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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

सतरहवाँ अध्याय 17/94-98 ] हरिभजन-कथा-विहीन काशी-शुष्क-मायावादियोंकी आवास-स्थली :- आपन-'प्रारब्धे' वसि' वाराणसी-स्थाने। 'माया', 'ब्रह्म' शब्द बिना नाहि शुनि काणे॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरने कहा,—“हे प्रभो! आपने बहुत कृपा की है जो आपने स्वयं आकर अपने दासको दर्शन दिया है। मैं अपने प्रारब्धके कारण ही वाराणसीमें वास करता हूँ। यहाँ 'माया' तथा 'ब्रह्म' शब्दके अतिरिक्त अन्य कोई शब्द कानोंमें नहीं पड़ता॥ 94-95 ॥ अनुभाष्य— 'प्रारब्धे'—काशी 'शैव' अथवा पञ्चोपासकोंका सर्वप्रधान तीर्थ होनेपर भी वहाँ हरिभजनकी कोई बात नहीं होनेके कारण वह श्रीगौरभक्तोंके रहनेके अत्यन्त अयोग्य है। इसलिये श्रीचन्द्रशेखरने कहा कि वे अपनी प्राचीन दुष्कृतिके फलस्वरूप ही बड़े दुःखके साथ वहाँ वास कर रहे हैं। यहाँपर निन्दाके अर्थमें ही 'प्रारब्ध' शब्दका प्रयोग हुआ है। (भःरःसिः पूर्व-विभाग प्रथम लहरी)— “दुर्ज्जात्यारम्भकं पापं यत् स्यात् प्रारब्धमेव तत्”। [अर्थात् “अपने पूर्वकृत पापोंके अनुसार ही जीवको निम्नजातिमें जन्म मिलता है।"] शुद्ध भगवद्भक्त यद्यपि स्वयंको प्रारब्ध अथवा 'प्राचीन कर्मोंके फल-भोक्ता' कहते हैं, तथापि यमके दण्डके भागी अन्य मर्त्यजीवोंकी भाँति वे कभी भी शुभ-अशुभ कर्मोंके फलके भोगी नहीं होते। नित्यसिद्ध अथवा साधनसिद्धकी तो बात ही नहीं, साधकावस्थामें भी जीवोंकी साधनभक्ति—'क्लेशघ्नी' ('पाप', 'पापबीज', और अविद्या—इन तीन प्रकारके क्लेशोंका नाश करनेवाली) होती है। जैसे पद्मपुराणमें कहा है— “अप्रारब्ध-फलं पापं कूटं बीजं फलोन्मुखम्। क्रमेणैव प्रलीयेत विष्णुभक्तिरतात्मनाम्॥" [अर्थात् “जिन लोगोंकी आत्मा और उनका शरीर, मन, प्राणादि सभी श्रीकृष्णकी भक्तिमें लगे हुए हैं, उनके अप्रारब्ध पाप, कूट पाप, बीजरूप पाप और फलोन्मुख पाप (जिनका फल भुगतना आरम्भ हो गया है), ये सब भक्तिसे क्रमशः विनष्ट हो जाते हैं।"] इसके पूर्ववर्ती दो श्लोकोंकी “दुर्गम-सङ्गमनी" टीका भी इस प्रसङ्गमें आलोच्य है॥ 95 ॥ मिश्रको सम्मान देना :- षड्दर्शन-व्याख्या बिना कथा नाहि एथा। मिश्र कृपा करि' मोरे सुनान कृष्णकथा॥ 96 ॥ अनुवाद—षड्दर्शनकी व्याख्याके अतिरिक्त यहाँपर अन्य कोई कथा नहीं होती। श्रीतपन मिश्र कृपा करके मुझे श्रीकृष्ण-कथाका श्रवण कराते हैं॥ 96 ॥ अनुभाष्य— 'षड्दर्शन'— 1) कणादऋषि-कृत 'वैशेषिक'-दर्शन, 2) गौतमऋषि-कृत 'न्याय'-दर्शन, 3) पतञ्जलिऋषि कृत 'योग'-दर्शन, 4) कपिलऋषि-कृत 'सांख्य'-दर्शन, 5) जैमिनीऋषि-कृत 'पूर्व' (कर्म)-मीमांसा, 6) महर्षि वेदव्यास-कृत 'उत्तर (ब्रह्म)-मीमांसा' या 'वेदान्त'॥ 96 ॥ महाप्रभुके प्रति कातर-उक्ति :- निरन्तर दुँहे चिन्ति तोमार चरण। 'सर्वज्ञ ईश्वर' तुमि दिला दरशन॥ 97 ॥ शुनि'-'महाप्रभु' याबेन श्रीवृन्दावने। दिन कत रहि' तार' भृत्य दुइजने॥"98 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र और मैं निरन्तर आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते हैं। यद्यपि आप 'सर्वज्ञ ईश्वर' हैं, आपने हमें अपना दर्शन प्रदान किया है। हे महाप्रभु! मैंने सुना है कि आप श्रीवृन्दावन जायेंगे। कुछ दिन यहाँपर रहकर अपने इन दो दासोंका भी उद्धार कीजिये॥"97-98॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'तार'—उद्धार करो। 'भृत्य दुइजने'—श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र, इन दो लोगोंका॥ 98 ॥ । 105

[ 17/98-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—महाप्रभुके अत्यन्त निकट रहनेपर भी महाप्रभुके प्रति अत्यन्त सम्भ्रम-उक्ति ॥ 98 ॥ मिश्रका महाप्रभुसे निवेदन :— मिश्र कहे,—“प्रभु, यावत् काशीते रहिबा। मोर निमन्त्रण बिना अन्य ना मानिबा ॥”99 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने कहा,—“हे प्रभो! जब तक आप काशीमें रहेंगे, कृपया तब तक मेरे अतिरिक्त आप किसीके निमन्त्रणको स्वीकार मत कीजियेगा ॥”99 ॥ भक्तके वशमें भगवान् :— एइमत महाप्रभु दुइ भृत्येरे वशे। इच्छा नाहि, तबु तथा रहिला दिन-दशे ॥ 100 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुकी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी, तथापि दोनों दासोंके वशीभूत होनेके कारण वे दस दिनों तक वहाँ रहे ॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'दिन-दशे'—काशीमें श्रीतपन मिश्रके घरमें महाप्रभुकी इस यात्रामें (मध्यलीला 1/239 संख्यामें) चार दिनों तक रहनेकी बातका उल्लेख है ॥ 100 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हय चमत्कारे ॥ 101 ॥ अनुवाद—वाराणसीमें एक महाराष्ट्र दर्शनके लिये आता था। महाप्रभुके रूप और उनके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर वह आश्चर्यचकित हो जाता था ॥ 101 ॥ महाप्रभुको भिक्षा देनेमें मायावादी अवैष्णव-विप्रकी अयोग्यता :— विप्र सब निमन्त्रय, प्रभु नाहि माने। प्रभु कहे,—“आजि मोर हञाछे निमन्त्रणे ॥” 102 ॥ अनुवाद—बहुतसे ब्राह्मण महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण देते, किन्तु महाप्रभु किसीके भी निमन्त्रणको स्वीकार नहीं करते। महाप्रभु कहते,—“आज पहलेसे ही मुझे कहींसे निमन्त्रण हो चुका है ॥” 102 ॥ आचार्यकी लीला करनेवाले महाप्रभुके द्वारा मायावादियोंके सङ्गका त्याग :— एइमत प्रतिदिन करेन वञ्चन। संन्यासीर सङ्ग-भये ना मानेन निमन्त्रण ॥ 103 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रतिदिन मायावादी संन्यासियोंके सङ्गके भयसे उन ब्राह्मणोंके निमन्त्रणको स्वीकार नहीं करते ॥ 103 ॥ प्रकाशानन्दकी बहुतसे शिष्योंके साथ मायावादकी व्याख्या :— प्रकाशानन्द श्रीपाद सभाते बसिया। 'वेदान्त' पड़ान बहु शिष्यगण लञा ॥ 104 ॥ अनुवाद—एक प्रमुख मायावादी संन्यासी प्रकाशानन्द सरस्वती बहुतसे शिष्योंकी सभा करके उनको 'वेदान्त' पढ़ाते थे ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—'प्रकाशानन्द'—श्रीमहाप्रभुके समकालीन काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके एक विशेष संन्यासी थे। चैः भाः मध्यखण्ड तीसरे अध्यायमें— “'हस्त', 'पद', 'मुख' मोर नाहिक 'लोचन'। वेद मोरे एइमत करे विड़म्बन ॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेइ बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड ॥ बाखानये वेद, मोर विग्रह ना माने। सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, तबु नाहि जाने॥ सर्वयज्ञमय मोर ये अङ्ग-पवित्र। 'अज', 'भव' आदि गाय याँहार चरित्र ॥ 'पुण्य' पवित्रता पाय ये-अङ्ग-परशे। ताहा 'मिथ्या' बोले बेटा केमन साहसे॥” [अर्थात् “महाप्रभु कह रहे हैं—बेटा प्रकाशानन्द काशीमें मेरे विषयमें ऐसा पढ़ाता है कि मेरे हाथ, पैर, मुख, नेत्रादि कुछ नहीं हैं। इस प्रकार मेरे नित्य रूपको अस्वीकारकर मुझे निराकार कहकर वह लोगोंके साथ 106 |

सतरहवाँ अध्याय 17/104–114 ] छल करता है। वह बेटा वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरे नित्य विग्रहको नहीं मानता। इस प्रकार वह मानो मेरे अङ्ग खण्ड-खण्ड करके मुझे निराकार कहता है। इस अपराधके कारण उसके सभी अङ्गोंमें कोढ़का रोग हो गया है, तब भी इस सत्यको नहीं समझता। मेरे अङ्ग परम पवित्र और यज्ञमय हैं। ब्रह्मा, शङ्करादि उनकी महिमाका गान करते हैं। जिनके स्पर्श-मात्रसे सभी पुण्यवान् और पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीअङ्गोंको मिथ्या कहनेका बेटा किस प्रकार साहस करता है?"] चैः भाः मध्यखण्ड बीसवें अध्यायमें— “संन्यासी 'प्रकाशानन्द' बसये काशीते। मोरे खण्ड खण्ड बेटा करे भालमते॥ पड़ाय 'वेदान्त', मोर 'विग्रह' ना माने। कुष्ठ कराइलुँ अङ्गे, तबु नाहि जाने॥ 'सत्य' मोर लीला-कर्म, सत्य मोर 'स्थान'। इहा 'मिथ्या' बोले, मोरे करे खान्-खान्॥” [अर्थात् “संन्यासी 'प्रकाशानन्द' काशीमें रहकर अच्छे प्रकारसे मेरे खण्ड-खण्ड करता है। वह वेदान्त पढ़ाता है, किन्तु मेरे नित्य विग्रहको नहीं मानता। मैंने उसके अङ्गोंमें कोढ़का रोग कराया, तब भी यह बात वही नहीं समझता। मेरी लीलाएँ और मेरा धाम, सब सत्य हैं, किन्तु इन्हें वह मिथ्या कहकर मेरे खण्ड-खण्ड करता है।"] श्रील गोपालभट्ट गोस्वामीके श्रीगुरुदेव और पूर्वाश्रमके चाचा श्रीरङ्गक्षेत्रवासी त्रिदण्डिपाद श्रीरामानुजीयस्वामी श्रीश्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वती एवं ये (प्रकाशानन्द) कभी भी 'एक' व्यक्ति नहीं है॥ 104॥ प्रकाशानन्दको एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुके चरित्रका वर्णन :— एक विप्र देखि' आइला प्रभुर व्यवहार। प्रकाशानन्द-आगे कहे चरित्र ताँहार॥ 105॥ “एक संन्यासी आइला जगन्नाथ हैते। ताँहार महिमा-प्रताप ना पारि वर्णिते॥ 106॥ ईश्वरके लक्षण-समूह महाप्रभुमें विराजमान :— सकल देखिये ताँते अद्भुत-कथन। प्रकाण्ड-शरीर, शुद्धकाञ्चन-वरण॥ 107॥ आजानुलम्बित भुज, कमल-नयन। यत किछु ईश्वरेर सर्व सल्लक्षण॥ 108॥ अनुवाद—एक ब्राह्मण महाप्रभुके अद्भुत व्यवहारको देखकर आया और प्रकाशानन्दके सामने महाप्रभुकी महिमा कहने लगा,—“एक संन्यासी जगन्नाथ पुरीसे आये हैं, मैं उनकी महिमा और प्रतापका वर्णन नहीं कर सकता। उनकी सभी बातें अद्भुत हैं। उनका दिव्य शरीर प्रकाण्ड है, शुद्ध स्वर्णके जैसा उनका वर्ण है, उनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं और उनके नयन कमलके समान हैं। उनमें ईश्वरके समस्त सद्-लक्षण हैं॥ 105-108॥ भागवतमें कथित ईश्वर अथवा महाभागवतके समस्त लक्षण महाप्रभुमें विद्यमान :— ताहा देखि' ज्ञान हय—'एइ नारायण'। येइ ताँरे देखे, करे कृष्णसङ्कीर्त्तन॥ 109॥ 'महाभागवत'-लक्षण शुनि भागवते। से-सब लक्षण प्रकट देखिये ताँहाते॥ 110॥ 'निरन्तर कृष्णनाम' जिह्वा ताँर गाय। दुइ-नेत्रे अश्रु बहे गङ्गाधारा-प्राय॥ 111॥ क्षणे नाचे, हासे, गाय, करये क्रन्दन। क्षणे हुहुङ्कार करे,—सिंहेर गर्जन॥ 112॥ अलौकिक-नामरूपगुणलीलायुक्त श्रीकृष्णचैतन्य :— जगन्मङ्गल ताँर 'कृष्णचैतन्य' नाम। नाम, रूप, गुण ताँर, सब-अनुपम॥ 113॥ श्रद्धावान्‌को ईश्वरके दर्शन होनेपर उनकी कृपासे ही उनकी चेष्टाओंका अनुभव, केवल तर्कपन्थासे श्रवण निष्फलमात्र :— देखिले से जानि ताँर 'ईश्वरेर रीति'। अलौकिक कथा शुनि' के करे प्रतीति?”॥ 114॥ । 107

