भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1554, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1554

[ 17/109-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-उन्हें देखकर ऐसा लगता है-मानो 'ये श्रीनारायण' ही हैं। जो कोई भी उनके दर्शन करता है, वह श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करने लगता है। 'भागवत'में मैंने महाभागवतके जिन लक्षणोंके विषयमें सुना है, उन सब लक्षणोंको मैं उनमें प्रकाशित देखता हूँ। उन संन्यासीकी जिह्वा 'निरन्तर श्रीकृष्णनाम'का गान करती है और उनके दोनों नेत्रोंसे गङ्गाकी धाराकी भाँति अश्रु प्रवाहित होते हैं। वे संन्यासी कभी तो नृत्य करते हैं, हँसते हैं, गान करते हैं, क्रन्दन करते हैं और कभी सिंहकी गर्जनकी भाँति हुङ्कार भरते हैं। उनका जगत्का मङ्गल करनेवाला 'श्रीकृष्णचैतन्य' नाम है। उनका नाम, रूप, गुण आदि सब कुछ अनुपम है। उनकी अलौकिक कथा केवल सुननेसे ही किसको विश्वास होगा? देखनेपर ही कोई उनके ईश्वर होनेमें विश्वास करेगा॥” 109-114 ॥ महाप्रभुके चरित्रको सुनकर तर्कपन्थी प्रकाशानन्दके द्वारा महाप्रभुके प्रति व्यङ्ग अथवा अवज्ञा :- शुनिया प्रकाशानन्द बहुत हासिला। विप्रे उपहास करि' कहिते लागिला ॥ 115 ॥ अपने मायावाद रूपी हलाहलको उगलना :- “शुनिय़ाछि गौड़देशेर संन्यासी—'भावुक'। केशव-भारती-शिष्य, लोकप्रतारक ॥ 116 ॥ 'चैतन्य'-नाम ताँर, भावुकगण लञा। देशे-देशे, ग्रामे-ग्रामे बुले नाचाञा ॥ 117 ॥ येइ ताँरे देखे, सेइ ईश्वर करि' कहे। ऐछे मोहन-विद्या—ये देखे, से मोहे ॥ 118 ॥ सार्वभौम भट्टाचार्य—पण्डित प्रबल। शुनि' चैतन्येर सङ्गे हइल पागल ॥ 119 ॥ 'संन्यासी'—नाम-मात्र, महा-इन्द्रजाली! 'काशीपुरे' ना बिकावे ताँर भावकालि ॥ 120 ॥ 'वेदान्त' श्रवण कर, ना याइह ताँर पाश। उच्छृङ्खल-लोक-सङ्गे दुइलोक-नाश ॥” 121 ॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणकी बातोंको सुनकर प्रकाशानन्द बहुत हँसे। उस ब्राह्मणका उपहास करते हुए वे कहने लगे,-“मैंने उसके विषयमें सुना है। वह गौड़देशका संन्यासी है और 'भावुक' है। सुना है कि वह केशव भारतीका शिष्य है। परन्तु वह एक बड़ा ढोंगी है। उसका नाम 'चैतन्य' है। वह भावुक व्यक्तियोंको अपने साथ लेकर देश-देश, गाँव-गाँवमें सबको नचाते हुआ घूमता रहता है। जो भी उसे देखता है, वही उसे ईश्वर कहता है। उसमें ऐसी मोहन-विद्या है कि जो भी उसे देखता है, वह मोहित हो जाता है। मैंने सुना है कि इतने बड़े विद्वान पण्डित श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य भी चैतन्यके सङ्गसे पागल हो गये हैं। वह नाममात्रका संन्यासी है, वास्तवमें तो वह महा-इन्द्रजाली (जादूगर) है। इस 'काशीपुरी'में उसकी भावुकता नहीं बिकेगी। तुम वेदान्तका श्रवण करो और उसके पास मत जाना। उच्छृङ्खल लोगोंका सङ्ग करनेसे यह लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं॥” 115-121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भावकालि'—भावुकका स्वभाव। जिन सब व्यक्तियोंने शास्त्रविधिकी बेड़ियोंको तोड़ दिया है, उनके साथ रहनेसे इस लोक और परलोक, दोनों लोकोंका ही नाश होता है ॥ 120-121 ॥ अनुभाष्य- 'भावुक'—श्रीमन्महाप्रभुके परम चमत्कारमय अप्राकृत चिन्मय भावों और मनोधर्मके द्वारा कृत्रिम (दिखावटी) और थोड़े समय टिकनेवाले उच्छ्वास और उच्छृङ्खलतामय भावोंको 'एक' समझकर मायावादी प्रकाशानन्द यह कह रहे हैं। मायावादी शुद्धभक्तोंके अप्राकृत श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाओंके कीर्तन, नृत्य और गानको भी जागतिक इन्द्रियोंकी सन्तुष्टि करनेवाले नाचने-गाने-बजाने जैसा ही समझते हैं। वे इस कीर्तन-नृत्यादिको कामादि छः शत्रुओंकी दासताकी भाँति इन्द्रियोंकी चेष्टामात्र समझनेके कारण 'अपराधी' अथवा 'पाखण्डी' कहलाने योग्य हैं। वे नित्य स्वधर्म, श्रीकृष्णानुशीलनके श्रीकृष्ण-सम्बन्धी उपकरणके परित्यागके कारण “फल्गु-वैरागी” हैं॥ 116-121 ॥ 108 ।