श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1557, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय 17/133-137 ] अचिज्जड़वैरस्याश्रयः, तस्य मायातीतत्वात्, मायामिश्रण- योग्यताभावात्), पूर्णः (मायया खण्डनानर्हतनुः), शुद्धः (मायाविमिश्रः, व्युदस्तमायः), नित्यमुक्तः (सदा जड़ातीतः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। चिन्तामणि अर्थात् सबको अभीष्ट सेवा प्रदान करनेवाले ॥ 133 ॥ श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णदेह और श्रीकृष्णविलास- अप्राकृत, चिन्मय और स्वतःप्रकाश :- अतएव कृष्णेर 'नाम', 'देह', 'विलास'। प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय स्वप्रकाश ॥ 134 ॥ श्रीकृष्णका नाम, रूप, गुण, लीला-एक ही वस्तु :- 'कृष्णनाम', 'कृष्णगुण', 'कृष्णलीला'वृन्द। कृष्णेर स्वरूप-सम-सब चिदानन्द ॥ 135 ॥ अनुवाद-इसलिये स्वयं प्रकाशित होनेके कारण श्रीकृष्णका नाम, उनकी देह और उनकी लीला प्राकृत (जड़ीय) इन्द्रियोंके द्वारा नहीं समझे जा सकते। श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णके गुण तथा श्रीकृष्णकी लीलाएँ-श्रीकृष्णके स्वरूपके समान ही सभी चिदानन्दमय हैं॥ 134-135 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी देह, श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णका रूप, श्रीकृष्णके गुण, श्रीकृष्णकी लीलाएँ और परिकर-वैशिष्ट्यादि सच्चिदानन्दमय होनेके कारण सत्त्वादि तीन गुणोंके अभिमानी जीवके जड़ीय रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्शादिके द्वारा ग्रहण अथवा अनुभव नहीं किये जा सकते। ये जीवकी फलभोगमें प्रवृत्त इन्द्रियोंकी भोग्य वस्तु नहीं हैं। ये समस्त ही स्वप्रकाशवस्तु, नित्य चिन्मय और आनन्दमय हैं। गुणोंके अन्तर्गत जड़ वस्तुके नाम, रूप, गुण और क्रियाके बीचमें परस्पर जड़ीय पार्थक्य होता है, एकत्व नहीं होता; किन्तु अधोक्षज श्रीकृष्णमें ऐसा 'भेद' नहीं है ॥ 134 ॥ अप्राकृत श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीला-शुद्धभक्तिके द्वारा ही ग्राह्य, तर्कपन्थासे इन्द्रियोंके ज्ञानसे अगोचर :- अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥ 136 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अतएव श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण- लीला कभी भी प्राकृत नेत्रों-कानों आदिके द्वारा ग्राह्य नहीं हैं। जब जीव सेवोन्मुख होता है, अर्थात् चित्-स्वरूपसे श्रीकृष्णोन्मुख होता है, तभी अप्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंपर श्रीकृष्णनामादि स्वयं ही स्फुरित होते हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य- अतः (कृष्ण-नामादिना सह कृष्णस्य प्राकृत-भेदाभावात्), श्रीकृष्णनामादि (श्रीकृष्णनामरूपगुणलीला-परिकर-वैशिष्ट्यम्) इन्द्रियैः (प्राकृतभोगपरैर्नेत्रकर्णनासाजिह्वात्वगादिभिः) ग्राह्यं (रूपशब्दगन्धरसस्पर्शादिविषयीकृतं) न भवेत् (कर्हिचित् न स्यात्)। (ननु अस्यैवाधोक्षजत्वात् सर्वथेदं जड़- भोगपरेन्द्रियाणामलभ्यञ्च, तर्हि कथमेतत् कीदृशानां जीवानामाश्रयितव्यमिति चेत्, तत्राह-) सेवोन्मुखे (अप्राकृतबुद्ध्या शुद्धकृष्णभजन-प्रवृत्ते) जिह्वादौ (शुद्धसत्त्वमये इन्द्रिये) हि (खलु) अदः (कृष्णनामादि) स्वयमेव स्फुरति (प्रकटयति)। श्लोक-भावानुवाद-इसलिये श्रीकृष्ण-नामादिसे श्रीकृष्णके अभिन्न होनेके कारण श्रीकृष्णनाम- रूप-गुण-लीलापरिकर-वैशिष्ट्य प्राकृतभोगपर नेत्र-कर्ण- नासिका-जिह्वा-त्वचादि इन्द्रियोंके ग्राह्य रूप-शब्द-गन्ध- रस-स्पर्शादि विषयोंके समान कभी भी ग्रहण नहीं किये जा सकते। (निश्चय ही श्रीकृष्ण-नामादि अधोक्षज होनेके कारण सर्वथा ही जड़-भोगपर इन्द्रियोंसे अलभ्य हैं, तब कब और किस प्रकार जीवोंको नामका आश्रय प्राप्त होता है, इसे कह रहे हैं-) अप्राकृत बुद्धिसे शुद्धकृष्णभजनमें प्रवृत्त जिह्वादि शुद्धसत्त्वमय इन्द्रियोंपर ही श्रीकृष्णनामादि स्वयं ही प्रकटित होते हैं ॥ 136 ॥ परम-चमत्कारमय श्रीकृष्ण-माधुर्य- ब्रह्मज्ञानीको भी आकर्षित करनेवाला :- ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द लीलारस। ब्रह्मज्ञानी आकर्षिया करे आत्मवश ॥ 137 ॥ अनुवाद-पूर्ण आनन्दमय लीलारस ब्रह्मज्ञानीको । 111