श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1551, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/94-98 ] हरिभजन-कथा-विहीन काशी-शुष्क-मायावादियोंकी आवास-स्थली :- आपन-'प्रारब्धे' वसि' वाराणसी-स्थाने। 'माया', 'ब्रह्म' शब्द बिना नाहि शुनि काणे॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरने कहा,—“हे प्रभो! आपने बहुत कृपा की है जो आपने स्वयं आकर अपने दासको दर्शन दिया है। मैं अपने प्रारब्धके कारण ही वाराणसीमें वास करता हूँ। यहाँ 'माया' तथा 'ब्रह्म' शब्दके अतिरिक्त अन्य कोई शब्द कानोंमें नहीं पड़ता॥ 94-95 ॥ अनुभाष्य— 'प्रारब्धे'—काशी 'शैव' अथवा पञ्चोपासकोंका सर्वप्रधान तीर्थ होनेपर भी वहाँ हरिभजनकी कोई बात नहीं होनेके कारण वह श्रीगौरभक्तोंके रहनेके अत्यन्त अयोग्य है। इसलिये श्रीचन्द्रशेखरने कहा कि वे अपनी प्राचीन दुष्कृतिके फलस्वरूप ही बड़े दुःखके साथ वहाँ वास कर रहे हैं। यहाँपर निन्दाके अर्थमें ही 'प्रारब्ध' शब्दका प्रयोग हुआ है। (भःरःसिः पूर्व-विभाग प्रथम लहरी)— “दुर्ज्जात्यारम्भकं पापं यत् स्यात् प्रारब्धमेव तत्”। [अर्थात् “अपने पूर्वकृत पापोंके अनुसार ही जीवको निम्नजातिमें जन्म मिलता है।"] शुद्ध भगवद्भक्त यद्यपि स्वयंको प्रारब्ध अथवा 'प्राचीन कर्मोंके फल-भोक्ता' कहते हैं, तथापि यमके दण्डके भागी अन्य मर्त्यजीवोंकी भाँति वे कभी भी शुभ-अशुभ कर्मोंके फलके भोगी नहीं होते। नित्यसिद्ध अथवा साधनसिद्धकी तो बात ही नहीं, साधकावस्थामें भी जीवोंकी साधनभक्ति—'क्लेशघ्नी' ('पाप', 'पापबीज', और अविद्या—इन तीन प्रकारके क्लेशोंका नाश करनेवाली) होती है। जैसे पद्मपुराणमें कहा है— “अप्रारब्ध-फलं पापं कूटं बीजं फलोन्मुखम्। क्रमेणैव प्रलीयेत विष्णुभक्तिरतात्मनाम्॥" [अर्थात् “जिन लोगोंकी आत्मा और उनका शरीर, मन, प्राणादि सभी श्रीकृष्णकी भक्तिमें लगे हुए हैं, उनके अप्रारब्ध पाप, कूट पाप, बीजरूप पाप और फलोन्मुख पाप (जिनका फल भुगतना आरम्भ हो गया है), ये सब भक्तिसे क्रमशः विनष्ट हो जाते हैं।"] इसके पूर्ववर्ती दो श्लोकोंकी “दुर्गम-सङ्गमनी" टीका भी इस प्रसङ्गमें आलोच्य है॥ 95 ॥ मिश्रको सम्मान देना :- षड्दर्शन-व्याख्या बिना कथा नाहि एथा। मिश्र कृपा करि' मोरे सुनान कृष्णकथा॥ 96 ॥ अनुवाद—षड्दर्शनकी व्याख्याके अतिरिक्त यहाँपर अन्य कोई कथा नहीं होती। श्रीतपन मिश्र कृपा करके मुझे श्रीकृष्ण-कथाका श्रवण कराते हैं॥ 96 ॥ अनुभाष्य— 'षड्दर्शन'— 1) कणादऋषि-कृत 'वैशेषिक'-दर्शन, 2) गौतमऋषि-कृत 'न्याय'-दर्शन, 3) पतञ्जलिऋषि कृत 'योग'-दर्शन, 4) कपिलऋषि-कृत 'सांख्य'-दर्शन, 5) जैमिनीऋषि-कृत 'पूर्व' (कर्म)-मीमांसा, 6) महर्षि वेदव्यास-कृत 'उत्तर (ब्रह्म)-मीमांसा' या 'वेदान्त'॥ 96 ॥ महाप्रभुके प्रति कातर-उक्ति :- निरन्तर दुँहे चिन्ति तोमार चरण। 'सर्वज्ञ ईश्वर' तुमि दिला दरशन॥ 97 ॥ शुनि'-'महाप्रभु' याबेन श्रीवृन्दावने। दिन कत रहि' तार' भृत्य दुइजने॥"98 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र और मैं निरन्तर आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते हैं। यद्यपि आप 'सर्वज्ञ ईश्वर' हैं, आपने हमें अपना दर्शन प्रदान किया है। हे महाप्रभु! मैंने सुना है कि आप श्रीवृन्दावन जायेंगे। कुछ दिन यहाँपर रहकर अपने इन दो दासोंका भी उद्धार कीजिये॥"97-98॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'तार'—उद्धार करो। 'भृत्य दुइजने'—श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र, इन दो लोगोंका॥ 98 ॥ । 105