[ 17/109-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-उन्हें देखकर ऐसा लगता है-मानो 'ये श्रीनारायण' ही हैं। जो कोई भी उनके दर्शन करता है, वह श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करने लगता है। 'भागवत'में मैंने महाभागवतके जिन लक्षणोंके विषयमें सुना है, उन सब लक्षणोंको मैं उनमें प्रकाशित देखता हूँ। उन संन्यासीकी जिह्वा 'निरन्तर श्रीकृष्णनाम'का गान करती है और उनके दोनों नेत्रोंसे गङ्गाकी धाराकी भाँति अश्रु प्रवाहित होते हैं। वे संन्यासी कभी तो नृत्य करते हैं, हँसते हैं, गान करते हैं, क्रन्दन करते हैं और कभी सिंहकी गर्जनकी भाँति हुङ्कार भरते हैं। उनका जगत्का मङ्गल करनेवाला 'श्रीकृष्णचैतन्य' नाम है। उनका नाम, रूप, गुण आदि सब कुछ अनुपम है। उनकी अलौकिक कथा केवल सुननेसे ही किसको विश्वास होगा? देखनेपर ही कोई उनके ईश्वर होनेमें विश्वास करेगा॥” 109-114 ॥ महाप्रभुके चरित्रको सुनकर तर्कपन्थी प्रकाशानन्दके द्वारा महाप्रभुके प्रति व्यङ्ग अथवा अवज्ञा :- शुनिया प्रकाशानन्द बहुत हासिला। विप्रे उपहास करि' कहिते लागिला ॥ 115 ॥ अपने मायावाद रूपी हलाहलको उगलना :- “शुनिय़ाछि गौड़देशेर संन्यासी—'भावुक'। केशव-भारती-शिष्य, लोकप्रतारक ॥ 116 ॥ 'चैतन्य'-नाम ताँर, भावुकगण लञा। देशे-देशे, ग्रामे-ग्रामे बुले नाचाञा ॥ 117 ॥ येइ ताँरे देखे, सेइ ईश्वर करि' कहे। ऐछे मोहन-विद्या—ये देखे, से मोहे ॥ 118 ॥ सार्वभौम भट्टाचार्य—पण्डित प्रबल। शुनि' चैतन्येर सङ्गे हइल पागल ॥ 119 ॥ 'संन्यासी'—नाम-मात्र, महा-इन्द्रजाली! 'काशीपुरे' ना बिकावे ताँर भावकालि ॥ 120 ॥ 'वेदान्त' श्रवण कर, ना याइह ताँर पाश। उच्छृङ्खल-लोक-सङ्गे दुइलोक-नाश ॥” 121 ॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणकी बातोंको सुनकर प्रकाशानन्द बहुत हँसे। उस ब्राह्मणका उपहास करते हुए वे कहने लगे,-“मैंने उसके विषयमें सुना है। वह गौड़देशका संन्यासी है और 'भावुक' है। सुना है कि वह केशव भारतीका शिष्य है। परन्तु वह एक बड़ा ढोंगी है। उसका नाम 'चैतन्य' है। वह भावुक व्यक्तियोंको अपने साथ लेकर देश-देश, गाँव-गाँवमें सबको नचाते हुआ घूमता रहता है। जो भी उसे देखता है, वही उसे ईश्वर कहता है। उसमें ऐसी मोहन-विद्या है कि जो भी उसे देखता है, वह मोहित हो जाता है। मैंने सुना है कि इतने बड़े विद्वान पण्डित श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य भी चैतन्यके सङ्गसे पागल हो गये हैं। वह नाममात्रका संन्यासी है, वास्तवमें तो वह महा-इन्द्रजाली (जादूगर) है। इस 'काशीपुरी'में उसकी भावुकता नहीं बिकेगी। तुम वेदान्तका श्रवण करो और उसके पास मत जाना। उच्छृङ्खल लोगोंका सङ्ग करनेसे यह लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं॥” 115-121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भावकालि'—भावुकका स्वभाव। जिन सब व्यक्तियोंने शास्त्रविधिकी बेड़ियोंको तोड़ दिया है, उनके साथ रहनेसे इस लोक और परलोक, दोनों लोकोंका ही नाश होता है ॥ 120-121 ॥ अनुभाष्य- 'भावुक'—श्रीमन्महाप्रभुके परम चमत्कारमय अप्राकृत चिन्मय भावों और मनोधर्मके द्वारा कृत्रिम (दिखावटी) और थोड़े समय टिकनेवाले उच्छ्वास और उच्छृङ्खलतामय भावोंको 'एक' समझकर मायावादी प्रकाशानन्द यह कह रहे हैं। मायावादी शुद्धभक्तोंके अप्राकृत श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाओंके कीर्तन, नृत्य और गानको भी जागतिक इन्द्रियोंकी सन्तुष्टि करनेवाले नाचने-गाने-बजाने जैसा ही समझते हैं। वे इस कीर्तन-नृत्यादिको कामादि छः शत्रुओंकी दासताकी भाँति इन्द्रियोंकी चेष्टामात्र समझनेके कारण 'अपराधी' अथवा 'पाखण्डी' कहलाने योग्य हैं। वे नित्य स्वधर्म, श्रीकृष्णानुशीलनके श्रीकृष्ण-सम्बन्धी उपकरणके परित्यागके कारण “फल्गु-वैरागी” हैं॥ 116-121 ॥ 108 ।

सत्रहवाँ अध्याय 17/122-129 ] महाप्रभुकी निन्दा सुननेपर ब्राह्मणके द्वारा 'श्रीकृष्ण' स्मरण करते हुए स्थानका परित्याग :- एत शुनि' सेइ विप्र महादुःख पाइला। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' तथा हैते उठि' गेला॥ 122॥ अनुवाद—प्रकाशानन्दके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर उस ब्राह्मणको बहुत दुःख हुआ। वह 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते हुए तुरन्त वहाँसे उठकर चला गया॥ 122॥ महाप्रभुके दर्शनके फलसे शुद्धचित्त ब्राह्मणका महाप्रभुसे समस्त घटनाका वर्णन :- प्रभुर दर्शने शुद्ध हञाछे तौर मन। प्रभु-आगे दुःखी हञा कहे विवरण ॥ 123 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनसे उस ब्राह्मणका मन शुद्ध हो गया था। उस ब्राह्मणने दुःखी होकर आकर महाप्रभुको सारा वृत्तान्त बतलाया ॥ 123 ॥ महाप्रभुका मन्द-मन्द मुस्कराना :- शुनि' महाप्रभु तब ईषत् हासिला। पुनरपि सेइ विप्र प्रभुरे पुछिला ॥ 124 ॥ मायावादियोंकी प्रकृति-सम्बन्धित गौण-नाम उच्चारण करनेकी ही योग्यता, अप्राकृत वैकुण्ठ-नाम-उच्चारणमें अयोग्यता :- “तार आगे यबे आमि तोमार नाम लइल। सेह तोमार नाम जाने, - आपने कहिल ॥ 125 ॥ तोमार 'दोष' करिते करे नामेर उच्चार। 'चैतन्य' 'चैतन्य' करि' कहे तिनबार ॥ 126 ॥ चिद्-विलासमें अविश्वासके कारण मायावादियोंके मुखसे अवज्ञापूर्वक ही श्रीनामके उच्चारित होनेसे नामापराधके कारण वह श्रवण योग्य नहीं :- तिनबारे 'कृष्णनाम' ना आइल तार मुखे। 'अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' पाइ दुःखे ॥ 127 ॥ महाप्रभुसे इसके कारणकी जिज्ञासा :- इहार कारण मोरे कह कृपा करि'। तोमा देखि' मुख मोर बले 'कृष्ण' 'हरि' ॥" 128 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द मुस्कुराये। उस ब्राह्मणने पुनः महाप्रभुसे पूछा, - "जब मैंने उसके सामने आपका नाम लिया, तब उसने स्वयं ही कहा कि वह आपका नाम जानता है। आपके दोषोंको बतलानेके लिये उसने आपका नाम लेते हुए केवल 'चैतन्य' तीन बार कहा। तीनों बार कृष्णनाम उसके मुखमें नहीं आया। उसने अवज्ञासे आपका नाम लिया, जिसे सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। आप कृपा करके मुझे इसका कारण बतलाइये। आपको देखते ही मेरे मुखसे तो 'कृष्ण' 'हरि' नाम निकलता है॥"124-128 ॥ अनुभाष्य- 'तार' - प्रकाशानन्दका। 'दोष'- निन्दा। 'ब्रह्म', 'चैतन्य', 'आत्मा', 'परमात्मा', 'जगदीश', 'ईश्वर', 'विराट', 'विभु', 'भूमा', 'विश्वरूप', 'व्यापक' आदि श्रीकृष्णके गौण नाम हैं। इन सब नामोंको ग्रहण करनेवाले श्रीकृष्णके औदार्य और माधुर्यके प्रति आकर्षित नहीं होते। इन नामोंमें श्रीकृष्णका कुछ ऐश्वर्य अवश्य ही प्रकाशित होता है, परन्तु इन नामोंमें मुख्य श्रीकृष्ण नामसे अभिन्न उनके चैतन्यरसविग्रहत्वकी स्फूर्ति नहीं है। इसलिये मायावादी लोग या प्रकृतिके उपासकगण तत्त्व-वस्तुकी चरम अवस्थाको निर्विशेष अथवा चिद्विलाससे रहित होनेकी धारणा करते हैं। तत्त्व-वस्तु श्रीकृष्ण अपने चिन्मय नाम-रूप-गुण-लीला और परिकरोंसे अभिन्न हैं, इस बातमें वे अविश्वास और संशयका पोषण करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके मुख्य नाम ही एकमात्र 'साध्य' और 'साधन' हैं, ऐसा मानकर उनमें श्रद्धा नहीं करनेसे वे महापराधी हैं। अपने नित्य चरम-कल्याणकी कामना करनेवालेको उनके मुखसे किसी भी परमार्थकी बातको श्रवण नहीं करना चाहिये ॥ 125-127 ॥ मायावादी-सेवा-विवादी अथवा अपराधी, इसलिये उनके मुखमें श्रीकृष्णनाम नहीं आता :- प्रभु कहे, - "मायावादी कृष्णे अपराधी। 'ब्रह्म' 'आत्मा' 'चैतन्य' कहे निरवधि ॥ 129 ॥ 109

