श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1552, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/98-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—महाप्रभुके अत्यन्त निकट रहनेपर भी महाप्रभुके प्रति अत्यन्त सम्भ्रम-उक्ति ॥ 98 ॥ मिश्रका महाप्रभुसे निवेदन :— मिश्र कहे,—“प्रभु, यावत् काशीते रहिबा। मोर निमन्त्रण बिना अन्य ना मानिबा ॥”99 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने कहा,—“हे प्रभो! जब तक आप काशीमें रहेंगे, कृपया तब तक मेरे अतिरिक्त आप किसीके निमन्त्रणको स्वीकार मत कीजियेगा ॥”99 ॥ भक्तके वशमें भगवान् :— एइमत महाप्रभु दुइ भृत्येरे वशे। इच्छा नाहि, तबु तथा रहिला दिन-दशे ॥ 100 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुकी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी, तथापि दोनों दासोंके वशीभूत होनेके कारण वे दस दिनों तक वहाँ रहे ॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'दिन-दशे'—काशीमें श्रीतपन मिश्रके घरमें महाप्रभुकी इस यात्रामें (मध्यलीला 1/239 संख्यामें) चार दिनों तक रहनेकी बातका उल्लेख है ॥ 100 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हय चमत्कारे ॥ 101 ॥ अनुवाद—वाराणसीमें एक महाराष्ट्र दर्शनके लिये आता था। महाप्रभुके रूप और उनके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर वह आश्चर्यचकित हो जाता था ॥ 101 ॥ महाप्रभुको भिक्षा देनेमें मायावादी अवैष्णव-विप्रकी अयोग्यता :— विप्र सब निमन्त्रय, प्रभु नाहि माने। प्रभु कहे,—“आजि मोर हञाछे निमन्त्रणे ॥” 102 ॥ अनुवाद—बहुतसे ब्राह्मण महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण देते, किन्तु महाप्रभु किसीके भी निमन्त्रणको स्वीकार नहीं करते। महाप्रभु कहते,—“आज पहलेसे ही मुझे कहींसे निमन्त्रण हो चुका है ॥” 102 ॥ आचार्यकी लीला करनेवाले महाप्रभुके द्वारा मायावादियोंके सङ्गका त्याग :— एइमत प्रतिदिन करेन वञ्चन। संन्यासीर सङ्ग-भये ना मानेन निमन्त्रण ॥ 103 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रतिदिन मायावादी संन्यासियोंके सङ्गके भयसे उन ब्राह्मणोंके निमन्त्रणको स्वीकार नहीं करते ॥ 103 ॥ प्रकाशानन्दकी बहुतसे शिष्योंके साथ मायावादकी व्याख्या :— प्रकाशानन्द श्रीपाद सभाते बसिया। 'वेदान्त' पड़ान बहु शिष्यगण लञा ॥ 104 ॥ अनुवाद—एक प्रमुख मायावादी संन्यासी प्रकाशानन्द सरस्वती बहुतसे शिष्योंकी सभा करके उनको 'वेदान्त' पढ़ाते थे ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—'प्रकाशानन्द'—श्रीमहाप्रभुके समकालीन काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके एक विशेष संन्यासी थे। चैः भाः मध्यखण्ड तीसरे अध्यायमें— “'हस्त', 'पद', 'मुख' मोर नाहिक 'लोचन'। वेद मोरे एइमत करे विड़म्बन ॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेइ बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड ॥ बाखानये वेद, मोर विग्रह ना माने। सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, तबु नाहि जाने॥ सर्वयज्ञमय मोर ये अङ्ग-पवित्र। 'अज', 'भव' आदि गाय याँहार चरित्र ॥ 'पुण्य' पवित्रता पाय ये-अङ्ग-परशे। ताहा 'मिथ्या' बोले बेटा केमन साहसे॥” [अर्थात् “महाप्रभु कह रहे हैं—बेटा प्रकाशानन्द काशीमें मेरे विषयमें ऐसा पढ़ाता है कि मेरे हाथ, पैर, मुख, नेत्रादि कुछ नहीं हैं। इस प्रकार मेरे नित्य रूपको अस्वीकारकर मुझे निराकार कहकर वह लोगोंके साथ 106 |