श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1553, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/104–114 ] छल करता है। वह बेटा वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरे नित्य विग्रहको नहीं मानता। इस प्रकार वह मानो मेरे अङ्ग खण्ड-खण्ड करके मुझे निराकार कहता है। इस अपराधके कारण उसके सभी अङ्गोंमें कोढ़का रोग हो गया है, तब भी इस सत्यको नहीं समझता। मेरे अङ्ग परम पवित्र और यज्ञमय हैं। ब्रह्मा, शङ्करादि उनकी महिमाका गान करते हैं। जिनके स्पर्श-मात्रसे सभी पुण्यवान् और पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीअङ्गोंको मिथ्या कहनेका बेटा किस प्रकार साहस करता है?"] चैः भाः मध्यखण्ड बीसवें अध्यायमें— “संन्यासी 'प्रकाशानन्द' बसये काशीते। मोरे खण्ड खण्ड बेटा करे भालमते॥ पड़ाय 'वेदान्त', मोर 'विग्रह' ना माने। कुष्ठ कराइलुँ अङ्गे, तबु नाहि जाने॥ 'सत्य' मोर लीला-कर्म, सत्य मोर 'स्थान'। इहा 'मिथ्या' बोले, मोरे करे खान्-खान्॥” [अर्थात् “संन्यासी 'प्रकाशानन्द' काशीमें रहकर अच्छे प्रकारसे मेरे खण्ड-खण्ड करता है। वह वेदान्त पढ़ाता है, किन्तु मेरे नित्य विग्रहको नहीं मानता। मैंने उसके अङ्गोंमें कोढ़का रोग कराया, तब भी यह बात वही नहीं समझता। मेरी लीलाएँ और मेरा धाम, सब सत्य हैं, किन्तु इन्हें वह मिथ्या कहकर मेरे खण्ड-खण्ड करता है।"] श्रील गोपालभट्ट गोस्वामीके श्रीगुरुदेव और पूर्वाश्रमके चाचा श्रीरङ्गक्षेत्रवासी त्रिदण्डिपाद श्रीरामानुजीयस्वामी श्रीश्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वती एवं ये (प्रकाशानन्द) कभी भी 'एक' व्यक्ति नहीं है॥ 104॥ प्रकाशानन्दको एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुके चरित्रका वर्णन :— एक विप्र देखि' आइला प्रभुर व्यवहार। प्रकाशानन्द-आगे कहे चरित्र ताँहार॥ 105॥ “एक संन्यासी आइला जगन्नाथ हैते। ताँहार महिमा-प्रताप ना पारि वर्णिते॥ 106॥ ईश्वरके लक्षण-समूह महाप्रभुमें विराजमान :— सकल देखिये ताँते अद्भुत-कथन। प्रकाण्ड-शरीर, शुद्धकाञ्चन-वरण॥ 107॥ आजानुलम्बित भुज, कमल-नयन। यत किछु ईश्वरेर सर्व सल्लक्षण॥ 108॥ अनुवाद—एक ब्राह्मण महाप्रभुके अद्भुत व्यवहारको देखकर आया और प्रकाशानन्दके सामने महाप्रभुकी महिमा कहने लगा,—“एक संन्यासी जगन्नाथ पुरीसे आये हैं, मैं उनकी महिमा और प्रतापका वर्णन नहीं कर सकता। उनकी सभी बातें अद्भुत हैं। उनका दिव्य शरीर प्रकाण्ड है, शुद्ध स्वर्णके जैसा उनका वर्ण है, उनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं और उनके नयन कमलके समान हैं। उनमें ईश्वरके समस्त सद्-लक्षण हैं॥ 105-108॥ भागवतमें कथित ईश्वर अथवा महाभागवतके समस्त लक्षण महाप्रभुमें विद्यमान :— ताहा देखि' ज्ञान हय—'एइ नारायण'। येइ ताँरे देखे, करे कृष्णसङ्कीर्त्तन॥ 109॥ 'महाभागवत'-लक्षण शुनि भागवते। से-सब लक्षण प्रकट देखिये ताँहाते॥ 110॥ 'निरन्तर कृष्णनाम' जिह्वा ताँर गाय। दुइ-नेत्रे अश्रु बहे गङ्गाधारा-प्राय॥ 111॥ क्षणे नाचे, हासे, गाय, करये क्रन्दन। क्षणे हुहुङ्कार करे,—सिंहेर गर्जन॥ 112॥ अलौकिक-नामरूपगुणलीलायुक्त श्रीकृष्णचैतन्य :— जगन्मङ्गल ताँर 'कृष्णचैतन्य' नाम। नाम, रूप, गुण ताँर, सब-अनुपम॥ 113॥ श्रद्धावान्को ईश्वरके दर्शन होनेपर उनकी कृपासे ही उनकी चेष्टाओंका अनुभव, केवल तर्कपन्थासे श्रवण निष्फलमात्र :— देखिले से जानि ताँर 'ईश्वरेर रीति'। अलौकिक कथा शुनि' के करे प्रतीति?”॥ 114॥ । 107