[ 17/129-133 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णविग्रह और श्रीकृष्णस्वरूपका अद्वय-ज्ञान-सम्पन्न होना एवं जीवनाम, जीवमूर्ति और जीवके स्वरूपके अन्तरका वर्णन :- अतएव तार मुखे ना आइसे कृष्णनाम। 'कृष्णनाम', 'कृष्ण स्वरूप'—दुइत' 'समान' ॥ 130 ॥ 'नाम', 'विग्रह', 'स्वरूप'—तिन एकरूप। तिने 'भेद' नाहि,—तिन 'चिदानन्द-रूप' ॥ 131 ॥ देह-देहीर, नाम-नामीर कृष्णे नाहि 'भेद'। जीवेर धर्म—नाम-देह-स्वरूपे 'विभेद' ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'मायावादी लोग श्रीकृष्णके चरणोंमें अपराधी हैं, इसलिये वे केवल 'ब्रह्म', 'आत्मा', 'चैतन्य' आदि ही कहते हैं। इसी कारण श्रीकृष्णनाम उनके मुखमें नहीं आता। श्रीकृष्णनाम और श्रीकृष्ण-स्वरूप—दोनों एक समान हैं। श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णका विग्रह और श्रीकृष्णका स्वरूप तीनों एक ही हैं। तीनोंमें कोई भेद नहीं है, तीनों 'चिदानन्द-रूप' हैं। श्रीकृष्णके शरीर और उनमें अथवा उनके नाम और उनमें कोई भेद नहीं है। नाम, शरीर और स्वरूपमें परस्पर भेद तो बद्धजीवका होता है॥ 129-132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—मायावादी जीवतत्त्वको 'अप्राकृत' न मानकर, मायासे ढके ब्रह्मखण्डको 'जीव' कहकर स्थिर करते हैं और ब्रह्मको 'निर्विशेष' जानकर (सच्चिदानन्द) भगवद्-विग्रहको भी 'मायामय- विग्रह' कहते हैं। इसीसे ही मायावादी श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाको 'अनित्य' जानकर महापराधी हुए हैं। वे श्रीकृष्णके 'मुख्यनाम'का परित्याग करके 'ब्रह्म', 'आत्मा', 'चैतन्य' आदि 'गौण-नामों'का उच्चारण करते हैं। यद्यपि कभी 'गोविन्द', 'माधव', 'कृष्ण'—ये सब 'मुख्यनाम' उनके मुखसे निकलें, तथापि उनके ज्ञानदोषसे (श्रीकृष्णनाममें अविश्वास होनेके कारण उन मुख्य नामोंको अन्यान्य प्राकृत अथवा जागतिक एक शब्द माननेके कारण उनके मुखसे) चिद्-विग्रह श्रीकृष्णका 'नाम' कभी भी (बाहर) नहीं निकलता। वास्तवमें श्रीकृष्णका नाम और श्रीकृष्णका स्वरूप—दोनों ही चिद्-वस्तु हैं, अर्थात् नाम, विग्रह और स्वरूप—तीनों ही चिदानन्दमय हैं। बद्धजीवोंकी देह—जीवरूपी 'देही'से 'पृथक्' है। इसी प्रकार उनके पिताके द्वारा दिया गया 'नाम' और उनकी 'आत्मा' अथवा 'स्वरूप'से 'पृथक् और जड़ाश्रित' है। किन्तु श्रीकृष्णमें वैसा नहीं है, अर्थात् श्रीकृष्णकी जो 'देह' है, वही 'देही' है, जो नाम है, वही नामी है। श्रीकृष्णमें माया अथवा मायासे उत्पन्न जड़सम्बन्ध नहीं होनेके कारण उनके 'देह-देही' अथवा 'नाम-नामी'के बीचमें भेद असम्भव है। बद्धजीवके पक्षमें ही देह-देही अथवा नाम-नामी (इनके बीचमें पार्थक्य वर्तमान) है अर्थात् जीवमें ही 'नाम', 'देह' और 'स्वरूप'का परस्पर पृथक् धर्म विद्यमान है॥ 129-132 ॥ अनुभाष्य—'मायावादी'—आदिलीला, 7/29 और 7/39 संख्या देखें॥ 129 ॥ श्रीकृष्णनामका स्वरूप :- पद्मपुराण और विष्णुधर्मोत्तरका वचन— नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः। पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वात्नामनाभिनोः ॥ 133 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णनाम—चित्स्वरूप एक विशेष चिन्तामणि है, वह श्रीकृष्ण-चैतन्य-रसका विग्रह स्वरूप है। वह पूर्ण है अर्थात् मायिक वस्तुकी भाँति बँधा हुआ और खण्ड नहीं है। वह-शुद्ध अर्थात् मायासे मिश्रित नहीं है। वह-नित्यमुक्त अर्थात् सर्वदा चिन्मय है, कभी भी जड़सम्बन्धमें आबद्ध नहीं है; क्योंकि नाम और नामीके स्वरूपमें कोई भेद नहीं है॥ 133 ॥ अनुभाष्य— नाम-नाभिनोः (नाम च नामी कृष्णः च तयोः नाम्ना सह नाभिनः कृष्णस्य) अभिन्नत्वात् (भेदाभावात्) [कृष्ण] नाम-चिन्तामणिः (सकल-सेवाभीष्टप्रदाता), कृष्णः (साक्षात् स्वयंरूपः कृष्ण एव), चैतन्यरसविग्रहः (चिन्मयरसमूर्तिः, न तु 110 |

सत्रहवाँ अध्याय 17/133-137 ] अचिज्जड़वैरस्याश्रयः, तस्य मायातीतत्वात्, मायामिश्रण- योग्यताभावात्), पूर्णः (मायया खण्डनानर्हतनुः), शुद्धः (मायाविमिश्रः, व्युदस्तमायः), नित्यमुक्तः (सदा जड़ातीतः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। चिन्तामणि अर्थात् सबको अभीष्ट सेवा प्रदान करनेवाले ॥ 133 ॥ श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णदेह और श्रीकृष्णविलास- अप्राकृत, चिन्मय और स्वतःप्रकाश :- अतएव कृष्णेर 'नाम', 'देह', 'विलास'। प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय स्वप्रकाश ॥ 134 ॥ श्रीकृष्णका नाम, रूप, गुण, लीला-एक ही वस्तु :- 'कृष्णनाम', 'कृष्णगुण', 'कृष्णलीला'वृन्द। कृष्णेर स्वरूप-सम-सब चिदानन्द ॥ 135 ॥ अनुवाद-इसलिये स्वयं प्रकाशित होनेके कारण श्रीकृष्णका नाम, उनकी देह और उनकी लीला प्राकृत (जड़ीय) इन्द्रियोंके द्वारा नहीं समझे जा सकते। श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णके गुण तथा श्रीकृष्णकी लीलाएँ-श्रीकृष्णके स्वरूपके समान ही सभी चिदानन्दमय हैं॥ 134-135 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी देह, श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णका रूप, श्रीकृष्णके गुण, श्रीकृष्णकी लीलाएँ और परिकर-वैशिष्ट्यादि सच्चिदानन्दमय होनेके कारण सत्त्वादि तीन गुणोंके अभिमानी जीवके जड़ीय रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्शादिके द्वारा ग्रहण अथवा अनुभव नहीं किये जा सकते। ये जीवकी फलभोगमें प्रवृत्त इन्द्रियोंकी भोग्य वस्तु नहीं हैं। ये समस्त ही स्वप्रकाशवस्तु, नित्य चिन्मय और आनन्दमय हैं। गुणोंके अन्तर्गत जड़ वस्तुके नाम, रूप, गुण और क्रियाके बीचमें परस्पर जड़ीय पार्थक्य होता है, एकत्व नहीं होता; किन्तु अधोक्षज श्रीकृष्णमें ऐसा 'भेद' नहीं है ॥ 134 ॥ अप्राकृत श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीला-शुद्धभक्तिके द्वारा ही ग्राह्य, तर्कपन्थासे इन्द्रियोंके ज्ञानसे अगोचर :- अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥ 136 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अतएव श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण- लीला कभी भी प्राकृत नेत्रों-कानों आदिके द्वारा ग्राह्य नहीं हैं। जब जीव सेवोन्मुख होता है, अर्थात् चित्-स्वरूपसे श्रीकृष्णोन्मुख होता है, तभी अप्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंपर श्रीकृष्णनामादि स्वयं ही स्फुरित होते हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य- अतः (कृष्ण-नामादिना सह कृष्णस्य प्राकृत-भेदाभावात्), श्रीकृष्णनामादि (श्रीकृष्णनामरूपगुणलीला-परिकर-वैशिष्ट्यम्) इन्द्रियैः (प्राकृतभोगपरैर्नेत्रकर्णनासाजिह्वात्वगादिभिः) ग्राह्यं (रूपशब्दगन्धरसस्पर्शादिविषयीकृतं) न भवेत् (कर्हिचित् न स्यात्)। (ननु अस्यैवाधोक्षजत्वात् सर्वथेदं जड़- भोगपरेन्द्रियाणामलभ्यञ्च, तर्हि कथमेतत् कीदृशानां जीवानामाश्रयितव्यमिति चेत्, तत्राह-) सेवोन्मुखे (अप्राकृतबुद्ध्या शुद्धकृष्णभजन-प्रवृत्ते) जिह्वादौ (शुद्धसत्त्वमये इन्द्रिये) हि (खलु) अदः (कृष्णनामादि) स्वयमेव स्फुरति (प्रकटयति)। श्लोक-भावानुवाद-इसलिये श्रीकृष्ण-नामादिसे श्रीकृष्णके अभिन्न होनेके कारण श्रीकृष्णनाम- रूप-गुण-लीलापरिकर-वैशिष्ट्य प्राकृतभोगपर नेत्र-कर्ण- नासिका-जिह्वा-त्वचादि इन्द्रियोंके ग्राह्य रूप-शब्द-गन्ध- रस-स्पर्शादि विषयोंके समान कभी भी ग्रहण नहीं किये जा सकते। (निश्चय ही श्रीकृष्ण-नामादि अधोक्षज होनेके कारण सर्वथा ही जड़-भोगपर इन्द्रियोंसे अलभ्य हैं, तब कब और किस प्रकार जीवोंको नामका आश्रय प्राप्त होता है, इसे कह रहे हैं-) अप्राकृत बुद्धिसे शुद्धकृष्णभजनमें प्रवृत्त जिह्वादि शुद्धसत्त्वमय इन्द्रियोंपर ही श्रीकृष्णनामादि स्वयं ही प्रकटित होते हैं ॥ 136 ॥ परम-चमत्कारमय श्रीकृष्ण-माधुर्य- ब्रह्मज्ञानीको भी आकर्षित करनेवाला :- ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द लीलारस। ब्रह्मज्ञानी आकर्षिया करे आत्मवश ॥ 137 ॥ अनुवाद-पूर्ण आनन्दमय लीलारस ब्रह्मज्ञानीको । 111

