद्र-भट्टाचार्ये पाक कराइल ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने महाप्रभुको अपने घरमें निमन्त्रित करके भोजन कराया। उन्होंने श्रीबलभद्र भट्टाचार्यके द्वारा भोजन बनवाया॥ 89॥ आहारके बाद महाप्रभुका शयन, श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुका चरण-सम्वाहन :- भिक्षा करि' महाप्रभु करिला शयन। मिश्रपुत्र रघु करे पादसम्वाहन ॥ 90 ॥ अनुवाद—प्रसाद पानेके बाद महाप्रभु विश्राम करने लगे। तब श्रीतपन मिश्रके पुत्र श्रीरघुनाथ आकर महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे॥ 90॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तपन मिश्रके पुत्र रघुनाथ—जो बादमें 'भट्ट गोस्वामी'के नामसे विख्यात हुए थे—वे महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे॥ 90॥ परिवारसहित महाप्रभुके उच्छिष्टको ग्रहण करना; श्रीचन्द्रशेखरका आगमन :- प्रभुर 'शेषात्र' मिश्र सवंशे खाइल। 'प्रभु आइला' शुनि' चन्द्रशेखर आइल ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको श्रीतपनमिश्रके सारे परिवारने खाया। 'महाप्रभु आये हैं'—ऐसा सुनकर श्रीचन्द्रशेखर भी उनके दर्शनके लिये आये॥ 91॥ श्रीचन्द्रशेखरका परिचय :- मिश्रेर सखा तँहो प्रभुर पूर्व दास। वैद्यजाति, लिखनवृत्ति, वाराणसी-वास ॥ 92 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर श्रीतपन मिश्रके मित्र और महाप्रभुके पुराने दास थे। वे जातिसे वैद्य थे और लेखन-कार्य उनका व्यवसाय था। उस समय वे वाराणसीमें ही रहते थे॥ 92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लिखनवृत्ति'—पुस्तककी नकल लिखकर उससे धन कमाना॥ 92॥ श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और उन्हें प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :- आसि' प्रभु-पदे पड़ि' करेन रोदन। प्रभु ताँरे कृपाय उठि' कैल आलिङ्गन ॥ 93 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और रोने लगे। महाप्रभुने कृपा करके उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 93॥ श्रीचन्द्रशेखरका महाप्रभुसे अपने दुःखका निवेदन :- चन्द्रशेखर कहे,—“प्रभु, बड़ कृपा कैला। आपने आसिया भृत्ये दरशन दिला ॥ 94 ॥ 104 |