भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1555

सत्रहवाँ अध्याय 17/122-129 ] महाप्रभुकी निन्दा सुननेपर ब्राह्मणके द्वारा 'श्रीकृष्ण' स्मरण करते हुए स्थानका परित्याग :- एत शुनि' सेइ विप्र महादुःख पाइला। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' तथा हैते उठि' गेला॥ 122॥ अनुवाद—प्रकाशानन्दके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर उस ब्राह्मणको बहुत दुःख हुआ। वह 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते हुए तुरन्त वहाँसे उठकर चला गया॥ 122॥ महाप्रभुके दर्शनके फलसे शुद्धचित्त ब्राह्मणका महाप्रभुसे समस्त घटनाका वर्णन :- प्रभुर दर्शने शुद्ध हञाछे तौर मन। प्रभु-आगे दुःखी हञा कहे विवरण ॥ 123 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनसे उस ब्राह्मणका मन शुद्ध हो गया था। उस ब्राह्मणने दुःखी होकर आकर महाप्रभुको सारा वृत्तान्त बतलाया ॥ 123 ॥ महाप्रभुका मन्द-मन्द मुस्कराना :- शुनि' महाप्रभु तब ईषत् हासिला। पुनरपि सेइ विप्र प्रभुरे पुछिला ॥ 124 ॥ मायावादियोंकी प्रकृति-सम्बन्धित गौण-नाम उच्चारण करनेकी ही योग्यता, अप्राकृत वैकुण्ठ-नाम-उच्चारणमें अयोग्यता :- “तार आगे यबे आमि तोमार नाम लइल। सेह तोमार नाम जाने, - आपने कहिल ॥ 125 ॥ तोमार 'दोष' करिते करे नामेर उच्चार। 'चैतन्य' 'चैतन्य' करि' कहे तिनबार ॥ 126 ॥ चिद्-विलासमें अविश्वासके कारण मायावादियोंके मुखसे अवज्ञापूर्वक ही श्रीनामके उच्चारित होनेसे नामापराधके कारण वह श्रवण योग्य नहीं :- तिनबारे 'कृष्णनाम' ना आइल तार मुखे। 'अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' पाइ दुःखे ॥ 127 ॥ महाप्रभुसे इसके कारणकी जिज्ञासा :- इहार कारण मोरे कह कृपा करि'। तोमा देखि' मुख मोर बले 'कृष्ण' 'हरि' ॥" 128 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द मुस्कुराये। उस ब्राह्मणने पुनः महाप्रभुसे पूछा, - "जब मैंने उसके सामने आपका नाम लिया, तब उसने स्वयं ही कहा कि वह आपका नाम जानता है। आपके दोषोंको बतलानेके लिये उसने आपका नाम लेते हुए केवल 'चैतन्य' तीन बार कहा। तीनों बार कृष्णनाम उसके मुखमें नहीं आया। उसने अवज्ञासे आपका नाम लिया, जिसे सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। आप कृपा करके मुझे इसका कारण बतलाइये। आपको देखते ही मेरे मुखसे तो 'कृष्ण' 'हरि' नाम निकलता है॥"124-128 ॥ अनुभाष्य- 'तार' - प्रकाशानन्दका। 'दोष'- निन्दा। 'ब्रह्म', 'चैतन्य', 'आत्मा', 'परमात्मा', 'जगदीश', 'ईश्वर', 'विराट', 'विभु', 'भूमा', 'विश्वरूप', 'व्यापक' आदि श्रीकृष्णके गौण नाम हैं। इन सब नामोंको ग्रहण करनेवाले श्रीकृष्णके औदार्य और माधुर्यके प्रति आकर्षित नहीं होते। इन नामोंमें श्रीकृष्णका कुछ ऐश्वर्य अवश्य ही प्रकाशित होता है, परन्तु इन नामोंमें मुख्य श्रीकृष्ण नामसे अभिन्न उनके चैतन्यरसविग्रहत्वकी स्फूर्ति नहीं है। इसलिये मायावादी लोग या प्रकृतिके उपासकगण तत्त्व-वस्तुकी चरम अवस्थाको निर्विशेष अथवा चिद्विलाससे रहित होनेकी धारणा करते हैं। तत्त्व-वस्तु श्रीकृष्ण अपने चिन्मय नाम-रूप-गुण-लीला और परिकरोंसे अभिन्न हैं, इस बातमें वे अविश्वास और संशयका पोषण करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके मुख्य नाम ही एकमात्र 'साध्य' और 'साधन' हैं, ऐसा मानकर उनमें श्रद्धा नहीं करनेसे वे महापराधी हैं। अपने नित्य चरम-कल्याणकी कामना करनेवालेको उनके मुखसे किसी भी परमार्थकी बातको श्रवण नहीं करना चाहिये ॥ 125-127 ॥ मायावादी-सेवा-विवादी अथवा अपराधी, इसलिये उनके मुखमें श्रीकृष्णनाम नहीं आता :- प्रभु कहे, - "मायावादी कृष्णे अपराधी। 'ब्रह्म' 'आत्मा' 'चैतन्य' कहे निरवधि ॥ 129 ॥ 109