[ 17/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्रह्मानन्दसे भी आकर्षित करके अपने वशमें करता है॥137॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं ही ब्रह्म हूँ'—ऐसी बुद्धि जिन लोगोंकी उदित होती है, उनमें माया चिन्ता दूर होकर चित्स्वरूप-ब्रह्ममें अवस्थितिरूप थोड़ा सा सुखका उदय तो होता है; किन्तु जो लोग श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णरूप, श्रीकृष्णगुण और श्रीकृष्णलीला-रूपी चिन्मय रस-विलास हृदयमें उदित करा पाते हैं, वे 'ब्रह्मानन्द'से अनन्त गुणा श्रेष्ठ पूर्णानन्द लीलारस भोग करते हैं। इसलिये पूर्णानन्द लीलारस-स्वरूप श्रीकृष्णलीला सहसा ब्रह्मज्ञानीको भी आकर्षित करके अपने वशमें कर लेती है॥137॥ श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यसे आकर्षित ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मरात :- श्रीमद्भागवतमें (12/12/69)— स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो- ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्। व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ 138 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो पहले ब्रह्मसुखमें एकान्तचित्त थे और बादमें जिन्होंने उस सुखको परित्याग करके श्रीकृष्णकी माधुर्यमयी लीलासे आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण-सम्बन्धी तत्त्वदीप-स्वरूप श्रीभागवत पुराणका विस्तार किया था; उन समस्त प्रकारके पापोंका नाश करनेवाले गुरुदेव व्यासपुत्र श्रीशुकको मैं नमस्कार करता हूँ॥ 138 ॥ अनुभाष्य—वास्तविक रूपमें सुननेके अभिलाषी शौनकादि ऋषियोंके समक्ष श्रीभागवतके वर्णनको समाप्त करके महाभागवत श्रीसूत गोस्वामी अपने गुरुदेव ब्रह्मरात श्रील शुक-गोस्वामीको प्रणाम कर रहे हैं,— स्वसुखनिभृतचेताः (स्वस्य आत्मनः सुखेन निभृतं पूर्णं चेतो यस्य सः, आत्माराम इत्यर्थः) तद्व्युदस्तान्यभावः (तत् तेनैव आत्मारामत्वेन व्युदस्तः सम्यग्-दूरीकृतः अन्यभावो ब्रह्मेतरे अन्यस्मिन् वस्तुनि भावः रतिः यस्य तथाभूतः) अपि अजितरुचिरलीलाकृष्टसारः (अजितस्य कृष्णस्य रुचिराभिः मनोज्ञाभिः लीलाभिः आकृष्टः सारः स्वसुखगतं स्थैर्यं यस्य सः) यः तत्त्वदीपं (परमार्थभूत-वस्तु-प्रकाशकं) तदीयं (भगवल्लीलामयं) पुराणं (दशविधलक्षणमय-सन्दर्भात्मकं श्रीमद्भागवतं) कृपया (लोकस्याजानतः हिताय, सुकृतिवतां मङ्गलाकाङ्क्षया वा) व्यतनुत (प्रकटितवान्), तम् अखिलवृजिनघ्नं (सर्वपापनुदं) व्याससूनुं (द्वैपायनात्मजं वैयासकीं शुकदेवं) नतः अस्मि (प्रणमामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ परम चमत्कारपूर्ण श्रीकृष्णगुण-आत्मारामगणोंको भी आकर्षित करनेवाले :- ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द कृष्णगुण। अतएव आकर्षय आत्मारामेर मन ॥ 139 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके गुण पूर्ण-आनन्दमय हैं, इसलिये वे आत्मारामगणोंके मनको ब्रह्मानन्दसे भी आकर्षित कर लेते हैं॥ 139 ॥ मुक्तपुरुषगण भी श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति आकृष्ट :- श्रीमद्भागवत (1/7/10)में— आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणोः हरिः ॥ 140 ॥ अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्के चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है॥ 140 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/186 संख्या देखें ॥ 140 ॥ श्रीकृष्णचरण-तुलसी ब्रह्मज्ञोंके भी मनोहारिणी :- एइ सब रहु—कृष्णचरण-सम्बन्धे। आत्मारामेर मन हरे तुलसीर गन्धे ॥ 141 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी लीलाओंकी बात तो छोड़ो, श्रीकृष्णके चरणोंमें अर्पित होनेपर तुलसीकी गन्धमात्र ही आत्मारामोंके मनका हरण कर लेती है ॥ 141 ॥ 112 |

सतरहवाँ अध्याय 17/142–145 ] श्रीनारायण-चरणकी तुलसी ब्रह्मज्ञ चतुःसनके भी देह और मनकी शुद्ध-सात्त्विक-विकारकारिणी :- श्रीमद्भागवत (3/15/43)में- तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द किञ्जल्कमिश्र-तुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन कमल-नेत्र-भगवान्‌के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था॥ 142 ॥ अनुभाष्य—मैत्रेय-विदुरके संवादमें दितिके गर्भके प्रभावसे भयभीत देवताओंको ब्रह्मा दितिके गर्भमें स्थित दोनों असुरोंका पूर्व-वृत्तान्त सुना रहे हैं,-पहले एकबार ब्रह्मर्षि चतुःसन अथवा कुमारगण श्रीनारायणके दर्शनकी अभिलाषासे वैकुण्ठमें प्रवेश करके जब सातवें कक्षमें पहुँचे, तब 'जय' और 'विजय' नामक दो द्वारपालोंने उन्हें रोक दिया। भेदबुद्धिसे उत्पन्न द्वेषप्रवृत्तिके कारण क्रोधित द्वारपालोंको उन्होंने असुर योनिमें जन्म ग्रहण करनेका शाप दिया। सर्वज्ञ भगवान् पद्मनाभ यह जानकर उसी समय स्वयं ही लक्ष्मीजीके सहित वहाँ आ गये। ऋषियोंने अपनी ब्रह्मसमाधिके फल आराध्यदेव साक्षात् भगवान् श्रीनारायणको अपने समक्ष देखकर प्रणाम किया, उनके जैसे आत्माराम ब्रह्मज्ञानियोंके भाव-विकारका वर्णन,- अरविन्दनयनस्य (पद्मलोचनस्य) तस्य (भगवतः) पदारविन्दकिञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः (पदारविन्दयोः चरणकमलयोः किञ्जल्कैः केशरैः मिश्रा या तुलसी, तस्याः मकरन्देन संयुक्तः समीरणः) स्वविवरेण (निजनासारन्ध्रेण) अन्तर्गतः (अन्तःप्रविष्टः सन्) अक्षरजुषां (निर्विशेष-ब्रह्मपराणाम् अपि) तेषां (सनकादीनां कुमाराणां) चित्ततन्वोः (मनःशरीरयोः) संक्षोभं (चित्ते हर्षं देहे रोमाञ्चादिकं) चकार (अजीजनत्) । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ मायावादी लोग नित्य श्रीकृष्णसेवाके विरोधी होनेके कारण शुद्ध-नाम कीर्तनमें अनधिकारी :- अतएव 'कृष्णनाम' ना आइसे तार मुखे। मायावादिगण याते महा बहिर्मुखे ॥ 143 ॥ प्रेमकी बाढ़में काशीको डुबानेके लिये ही महाप्रभुका आगमन :- भावकालि बेचिते आमि आइलाङ काशीपुरे। ग्राहक नाहि, ना बिकाय, लञा याब घरे ॥ 144 ॥ लोभरूपी मूल्यसे ही महाप्रभुकी प्रेम-वितरणकी प्रतिज्ञा :- भारी बोझा लञा आइलाङ, केमने लञा याब ? अल्प-स्वल्प मूल्य पाइले, एथाइ बेचिब ॥" 145 ॥ अनुवाद—मायावादी लोग श्रीकृष्णसे अत्यन्त बहिर्मुख होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण-अपराधी होनेके कारण 'श्रीकृष्णनाम' प्रकाशानन्दके मुखमें नहीं आया। मैं भक्तिपूर्ण भावोंको बेचनेके लिये काशी नगरीमें आया था, किन्तु यहाँपर उनका कोई ग्राहक नहीं है। मैंने सोचा था कि यदि यहाँ बिक्री नहीं होगी, तब मैं उन्हें अपने घर लौटा ले जाऊँगा। परन्तु यहाँ बेचनेके लिये मैं इतना भारी बोझा उठाकर लाया हूँ, तब कैसे उसे लौटाकर ले जाऊँगा? इसलिये मूल्यका स्वल्प अंश भी मिलनेपर मैं उन्हें यहीं बेच दूँगा ॥" 143-145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्मय नामरसका पात्र—अतिशय भारी बोझा है। मैं पूर्ण श्रद्धा-मूल्यमें उसे जीवोंको बिक्री करता हूँ। व्यापारीके लिये इतना भारी बोझा लौटाकर ले जाना भी बहुत कठिन है, इसलिये अल्प-स्वल्प मूल्य अर्थात् श्रद्धा आभासरूपी मूल्य मिलनेपर भी इसी स्थानपर बेचकर जाऊँगा ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—'अल्प-स्वल्प-मूल्य'-श्रीकृष्ण सेवामें लौल्य, लोभ अथवा रुचि; वह आत्मसमर्पणके बिना प्राप्त नहीं की जा सकती। मध्यलीला 8/70 संख्यामें उद्धृत पद्यावलीका श्लोक 'कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः' इस स्थानपर विचारणीय है ॥ 145 ॥ । 113

[ 17/146-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्राह्मणपर कृपा करनेके बाद महाप्रभुकी मथुरा यात्रा :- एत बलि' सेइ विप्रे आत्मसात् करि'। प्राते उठि' मथुरा चलिला गौरहरि ॥ 146 ॥ तीन लोगोंके द्वारा महाप्रभुका अनुगमन और महाप्रभुके आग्रहसे लौटकर जाना :- सेइ तीन सङ्गे चले, प्रभु निषेधिल। दूर हैते तिनजने घरे पाठाइल ॥ 147 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उस ब्राह्मणको अपने भक्तके रूपमें ग्रहण कर लिया। अगले दिन प्रातःकालमें उठकर श्रीगौरहरि मथुराकी ओर चल दिये। श्रीतपन मिश्र, श्रीचन्द्रशेखर तथा महाराष्ट्र तीनों उनके साथ चलने लगे, किन्तु महाप्रभुने उन्हें सङ्ग चलनेसे मना किया और दूरसे महाप्रभुने उन्हें घर लौट जानेके लिये कहा ॥ 146-147 ॥ तीनोंका एक साथ मिलकर महाप्रभुके गुणोंका गान :- प्रभुर विरहे तिने एकत्र मिलिया। प्रभुगुण गान करे प्रेमे मत्त हञा ॥ 148 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मथुरा चले जानेके बाद उनके विरहमें वे तीनों परस्पर मिलकर महाप्रभुके गुणोंका गान करते थे। इस प्रकार वे प्रेममें मत्त हो जाया करते थे॥ 148 ॥ प्रयागमें आकर स्नानके बाद वेणीमाधवके दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-कीर्तन :- 'प्रयागे' आसिया प्रभु कैल नदी-स्नान। 'माधव' देखिया प्रेमे कैल नृत्यगान ॥ 149 ॥ अनुवाद—काशीसे महाप्रभु प्रयागमें आये और वहाँ त्रिवेणीके सङ्गममें स्नान किया। तब उन्होंने 'वेणी-माधव' विग्रहके दर्शन करके प्रेममें नृत्य और गान किया ॥ 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माधव'—वेणीमाधव ॥ 149 ॥ अनुभाष्य—'प्रयाग'— “प्रकृष्टः यागः यागफलं यस्मात्” [अर्थात् “प्रकृष्टरूपसे यज्ञका फल है जिसका”] तीर्थराज, गङ्गा और यमुनाका सङ्गम अथवा 'त्रिवेणी'—वर्तमान इलाहाबाद दुर्गसे कुछ दूरीपर प्राचीन 'प्रतिष्ठानपुर' अथवा वर्तमान 'झूसी' ॥ 149 ॥ यमुनाके दर्शनसे व्रजलीलाके उद्दीपनके कारण उसमें कूदना, भट्टके द्वारा उन्हें निकालना :- यमुना देखिया प्रेमे पड़े झाँप दिया। आस्ते-व्यस्ते भट्टाचार्य उठाय धरिया ॥ 150 ॥ अनुवाद—यमुनाको देखकर महाप्रभुने प्रेमावेशमें उसमें छलाँग लगा दी। बलभद्र भट्टाचार्यने तुरन्त उन्हें पकड़कर बाहर निकाला ॥ 150 ॥ प्रयागमें तीन दिन लोगोंका उद्धार :- एइमत तिनदिन प्रयागे रहिला। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥ 151 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु तीन दिन तक प्रयागमें रहे। उन्होंने श्रीकृष्ण-नाम-प्रेम देकर लोगोंका उद्धार किया ॥ 151 ॥ मथुराके मार्गमें जाते समय लोगोंका उद्धार :- 'मथुरा' चलिते पथे यथा रहि' याय। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोकेरे नाचाय ॥ 152 ॥ अनुवाद—मथुरा जानेके मार्गमें महाप्रभु जहाँ भी विश्रामके लिये रुकते, वे वहींपर ही श्रीकृष्ण-नाम-प्रेम देकर लोगोंको नचाते थे ॥ 152 ॥ दक्षिण देशकी भाँति पश्चिम देशका भी उद्धार :- पूर्वे येन 'दक्षिण' याइते लोक निस्तारिला। 'पश्चिम'-देशे तैछे सब 'वैष्णव' करिला ॥ 153 ॥ अनुवाद—दक्षिण भारतकी ओर जाते समय महाप्रभुने जिस प्रकार लोगोंका उद्धार किया था, उसी प्रकार उन्होंने पश्चिम भारतमें भी सभीको वैष्णव बना दिया ॥ 153 ॥ 114 |

