भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1556

[ 17/129-133 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णविग्रह और श्रीकृष्णस्वरूपका अद्वय-ज्ञान-सम्पन्न होना एवं जीवनाम, जीवमूर्ति और जीवके स्वरूपके अन्तरका वर्णन :- अतएव तार मुखे ना आइसे कृष्णनाम। 'कृष्णनाम', 'कृष्ण स्वरूप'—दुइत' 'समान' ॥ 130 ॥ 'नाम', 'विग्रह', 'स्वरूप'—तिन एकरूप। तिने 'भेद' नाहि,—तिन 'चिदानन्द-रूप' ॥ 131 ॥ देह-देहीर, नाम-नामीर कृष्णे नाहि 'भेद'। जीवेर धर्म—नाम-देह-स्वरूपे 'विभेद' ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'मायावादी लोग श्रीकृष्णके चरणोंमें अपराधी हैं, इसलिये वे केवल 'ब्रह्म', 'आत्मा', 'चैतन्य' आदि ही कहते हैं। इसी कारण श्रीकृष्णनाम उनके मुखमें नहीं आता। श्रीकृष्णनाम और श्रीकृष्ण-स्वरूप—दोनों एक समान हैं। श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णका विग्रह और श्रीकृष्णका स्वरूप तीनों एक ही हैं। तीनोंमें कोई भेद नहीं है, तीनों 'चिदानन्द-रूप' हैं। श्रीकृष्णके शरीर और उनमें अथवा उनके नाम और उनमें कोई भेद नहीं है। नाम, शरीर और स्वरूपमें परस्पर भेद तो बद्धजीवका होता है॥ 129-132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—मायावादी जीवतत्त्वको 'अप्राकृत' न मानकर, मायासे ढके ब्रह्मखण्डको 'जीव' कहकर स्थिर करते हैं और ब्रह्मको 'निर्विशेष' जानकर (सच्चिदानन्द) भगवद्-विग्रहको भी 'मायामय- विग्रह' कहते हैं। इसीसे ही मायावादी श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाको 'अनित्य' जानकर महापराधी हुए हैं। वे श्रीकृष्णके 'मुख्यनाम'का परित्याग करके 'ब्रह्म', 'आत्मा', 'चैतन्य' आदि 'गौण-नामों'का उच्चारण करते हैं। यद्यपि कभी 'गोविन्द', 'माधव', 'कृष्ण'—ये सब 'मुख्यनाम' उनके मुखसे निकलें, तथापि उनके ज्ञानदोषसे (श्रीकृष्णनाममें अविश्वास होनेके कारण उन मुख्य नामोंको अन्यान्य प्राकृत अथवा जागतिक एक शब्द माननेके कारण उनके मुखसे) चिद्-विग्रह श्रीकृष्णका 'नाम' कभी भी (बाहर) नहीं निकलता। वास्तवमें श्रीकृष्णका नाम और श्रीकृष्णका स्वरूप—दोनों ही चिद्-वस्तु हैं, अर्थात् नाम, विग्रह और स्वरूप—तीनों ही चिदानन्दमय हैं। बद्धजीवोंकी देह—जीवरूपी 'देही'से 'पृथक्' है। इसी प्रकार उनके पिताके द्वारा दिया गया 'नाम' और उनकी 'आत्मा' अथवा 'स्वरूप'से 'पृथक् और जड़ाश्रित' है। किन्तु श्रीकृष्णमें वैसा नहीं है, अर्थात् श्रीकृष्णकी जो 'देह' है, वही 'देही' है, जो नाम है, वही नामी है। श्रीकृष्णमें माया अथवा मायासे उत्पन्न जड़सम्बन्ध नहीं होनेके कारण उनके 'देह-देही' अथवा 'नाम-नामी'के बीचमें भेद असम्भव है। बद्धजीवके पक्षमें ही देह-देही अथवा नाम-नामी (इनके बीचमें पार्थक्य वर्तमान) है अर्थात् जीवमें ही 'नाम', 'देह' और 'स्वरूप'का परस्पर पृथक् धर्म विद्यमान है॥ 129-132 ॥ अनुभाष्य—'मायावादी'—आदिलीला, 7/29 और 7/39 संख्या देखें॥ 129 ॥ श्रीकृष्णनामका स्वरूप :- पद्मपुराण और विष्णुधर्मोत्तरका वचन— नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः। पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वात्नामनाभिनोः ॥ 133 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णनाम—चित्स्वरूप एक विशेष चिन्तामणि है, वह श्रीकृष्ण-चैतन्य-रसका विग्रह स्वरूप है। वह पूर्ण है अर्थात् मायिक वस्तुकी भाँति बँधा हुआ और खण्ड नहीं है। वह-शुद्ध अर्थात् मायासे मिश्रित नहीं है। वह-नित्यमुक्त अर्थात् सर्वदा चिन्मय है, कभी भी जड़सम्बन्धमें आबद्ध नहीं है; क्योंकि नाम और नामीके स्वरूपमें कोई भेद नहीं है॥ 133 ॥ अनुभाष्य— नाम-नाभिनोः (नाम च नामी कृष्णः च तयोः नाम्ना सह नाभिनः कृष्णस्य) अभिन्नत्वात् (भेदाभावात्) [कृष्ण] नाम-चिन्तामणिः (सकल-सेवाभीष्टप्रदाता), कृष्णः (साक्षात् स्वयंरूपः कृष्ण एव), चैतन्यरसविग्रहः (चिन्मयरसमूर्तिः, न तु 110 |