सतरहवाँ अध्याय 17/154–163 ] यमुनाके दर्शनमात्रसे ही उसमें कूद जाना :- प्रेमावेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। एक पथे याँहा याँहा हय यमुना-दर्शन। ब्राह्मण महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़ा और वह भी प्रेममें ताँहा झाँप दिया पड़े प्रेमे अचेतन ॥ 154 ॥ आविष्ट होकर उनके साथ नृत्य करने लगा ॥ 157–158 ॥ अनुवाद—मार्गमें जहाँ-जहाँ भी महाप्रभुको यमुनाका दोनोंका नृत्य-कीर्तन :- दर्शन होता, वे वही छलाँग लगाकर उसमें कूद पड़ते दुँहे प्रेमे नृत्य करि' करे कोलाकुलि। तथा प्रेममें अचेतन हो जाते ॥ 154 ॥ 'हरि' 'कृष्ण' कहे दुँहे बलि बाहु तुलि' ॥ 159 ॥ मथुराके दर्शनसे प्रेमावेश :- अनुवाद—दोनों प्रेमावेशमें नृत्य कर रहे थे और मथुरा-निकटे आइला—मथुरा देखिया। उन्होंने एक-दूसरेको गले लगाया। अपनी भुजाओंको दण्डवत् हञा पड़े प्रेमाविष्ट हञा ॥ 155 ॥ उठाकर दोनों 'हरि' 'कृष्ण' आदि नामोंका कीर्तन कर रहे थे ॥ 159 ॥ अनुवाद—मथुराके निकट आनेपर मथुराको देखकर महाप्रभु भूमिपर पड़ गये और प्रेमाविष्ट होकर दण्डवत् लोगोंका कोलाहल, पुजारीके द्वारा प्रणाम किया ॥ 155 ॥ महाप्रभुके गलेमें माला देना :- लोक 'हरि' 'हरि' बोले, कोलाहल हैल। विश्राम-घाटमें स्नान और योगपीठमें श्रीकेशव-दर्शन :- 'केशव'-सेवक प्रभुके माला पराइल ॥ 160 ॥ मथुरा आसिया कैला 'विश्राम-तीर्थे' स्नान। 'जन्मस्थाने' 'केशव' देखि' करिला प्रणाम ॥ 156 ॥ अनुवाद—वहाँ उपस्थित सभी लोग जोर-जोरसे 'हरि' 'हरि' बोलकर कीर्तन करने लगे, वहाँ कोलाहल अनुवाद—मथुरामें आकर महाप्रभुने विश्राम-घाटपर मच गया। भगवान् श्रीकेशवके सेवकने महाप्रभुको स्नान किया। तब महाप्रभु श्रीकृष्ण-जन्मभूमिपर आये माला लाकर पहनायी ॥ 160 ॥ और वहाँ भगवान् श्रीकेशवको देखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ 156 ॥ महाप्रभुके प्रेमकी 'अलौकिक'के रूपमें लोगोंको प्रतीति :- लोके कहे, प्रभु देखि' हञा विस्मय। अमृतप्रवाह भाष्य— विश्राम-तीर्थ'—प्रसिद्ध विश्रामघाट। ऐछे हेन प्रेम 'लौकिक' कभु नय ॥ 161 ॥ 'जन्मस्थाने केशव'—श्रीकृष्णके जन्म स्थानपर श्रीकेशवजीकी मूर्ति ॥ 156 ॥ अलौकिक होनेके कारणका निर्देश :- याँहार दर्शने लोके प्रेमे मत्त हञा। महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर लोगोंका विस्मय :- हासे, कान्दे, नाचे, गाय, कृष्णनाम लञा ॥ 162 ॥ प्रेमावेशे नाचे, गाय, सघने हुङ्कार। प्रभुर प्रेमावेश देखि' लोके चमत्कार ॥ 157 ॥ निश्चय सिद्धान्त :- सर्वथा निश्चित—इँहो—कृष्ण-अवतार। एक ब्राह्मणका महाप्रभुके आनुगत्यमें मथुरा आइला लोकेर करिते निस्तार ॥ 163 ॥ प्रेमावेशमें नृत्यगान :- एकविप्र पड़े प्रभुर चरण धरिया। अनुवाद—महाप्रभुको प्रेमावेशमें नृत्य-गान करते प्रभु-सङ्गे नृत्य करे प्रेमाविष्ट हञा ॥ 158 ॥ देखकर लोग विस्मित हो गये और कहने लगे कि ऐसा प्रेम कभी भी 'लौकिक' नहीं है। जिनके दर्शनमात्रसे अनुवाद—महाप्रभु प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य कर ही लोग प्रेममें मत्त होकर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते रहे थे, गा रहे थे और जोरसे हुङ्कार कर रहे थे, उनके । 115

[ 17/161-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हुए हँस रहे हैं, रो रहे हैं, नाच रहे हैं, गा रहे हैं, तो यह निश्चित ही है कि ये श्रीकृष्णके अवतार हैं। ये लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही मथुरा आये हैं॥ 161-163 ॥ ब्राह्मणके सम्बन्धकी बात सुनकर महाप्रभुने उनके चरणोंकी वन्दना की। भयभीत होकर वे ब्राह्मण भी महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 166-169 ॥ मर्यादा-रक्षक महाप्रभुका गुरुके निकट दीनता प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-“तुमि 'गुरु', आमि 'शिष्य'-प्राय। 'गुरु' हञा 'शिष्ये' नमस्कार ना युयाय॥” 170 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “आप मेरे 'गुरु'तुल्य हैं और मैं आपके 'शिष्य'के समान हूँ। 'गुरु' होकर 'शिष्य'को प्रणाम करना उचित नहीं है॥” 170 ॥ उस ब्राह्मणके प्रेमके दर्शन करके उसके परिचयकी जिज्ञासा :- तबे महाप्रभु सेइ ब्राह्मणे लञा। ताँहारे पुछिला किछु निभृते बसिया॥ 164 ॥ “आर्य, सरल तुमि-वृद्धब्राह्मण। काँहा हैते पाइले तुमि एइ प्रेमधन?”॥ 165 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उन ब्राह्मणको अपने साथ ले जाकर एकान्तमें बैठकर उनसे पूछा, - “आप एक वृद्ध ब्राह्मण हैं, आप समर्पित और भक्तिमें उन्नत हैं। आपको यह प्रेमधन कहाँसे प्राप्त हुआ?”॥ 164-165 ॥ ब्राह्मणका भय और दैन्य-ज्ञापन :- शुनिया विस्मित विप्र कहे भय पाञा। “ऐछे बात कह केने संन्यासी हञा॥ 171 ॥ महाप्रभुको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके साथ सम्बन्धयुक्त समझकर ब्राह्मणका अनुमान :- किन्तु तोमार प्रेम देखि' मने अनुमानि। माधवेन्द्र-पुरीर 'सम्बन्ध' धर-जानि॥ 172 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके सम्बन्धके बिना अन्यत्र श्रीकृष्णप्रेम अप्राप्य :- कृष्णप्रेमा ताँहा, याँहा ताँहार 'सम्बन्ध'। ताँहा बिना एइ प्रेमार काँहा नाहि गन्ध॥” 173 ॥ अपने गुरुदेव श्रीमाधवेन्द्रका परिचय देना :- विप्र कहे,-“श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी। भ्रमिते भ्रमिते आइला मथुरा-नगरी॥ 166 ॥ कृपा करि' तँहो मोर निलये आइला। मोरे शिष्य करि' मोर हाते 'भिक्षा' कैला॥ 167 ॥ गोपाल प्रकट करि' सेवा कैल 'महाशय'। अद्यापिह ताँहार सेवा 'गोवर्धने' हय॥” 168 ॥ गुरुबुद्धिसे महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणकी वन्दना, ब्राह्मणका भय और सम्भ्रमपूर्वक महाप्रभुको प्रणाम :- शुनि' प्रभु कैल ताँर चरण-वन्दन। भय पाञा प्रभु-पाय पड़िला ब्राह्मण॥ 169 ॥ अनुवाद-यह सुनकर ब्राह्मण विस्मित और साथ ही भयभीत भी हो गये। उन्होंने कहा, - “आप संन्यासी होकर ऐसी बात क्यों कह रहे हैं? किन्तु आपके उन्नत श्रीकृष्णप्रेमको देखकर मैंने अनुमान लगाया कि अवश्य ही श्रीमाधवेन्द्रपुरीके साथ आप सम्बन्ध रखते हैं। उनसे किसी-न-किसी प्रकारका कोई सम्बन्ध होनेपर ही इस प्रकारके उन्नत श्रीकृष्णप्रेमका अनुभव किया जा सकता है। उनसे सम्बन्धके बिना ऐसे प्रेमकी गन्ध भी कहीं नहीं हो सकती॥” 171-173 ॥ अनुवाद-ब्राह्मणने कहा, - “श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी भ्रमण करते-करते मथुरा नगरीमें आये थे। कृपा करके वे मेरे घरपर आये और उन्होंने मुझे अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार किया। उन्होंने मेरे हाथोंसे भिक्षा (भोजन) भी ग्रहण की थी। उन्होंने श्रीगोपालको प्रकट कराके उनकी सेवा की थी। आज तक भी गोवर्धनमें उन श्रीगोपालकी सेवा होती है।” श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे उन भट्टके द्वारा महाप्रभुके गुरुका परिचय देना :- तबे भट्टाचार्य तारे 'सम्बन्ध' कहिल। शुनि' आनन्दित विप्र नाचिते लागिल॥ 174 ॥ 116 |

सतरहवाँ अध्याय 17/165-181 ] अनुवाद-तब श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने उन्हें श्रीमाधवेन्द्र पुरीके साथ महाप्रभुके सम्बन्धके विषयमें बतलाया। यह सुनकर वे ब्राह्मण बड़े आनन्दित हुए और नृत्य करने लगे॥ 174॥ अनुभाष्य-पहले पाण्डरपुरमें श्रीरङ्गपुरीने भी महाप्रभुसे इसी प्रकार कहा था-मध्यलीला 9/289 और 291 संख्या देखें॥ 165-174॥ महाप्रभुको अपने घरमें लाना और सेवा करना :- तबे विप्र प्रभुरे लञा आइला निज-घरे। आपन-इच्छाय प्रभुर नाना सेवा करे ॥ 175 ॥ ब्राह्मणका दीनतापूर्वक भट्टके द्वारा अन्नका पाक कराना, शुद्धभक्तिके अनुकूल दैववर्णाश्रमधर्म-पालक महाप्रभुका यथार्थ शास्त्र-तात्पर्यको बताते हुए लोकशिक्षा देना :- भिक्षा लागि' भट्टाचार्ये कराइला रन्धन। तबे महाप्रभु हासि' बलिला वचन ॥ 176 ॥ श्रीपुरीकी कृपा-प्राप्त ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षाकी अभिलाषा :- “पुरी-गोसाञि तोमार घरे करयाछेन भिक्षा। मोरे तुमि भिक्षा देह,—एइ मोर 'शिक्षा' ॥” 177 ॥ अनुवाद-तब वे ब्राह्मण महाप्रभुको अपने घरपर ले आये और वे स्वयं ही महाप्रभुकी अनेक प्रकारकी सेवा करने लगे। उन ब्राह्मणने बलभद्र भट्टाचार्यसे महाप्रभुके लिये रसोई बनानेके लिये कहा। तब महाप्रभुने हँसते हुए कहा, “श्रीमाधवेन्द्रपुरीने आपके घरमें भोजन ग्रहण किया है, इसलिये मुझे भी आप अपने हाथोंसे भोजन बनाकर खिलाओ। यही मेरी 'शिक्षा' है॥” 175-177॥ आचार्यका आचरण ही लोगोंका आदर्श :- श्रीमद्भगवद्गीता (3/21) में- यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते ॥ 178 ॥ अनुवाद-श्रेष्ठ पुरुष जिस प्रकारका आचरण करते हैं, उसीका ही अन्य लोग अनुकरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको 'प्रमाण' कहता है, सभी लोग उसीमें अनुरत होते हैं॥ 178 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 3/25 संख्या देखें ॥ 178 ॥ जन्मके आधारपर उस ब्राह्मणका भोजन ग्रहण योग्य नहीं :- यद्यपि 'सनोड़िया' हय सेइत' ब्राह्मण। सनोड़िया-घरे संन्यासी ना करे भोजन ॥ 179 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा 'वैष्णव' अथवा शुद्ध-ब्राह्मण जानकर उन्हें शिष्यके रूपमें स्वीकार करना :- तथापि पुरी देखि' ताँर 'वैष्णव'-आचार। 'शिष्य' करि' ताँर भिक्षा कैल अङ्गीकार ॥ 180 ॥ अनुवाद-यद्यपि वे 'सनोड़िया' ब्राह्मण थे और सनोड़ियाके घरमें संन्यासी भोजन नहीं करते, तथापि श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उनके वैष्णव जैसे आचरणको देखकर उन्हें अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण किया था। और उनके द्वारा दी गयी भिक्षाको भी स्वीकार किया था॥ 179-180॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पश्चिम भारतमें वैश्य लोग 'अग्रवाल', 'कालोयार', 'सानोयाड़' आदि कुछ भागोंमें विभक्त हैं। उनमेंसे अग्रवाल ही अतिशुद्ध हैं; कालोयार, सानोयाड़ आदि श्रेणी-अपने-अपने कार्योंके दोषके कारण पतित हैं। इन कालोयारों और सानोयाड़ों आदिका जो याजन करते हैं अर्थात् जिनके यजमान ये लोग हैं, उन्हें 'सनोड़िया ब्राह्मण' आदि कहते हैं। 'सानोयाड़'-शब्दका अर्थ 'सोनेका व्यापारी' है, उनके याजक-ब्राह्मण ही 'सनोड़िया-(वर्ण) ब्राह्मण' हैं। याजन दोषसे पतित होनेके कारण उन ब्राह्मणोंके घरमें संन्यासी भोजन नहीं करते ॥ 179 ॥ महाप्रभुकी उनके घरमें भिक्षाकी अभिलाषाको सुनकर ब्राह्मणकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- महाप्रभु ताँरे यदि 'भिक्षा' मागिल। दैन्य करि' सेइ विप्र कहिते लागिल ॥ 181 ॥ । 117

[ 17/181-185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “तोमारे 'भिक्षा' दिब—बड़ भाग्य से आमार। तुम्हि—ईश्वर, नाहि तोमार विधि-व्यवहार ॥ 182 ॥ विप्रका श्रीगौरप्रेम एवं अद्वैव-वर्णाश्रमियोंका तिरस्कार :- ‘मूर्ख’–लोक करिबेक तोमार निन्दन। सहिते ना पारिमु सेइ 'दुष्टे'र वचन ॥"183 ॥ अनुवाद—इसलिये महाप्रभुने स्वयं उन ब्राह्मणसे भिक्षा माँगी, परन्तु वे ब्राह्मण स्वाभाविक दीनतासे कहने लगे,—"यह तो मेरा परम सौभाग्य है कि मैं आपको भिक्षा प्रदान करूँगा। और आप तो ईश्वर हैं, इसलिये आपके लिये विधि-व्यवहारका कोई बन्धन नहीं है। किन्तु मूर्ख लोग आपकी निन्दा करेंगे। तब मैं उन दुष्टोंके वचनोंको सहन नहीं कर पाऊँगा॥"181-183 ॥ अनुभाष्य—इस प्रसङ्गमें मध्यलीला, 10/136-140 संख्या देखें। जन्मके अनुसार उन शुद्धभक्त ब्राह्मणका जल भी स्पर्श योग्य नहीं होनेपर भी भक्तिके अनुकूल दैव- वर्णाश्रममें और सत्यकी प्रतिष्ठामें उनकी निष्ठा थी। इसलिये उन्होंने निर्भय होकर महाप्रभु और शुद्धभक्तिके प्रतिकूल, वैष्णवोंमें जाति-बुद्धि करनेवाले अद्वैव- वर्णाश्रमी एवं महाप्रसादमें कुतर्क करनेवालोंको 'मूर्ख' और 'दुष्ट' आदि शब्दोंसे सम्बोधन करनेमें दुविधा अनुभव नहीं की। यद्यपि वैष्णव स्वभावसे दीन होते हैं, तथापि वे उच्चकुलमें उत्पन्न होनेका अभिमान करनेवाले विष्णु-विरोधी स्मार्त्त ब्राह्मणोंके पैरोंको चाटनेकी चेष्टा नहीं करते ॥ 182-183 ॥ मनोधर्मी व्यक्तियोंके विभिन्न पथोंका वर्णन :- प्रभु कहे,—“श्रुति, स्मृति, यत ऋषिगण। सबे 'एक'-मत नहे, भिन्न भिन्न धर्म ॥ 184 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “श्रुति, स्मृति और जो ऋषि हैं, उन सबका सदा एक मत नहीं होता। इसलिये धर्मके विषयमें भिन्न-भिन्न मत हैं ॥ 184 ॥ अनुभाष्य—'एकमत'-अद्वय-ज्ञानके आधारपर प्रतिष्ठित सत्यधर्म ही 'नित्य', 'सनातन' और 'एक' है। उस धर्ममें 'उपेय' अथवा 'साध्य' जिस प्रकार एक होता है, 'उपाय' अथवा 'साधन' अथवा 'मार्ग' भी उसी प्रकार 'एक' अथवा उससे अभिन्न होता है। 'भिन्न-भिन्न धर्म,- आत्मदर्शनको छोड़कर बाहरी दर्शनके आधारपर प्रत्येक जीवके परस्पर देह और मनका विशेष-विशेष धर्म है ॥ 184 ॥ लोगोंके हितके उद्देश्यसे ही सज्जनका आचरण, इसलिये श्रीमाधवेन्द्रके द्वारा प्रदर्शित मार्ग ही एकमात्र निश्चयार्थक अथवा वास्तविक-सत्यप्रद :- धर्म-स्थापन-हेतु साधुर व्यवहार। पुरी-गोसाञिर ये आचरण, सेइ धर्म सार॥"185 ॥ अनुवाद—साधुका व्यवहार धर्मके वास्तविक तात्पर्यको स्थापित करता है। श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीका आचरण ही समस्त धर्मोंका सार है॥"185 ॥ अनुभाष्य—'साधु अथवा महाजन'-महान व्यक्तिको 'महाजन' कहते हैं। पारमार्थिक और जागतिक विचारमें 'महान'के सम्बन्धमें विभिन्न धारणाएँ होती हैं। बद्धजीव जो इन्द्रिय-तृप्तिमें और उसके साधन एकत्रित करनेमें व्यस्त है, वह अपने मनोधर्मके अनुसार उस व्यक्तिको उतना महान मानता है, जितना वह उसके इन्द्रिय-भोगको बढ़ानेका अवसर या उपाय प्रदान करता है। जैसे, एक व्यापारी उसे 'ऋण देनेवाले'को 'महाजन' मान सकता है। अथवा भोगोंकी लालसावाले कर्मियोंके लिये 'जैमिनी आदि ऋषि' अथवा विभिन्न मतपोषक धर्म-शास्त्रकार लोग महाजन हो सकते हैं। इन्द्रियों और मनको वशमें करनेके अभिलाषी व्यक्तियोंके लिये 'पतञ्जल्यादि ऋषि' महाजन हैं। शुष्क-ज्ञानियोंके लिये निरीश्वर कपिल, वशिष्ठ, दुर्वासा या दत्तात्रेय आदि केवल-अद्वैतवादिगण महाजन हैं। रजो और तमोगुणाश्रित आसुरिक व्यक्ति अमानुषिक-बलशाली विष्णु-विरोधी-कार्योंमें अतुलनीय दृढ़ हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण और उसके पुत्र मेघनाद, जरासन्धादि राजा, एकलव्य और कर्ण आदि 118 ।

सत्रहवाँ अध्याय 17/185 ] गुरुभक्तोंको महाजन मान सकते हैं। स्त्री-सङ्गप्रिय पुरुषाभिमानी व्यक्तियोंके लिये दक्षादि स्त्री-पूजक प्रजापतिगण ही महाजन हैं। सांसारिक लोगोंके लिये दैहिक और मानसिक रोग, शोक, दुःख, भय अथवा फल्गु अभावको दूर करनेके प्रयासी चिकित्सक, समाजसेवी व्यक्ति 'महाजन'के रूपमें कहे जा सकते हैं। मायासे मोहित जीवोंके लिये विष्णुसम्बन्ध-विहीन 'दार्शनिक', 'वैज्ञानिक', 'ऐतिहासिक', 'साहित्यिक', 'कवि', 'कुशल वक्ता', 'समाजपति' अथवा 'देशनेता'—'महाजन' कहलाकर निर्णीत हो सकते हैं। स्वयं ही ठगे जानेवाले लोग ऐसे व्यक्तियोंको महाजन मान लेते हैं जो आत्माकी नित्यवृत्ति भगवद्भक्तिको भी वंश-परम्पराके अधीन कहते हैं। ऐसे 'तथाकथित- महाजन' स्वयंको किसी महाजनका वंशज होनेकी दुहाई देकर भगवद्भक्ति अथवा गुरु होनेके दावेदार बनकर लोगोंको ठगते हैं। ऐसे धनके लोभी लोग गिद्धके समान हैं। श्रीहरिदास ठाकुर जैसे वास्तविक साधुके विरोधी और उनके अप्राकृत हरिभजनकी चेष्टाका कृत्रिम बाहरी अनुकरण करनेवाले 'ढोंगी-विप्र', कपट और छल विद्याको जाननेवाले; पूतना, तृणावर्त्त, वत्सासुर, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर, कालिय, प्रलम्ब आदि असुरगण; अथवा विष्णु-विरोधी पौण्ड्र दैत्यगुरु शुक्राचार्य, नास्तिक चार्वाक, वेण, सुगत, अर्हत् आदिको भी लोग महाजन मान लेते हैं। कई लोग श्रीगौरकृष्णके परम-सत्य अथवा उनके परमेश्वर होनेमें विश्वास नहीं करते। परन्तु स्वयंको अवतार कहलानेकी इच्छासे ऐसे ठग लोग उनका अनुकरण करके विष्णुविरोधी मनोधर्मी मनोहर वचन प्रयोग करके मूर्ख दुर्भागे लोगोंके द्वारा महाजनके रूपमें कल्पित हो सकते हैं। फलस्वरूप भगवद्भक्तिहीन व्यक्तिके लिये इस प्रकार 'अन्याभिलाषी', 'कर्मी', 'शुष्कज्ञानी', 'अभक्त-योगी' अथवा कनक-कामिनी-प्रतिष्ठाके लोभी व्यक्ति 'महाजन'के रूपमें निर्दिष्ट हो सकते हैं, यह सत्य है। किन्तु निरस्त-कुहक (छलरहित) परम-सत्य अथवा वास्तव-वस्तुको प्रतिपादन करनेवाली निर्मत्सर श्रीमद्भागवत कहती है, (6/3/25)— “प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं देव्या विमोहितमतिर्बत माययालाम्। त्रय्यां जड़ीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां वैतानिके महति कर्मणि युज्यमानः ॥ ” अर्थात् “जगत्में जो सब कर्मी 'महाजन'के नामसे विख्यात हैं, वे सब धर्मके विषयमें बतलानेवाले लोग भगवद्भक्तिके माहात्म्यको नहीं जानते। उनकी बुद्धि भगवान्की त्रिगुणमयी मायाके द्वारा विमोहित हो जाती है। इसलिये वे भगवद्भक्तिको ग्रहण न करके लौकिक फलोंको देनेवाले बड़े-बड़े याग-यज्ञोंरूपी कर्मकाण्डमें संलग्न रहते हैं। इन सब महाजनोंकी मति ऋक्-साम- यजुर्वेदके मधुर प्रतीत होनेवाले अर्थवाद-वाक्योंमें दृढ़तासे लगी रहती है। यद्यपि साधारण लोग उन्हें 'महाजन'के रूपमें मान लेते हैं, तथापि उनकी बुद्धि पुरुषोत्तम श्रीभगवान्की नित्यसेवासे युक्त नहीं हैं।” जगत्के लोग 'कर्मवीर'के रूपमें परिचित हो सकते हैं, 'धर्मवीर' कहलाकर सम्मान प्राप्त कर सकते हैं, 'ज्ञानवीर' कहलाकर प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, 'वैराग्य और त्यागके आदर्श' कहलाकर पूजित हो सकते हैं, किन्तु श्रीमद्भागवत (3/23/56) कहती है— “नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते। न तीर्थपादसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः॥” अर्थात् “इस जगत्में जो कर्मवीर 'धर्म'के लिये कर्म न करें, जो त्यागवीर 'श्रीविष्णुकी प्रीतिके लिये भोग त्याग' न करें, वे व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृत हैं।” वास्तवमें श्रीहरिकी सन्तुष्टिका नाम ही 'सेवा' है। इसलिये जिस कर्ममें, जिस धर्ममें, जिस त्यागमें श्रीकृष्णकी कोई प्रीति अथवा सम्बन्ध नहीं है, वह देशकी सेवा, देशवासियोंकी सेवा, समाजकी सेवा, वंश-परम्परापर ही आधारित अदैव-वर्णाश्रमकी सेवा, रोगीकी सेवा, दरिद्रकी सेवा, निर्धनकी सेवा या धनवानकी सेवा, स्त्री-जातिकी सेवा, अनेक देवताओंकी सेवा आदि 'श्रेष्ठ-गुण-सम्पत्' अथवा 'प्रातः स्मरणीय कार्य'के नामसे जगत्में प्रचलित होनेपर भी वह वास्तवमें अपनी । 119

[ 17/185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'इन्द्रियतृप्ति' अथवा 'भोग' है। यह जगत्‌का दुर्भाग्य ही है कि लोगोंको इन्द्रिय-भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाले वक्ता, प्रचारक अथवा शास्त्रकार ही 'महाजन'के रूपमें विख्यात हैं। जो जीव प्राकृतबुद्धिसे युक्त हैं, बाह्यजगत्‌के ही दर्शन करनेवाले हैं, इन्द्रियोंके दास और भवरोगसे ग्रस्त हैं, वे अपनी विकृत बुद्धिके द्वारा वास्तविक महाजनको समझ अथवा पहचान नहीं पाते, क्योंकि उनकी बुद्धि सदा ही भ्रम-प्रमादादि चार दोषोंसे दूषित है। अनादि कालसे रक्त-माँस अथवा शुक्रादि सात धातुओंसे बने शरीरमें 'आत्म'-बुद्धि और रुचि रखनेवाले व्यक्ति भेड़चालकी भाँति इन्द्रियोंसे ही प्राप्त ज्ञानके स्रोतमें बह रहे हैं। इस प्रकार प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायके कई लोग श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद जैसे महाजनोंके वचनोंका भी अनादर करके, महाजनोंके चरणोंमें अपराध सञ्चय करके, महाजनको सङ्कीर्ण विचारादि वाले कहकर अपने लिये विपत्तिका स्वयं ही वरण कर रहे हैं। अन्य कई लोग अपनी इन्द्रियभोगोंके अनुरूप धारणाके अनुसार कल्पित महाजनोंकी सृष्टि करके व्यभिचार, लाम्पट्य, लाभ, पूजा, प्रतिष्ठाशा, कुटीनाटी (कपटता), ईर्ष्या आदि असंख्य अपराधजनक कार्योंमें लिप्त हो रहे हैं। जीव जब तक वास्तविक 'महाजन'का निर्णय नहीं कर पाता, तब तक उसकी कोई भी चेष्टा सुफल देनेवाली नहीं हो सकती। महाजनके स्वरूपके निर्णयके विषयमें मध्यलीला 25/54-55, 57 संख्यामें कहा है— “परम कारण ईश्वरे কেহ নাহি माने। स्व-स्व-मत स्थापे परमतरे खण्डने॥ ताते छय दर्शन हैते 'तत्त्व' नाहि जानि। 'महाजन' येइ कहे, सेइ 'सत्य' मानि। श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी—अमृतेर धार। तिँहो ये कहये वस्तु, सेइ 'तत्त्व'—सार॥” अर्थात् सांख्य-पातञ्जल आदि दर्शनमें कोई भी वास्तवमें विष्णुको 'ईश्वर'के रूपमें नहीं मानते। वे सभी 'प्रच्छन्न' अथवा 'अप्रच्छन्न' नास्तिक हैं, अर्थात् कोई भी 'आस्तिक' नहीं हैं। उन्होंने केवल अपने-अपने-मतवादकी बहादुरी प्रदर्शित करनेके लिये तर्कके द्वारा दूसरोंके मतका खण्डन और अपने-अपने मतवादको स्थापित करनेकी चेष्टामात्र की है; इसलिये ये सब शास्त्रोंका उपदेश प्रदान करनेवाले जगत्में 'महाजन' कहलाकर परिचित होनेपर भी वास्तवमें वे 'महाजन' नहीं हैं—वे ही अत्यन्त 'सङ्कीर्ण' और 'अनुदार' (उदार नहीं) हैं। यह बात सुनकर इन सभी तथाकथित महाजनोंके भक्त अपने प्राकृत इन्द्रियोंके ज्ञानके अनुसार श्रीमन्महाप्रभु और शुद्ध भक्तोंके चरणोंमें अपराध करके कहेंगे,–“यह 'हठ' मात्र है।” उनकी धारणा है कि श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु अथवा श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद पूर्वोक्त व्यक्तियों जैसे ही एक महाजन मात्र हैं। वे तो प्राकृत-सहजधर्मकी विचारधारासे चिद् और जड़का सामञ्जस्य करनेवाले हैं, इसलिये वे इस प्रकारका सिद्धान्त कहेंगे, इस विषयमें सन्देह और आश्चर्य कैसा? किन्तु जिनका अप्राकृत स्वरूपधर्म जागरित हुआ है, वे उस स्वरूपधर्मके आलोकसे प्रकाशित प्रत्येक जीवके ही स्वरूपका दर्शन करनेमें समर्थ हैं। महाभागवत अथवा परमहंसका ही अधोक्षज- दर्शन अथवा सु-दर्शन होता है, इसलिये वे निष्किञ्चन ही एकमात्र वास्तविक 'महाजन' हैं। श्रील माधवेन्द्रपुरी गोस्वामी भी निष्किञ्चन महाजन हैं; उनके आचरणमें किसी भी प्रकारकी मत्सरता अथवा लोगोंको छलनेकी वृत्ति नहीं है; उन्होंने आचरण करके जो प्रचार किया है, उनके द्वारा प्रदर्शित उसी दैव-वर्णाश्रम-धर्मको आदर्श मानकर अनुगमन करनेसे ही अपना कल्याण चाहनेवाले जीवोंका निश्चय ही मङ्गल होगा, महाप्रभुने उसी दैव-वर्णाश्रम-धर्मके आदर्शका प्रदर्शन करके शिक्षा दी है। श्रीमद्भागवतमें (6/3/19-21)—'बारह' महाजनोंके नाम उल्लिखित हैं। कलियुगमें भगवद्भक्ति-प्रचारक शुद्धवैष्णव-सम्प्रदायके चार आचार्य ही 'महाजन' हैं। हमारे सम्प्रदायमें गौड़ीयेश्वर श्रीदामोदरस्वरूप ही मूल 120 ।

सतरहवाँ अध्याय 17/185-189 ] 'महाजन' हैं। उनके अभिन्न कलेवर परमतत्त्व- श्रीगौरसुन्दरके प्रियतम श्रीरूप-सनातन अथवा श्रीरूपानुग साधुजन, सभी 'महाजन' हैं। श्रीविष्णुस्वामीके अनुगत शुद्धाद्वैतवादी श्रीधरस्वामी भी 'महाजन' हैं। चण्डीदास, विद्यापति, जयदेव-ये सभी महाजन हैं। किन्तु जो इन सभी महाजनोंकी सेवा करनेके बदलेमें इन्हें अपने- अपने तुच्छ स्वार्थसिद्धिके उपकरणके रूपमें मानते हैं अथवा 'गुरुके ऊपर गुरुगिरि' करनेके लिये दौड़ते हैं, वे सभी दुर्भागे व्यक्ति इन सभी महाजनोंसे बहुत दूरमें अवस्थित हैं। इन्द्रिय सुखभोगका लोभ या माया-दास्य ही उनके निकट 'कल्पित महाजन'की मूर्ति लेकर उपस्थित होता है और उन्हें छलकर उनकी इन्द्रियोंको वास्तविक सत्यके पथसे दूर करके पागल बना देता है। इसलिये शुद्ध भगवद्भक्तोंकी चेष्टाएँ कभी भी उनकी प्राकृत बुद्धिकी धारणाका विषय नहीं होतीं ॥ 185 ॥ शुद्धभक्तोंका पथ ही अनुसरणीय :- महाभारतके वनपर्व (313/117) में- तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥ 186 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 186 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा- शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, जिसका मत भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; इसलिये धर्मतत्त्व गूढ़रूपसे ढका हुआ है अर्थात् शास्त्रादि पढ़कर धर्मतत्त्वको जानना कठिन है। इसलिये जिन्हें साधुओंने 'महाजन' कहकर निर्णय किया है, वे जिस मार्गको 'शास्त्र-मार्ग' कहते हैं, उसी मार्गपर ही अन्य सभी व्यक्तियोंका चलना उचित है ॥ 186 ॥ अनुभाष्य- ('वेदा विभिन्नाः स्मृतयो विभिन्नाः' इति पाठान्तरञ्च दृश्यते)। तर्कः अप्रतिष्ठः (अस्थिरः नाचलः), श्रुतयः अपि विभिन्नाः (अधिकारभेदेन विरोधप्रदर्शनपराः); असौ ऋषिः न [वाच्यः] यस्य मतं (सिद्धान्तः) भिन्नं न [आसीत्]; [एवम्बिधे तर्क प्रधान-युगे] धर्मस्य (सनातन-जैवधर्मस्य) तत्त्वं गुहायां (साधारण- लोक-लोचनागोचर-शुद्धसज्जनसम्प्रदायैक-हृद्गह्वरे) निहितं (पिहितं लुक्वायितम्; अतः) येन (सत्पथेन) महाजनः (पूर्वतमाः अधोक्षजाच्युत-सेवकः सज्जनः) गतः (प्राप्तः) स (एव) पन्थाः (शुद्धमार्गः)। श्लोक-भावानुवाद-('वेदा विभिन्नाः स्मृतयो विभिन्नाः' यह पाठान्तर दिखायी देता है)। तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा-शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् अधिकारभेदसे उनमें विरोध प्रदर्शित होता है; जिसका सिद्धान्त भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; [इस तर्क-प्रधान युगमें] सनातन जैवधर्मका तत्त्व गूढ़रूपसे अर्थात् साधारण लोगोंके नेत्रोंसे अगोचर, किन्तु शुद्ध सज्जन सम्प्रदायके हृदयकी गुहामें छिपा हुआ है। इसलिये जिस सत्पथको पूर्व महाजनों अर्थात् अधोक्षज-अच्युतके सेवक सज्जनोंने प्राप्त किया है, वही शुद्ध मार्ग है ॥ 186 ॥ ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा :- तबे सेइ विप्र प्रभुके भिक्षा कराइल। मधुपुरीर लोक-सब प्रभुके देखिते आइल ॥ 187 ॥ अनुवाद-यह सुनकर उन ब्राह्मणने महाप्रभुको भोजन करवाया। तब मथुरापुरीके सब लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे ॥ 187 ॥ असंख्य लोगोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- लक्ष-संख्या लोक आइसे, नाहिक गणन। बाहिर हञा प्रभु दिल दरशन ॥ 188 ॥ महाप्रभुके कीर्तनमें सभीका नृत्य :- बाहु तुलि' बले प्रभु 'हरिबोल'-ध्वनि। प्रेमे मत्त नाचे लोक करि' हरिध्वनि ॥ 189 ॥ अनुवाद-लाखोंकी संख्यामें लोग आने लगे, उनकी गिनती नहीं की जा सकती। इसलिये महाप्रभुने स्वयं । 121

[ 17/188-197 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बाहर आकर वहाँ एकत्रित सब लोगोंको दर्शन दिया और अपनी भुजाएँ उठाकर महाप्रभुने उच्च स्वरमें 'हरिबोल' कहा। एकत्रित सभी लोग 'हरि' बोलकर कीर्तन करने लगे और प्रेममें मत्त होकर नृत्य करने लगे॥ 188-189॥ यमुनाके चौबीस घाटोंपर स्नान करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणके द्वारा प्रदर्शित देखने योग्य स्थानोंका दर्शन :- यमुनार 'चब्बिश-घाटे' प्रभु कैल स्नान। सेइ विप्र प्रभुके देखाय तीर्थस्थान॥ 190॥ स्वयम्भु, विश्राम, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर। महाविद्या, गोकर्णादि देखिला विस्तर॥ 191॥ अनुवाद—महाप्रभुने यमुनाके चौबीस घाटोंपर स्नान किया। उन ब्राह्मणने महाप्रभुको स्वयम्भु, विश्रामघाट, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर, महाविद्या तथा गोकर्ण आदि सभी तीर्थस्थानोंका दर्शन कराया॥ 190-191॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यमुनाके चौबीस घाट—(1) अविमुक्त, (2) अधिरूढ़, (3) गुह्यतीर्थ, (4) प्रयागतीर्थ, (5) कनखलतीर्थ, (6) तिन्दुक, (7) सूर्यतीर्थ, (8) वटस्वामी, (9) ध्रुवघाट, (10) ऋषितीर्थ, (11) मोक्षतीर्थ, (12) बोधतीर्थ, (13) गोकर्ण, (14) कृष्णगङ्गा, (15) वैकुण्ठ, (16) असिकुण्ड, (17) चतुःसामुद्रिक-कूप, (18) अक्रूरतीर्थ, (19) याज्ञिक-विप्रस्थान, (20) कुब्जाकूप, (21) रङ्गस्थल, (22) मञ्चस्थल, (23) मल्लयुद्ध-स्थान और (24) दशाश्वमेध॥ 190-191॥ उस ब्राह्मणके साथ द्वादश वनोंका दर्शन :- 'वन' देखिबारे यदि प्रभुर मन हैल। सेइत ब्राह्मणे प्रभु सङ्गेते लइल॥ 192॥ मधुवन, ताल, कुमुद, बहुला-वन गेला। ताँहा ताँहा स्नान करि' प्रेमाविष्ट हैला॥ 193॥ अनुवाद—जब महाप्रभुको वन देखनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन ब्राह्मणको अपने साथ ले लिया। महाप्रभु मधुवन, तालवन, कुमुदवन और बहुलावन गये तथा प्रेममें आविष्ट होकर वहाँ-वहाँपर स्नान किया॥ 192-193॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वन'—बारह वन; श्रीयमुनाके पूर्वभागमें—भद्रवन, बेलवन, लौहवन, भाण्डीर-वन और महावन—ये पाँच वन हैं। यमुनाके पश्चिमभागमें— मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, काम्यवन, खदीरवन और वृन्दावन—ये सात वन हैं॥ 192॥ गो-पालन दर्शन और व्रजलीलाकी स्मृतिसे प्रेमावेश :- पथे गाभीघटा चरे प्रभुरे देखिया। प्रभुके बेड़य आसि' हुङ्कार कोरिया॥ 194॥ गाभी देखि' स्तब्ध प्रभु प्रेमेर तरङ्गे। वात्सल्ये गाभी प्रभुर चाटे सब-अङ्गे॥ 195॥ सुस्थ हञा प्रभु करे अङ्ग-कण्डूयन। प्रभु-सङ्गे चले, नाहि छाड़े धेनुगण॥ 196॥ कष्टे-सृष्ट्ये धेनु सब राखिल गोयाल। प्रभुकण्ठध्वनि शुनि' आइसे मृगीपाल॥ 197॥ अनुवाद—मार्गमें गौओंका झुण्ड चर रहा था। जैसे ही उन्होंने महाप्रभुको देखा, उसी समय उन्होंने महाप्रभुको चारों ओरसे घेर लिया और वे जोरसे रँभाने लगीं। गौओंको देखकर महाप्रभुके हृदयमें प्रेमकी लहर आयी और वे स्तब्ध हो गये और गौवें वात्सल्य-भावसे महाप्रभुके शरीरको चाटने लगीं। तब महाप्रभु अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आये और वे गौओंके अङ्गोंको सहलाने लगे। गौवें उन्हें छोड़ना नहीं चाह रही थीं, वे महाप्रभुके साथ ही चलने लगीं। ग्वालोंने किसी प्रकार बड़ी कठिनाईसे अपनी गौओंको रोका। उसके बाद जब महाप्रभु कुछ कीर्तन करने लगे, तब उनकी मधुर ध्वनिको सुनकर हिरणोंका झुण्ड उनके निकट आ गया॥ 194-197॥ 122 |

सतरहवाँ अध्याय 17/198–207 ] महाप्रभुके दर्शनसे मृग-दम्पतियोंको सुख :– मृग-मृगी मुख देखि' प्रभु-अङ्ग चाटे। भय नाहि करे, सङ्गे याय बाटे-बाटे ॥ 198 ॥ अनुवाद—हिरण और हिरणियाँ महाप्रभुके मुखको देखकर उनके शरीरको चाटने लगे। बिना किसी भयके वे मार्गमें महाप्रभुके साथ-साथ ही चल रहे थे॥ 198 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे पक्षियोंका कलरव करना और हर्ष :– शुक, पिक, भृङ्ग प्रभुरे देखि' 'पञ्चम' गाय। शिखिगण नृत्य करि' प्रभु-आगे याय ॥ 199 ॥ अनुवाद—तोते, कोयलादि पक्षी और भँवरे महाप्रभुको देखकर 'पञ्चम' स्वरमें गान करने लगे तथा मयूर नृत्य करते हुए महाप्रभुके आगे चलने लगे॥ 199 ॥ वृक्ष और लताओंके द्वारा भी पुलकाश्रु-वर्षण :– प्रभु देखि' वृन्दावनर वृक्ष-लतागणे। अङ्कुर-पुलक, मधु-अश्रु वरिषेणे ॥ 200 ॥ फूल-फल भरि' डाल पड़े प्रभु-पाय। बन्धु देखि' बन्धु येन 'भेट' लञा याय ॥ 201 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर वृन्दावनके वृक्ष और लताएँ आनन्दसे अङ्कुरित तथा पुलकित हो उठे। वे मधुके रूपमें प्रेमाश्रु बहाने लगे। वृक्ष और लताएँ फूलों और फलोंके भारसे महाप्रभुके चरणोंमें झुककर उनको (फूलों-फलोंको) उपहारके रूपमें देते हुए उनका अभिवादन करने लगे मानो महाप्रभु उनके मित्र हों॥ 200–201 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे स्थावर, जङ्गम, सभीमें ही हर्ष और महाप्रभुके साथ क्रीड़ा :– प्रभु देखि' वृन्दावनर स्थावर-जङ्गम। आनन्दित—बन्धु येन देखे बन्धुगण ॥ 202 ॥ ता-सबार प्रीति देखि' प्रभु भावावेशे। सबा-सने क्रीड़ा करे, हञा तार वशे ॥ 203 ॥ प्रति वृक्ष-लता प्रभु करेन आलिङ्गन। पुष्पादि ध्याने करेन कृष्णे समर्पण ॥ 204 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर वृन्दावनके चल और अचल प्राणी ऐसे आनन्दित हो रहे थे जैसे बन्धुको देखकर बन्धु प्रसन्न होते हैं। उन सबकी प्रीतिको देखकर महाप्रभु भावावेशमें आ गये। उन सबके साथ वे मित्रवत् क्रीड़ा करने लगे। इस प्रकार वे स्वतः ही उनके वशीभूत हो गये थे। महाप्रभु प्रत्येक वृक्ष और लताको आलिङ्गन करने लगे और उनके पुष्प- फलादिको ध्यानके माध्यमसे श्रीकृष्णको समर्पित करने लगे॥ 202–204 ॥ श्रीकृष्णप्रेममें प्रमत्त महाप्रभु :– अश्रु-कम्प-पुलक-प्रेमे शरीर अस्थिरे। 'कृष्ण' बल, 'कृष्ण' बल बोले उच्चैःस्वरे ॥ 205 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर प्रेममें अस्थिर हो रहा था, उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे तथा उनके शरीरमें कम्प और पुलक हो रहा था। वे बहुत ऊँचे स्वरमें 'कृष्ण बोलो', 'कृष्ण बोलो' कह रहे थे॥ 205 ॥ महाप्रभुके श्रीकृष्णकीर्तनसे सभीके द्वारा श्रीकृष्ण-ध्वनि :– स्थावर-जङ्गम मिलि' करे कृष्णध्वनि। प्रभुर गम्भीर-स्वरे येन प्रतिध्वनि ॥ 206 ॥ अनुवाद—चल और अचल प्राणी, सभी मिलकर कृष्ण-कृष्ण कह रहे थे, मानो वे सब महाप्रभुके गम्भीर स्वरकी प्रतिध्वनि कर रहे थे॥ 206 ॥ हिरणके साथ महाप्रभुका प्रेम-क्रन्दन :– मृगेर गला धरि' प्रभु करेन रोदने। मृगेर पुलक अङ्गे, अश्रु नयने ॥ 207 ॥ अनुवाद—महाप्रभु तब हिरणोंके गलोंको पकड़कर रोने लगे। हिरणोंके अङ्ग पुलकित हो गये और उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे॥ 207 ॥ । 123

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[ 17/208–212 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्ण और राधाके स्वपक्षीय शुक तथा सारीके गानका श्रवण :— वृक्षडाले शुक–शारी दिल दरशन। ताहा देखि' प्रभुर किछु शुनिते हैल मन॥208॥ शुक–शारिका प्रभुर हाते उड़ि' पड़े। प्रभुके शुनाञा कृष्णेर गुण–श्लोक पड़े॥209॥ **अनुवाद—**जब वृक्षकी डालके ऊपर शुक और सारी (तोता और मैना) आकर बैठे, उन्हें देखकर महाप्रभुकी उनसे कुछ सुननेकी इच्छा हुई। शुक और सारी उड़कर महाप्रभुके हाथपर आकर बैठ गये तथा शुक श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करते हुए महाप्रभुको श्लोक सुनाने लगा॥208–209॥ शुकके द्वारा श्रीकृष्णके गुणोंका गान :— गोविन्दलीलामृत (13/29)— सौन्दर्यं ललनालिधैर्यदलनं लीला रमास्तम्भिनी वीर्यं कन्दुकिताद्रिवर्यममलाः पारे–परार्द्धं गुणाः। शीलं सर्वजनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत्प्रभुर्विश्वं विश्वजनीनकीर्त्तिरवतात् कृष्णो जगन्मोहनः॥210॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीशुकने कहा,—जिनका सौन्दर्य रमणियोंके धैर्यका हरण करता है, जिनकी लीला लक्ष्मीदेवीको स्तम्भित करती है, जिनका बल गोवर्धन पर्वतको गेंदकी भाँति खेलनेकी सामग्री बना देता है, जिनके सब अमल गुण परार्द्धातीत (अनन्त) हैं, जिनका शील–धर्म सभीको आनन्दित करता है, जगतवासियोंके हितकारीरूपमें जिनकी कीर्ति है, वे जगन्मोहन श्रीकृष्ण विश्वका पालन करें॥210॥ अनुभाष्य— यस्य (कृष्णस्य) सौन्दर्यं (मनोहररूपं) ललनालि–धैर्य–दलनं (ललनालीनां ब्रजाङ्गनासमुहानां धैर्यं दलयितुं शीलं यस्य तत्), यस्य लीला (चिद्विलासमयी क्रीड़ा) रमा–स्तम्भिनी (रमां स्तम्भयितुं क्षोभयितुं शीलं यस्याः सा), यस्य वीर्यं (पराक्रमः), कन्दुकिताद्रिवर्यं (कन्दुकितः कन्दु Bulk... कन्दुकिताद्रिवर्य्य... कन्दुकीकृतः अद्रिवर्यः गिरिराजः गोवर्धनः येन तत्), यस्य पारे–परार्द्धं (परार्द्धस्य पारं गताः अपरिमेयाः इत्यर्थः) अमलाः (दोषरहिताः) गुणाः, अहो यस्य शीलं (चरितं) सर्वजनानुरञ्जनं (सर्वेषां जनानां भक्तानाम् अनुरञ्जनम् आनन्द–विधायकं) सः अयम् अस्मत्प्रभुः (मादृशदासानाम् एकगतिः) विश्वजनीनकीर्त्तिः (सर्वजनानां हिताय कीर्त्तिः यशः यस्य सः) जगन्मोहनः (भुवन–सुन्दरः) कृष्णः विश्वम् अवतात् (रक्षतु)। **श्लोक–भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥ शुक–मुखे शुनि' तबे कृष्णेर वर्णन। शारिका पड़ये तबे राधिका–वर्णन॥211॥ **अनुवाद—**शुकके मुखसे श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर सारिका (मैना) श्रीमती राधिकाके गुणोंका वर्णन करने लगी॥211॥ सारीके द्वारा श्रीराधिकाका गुण–गान :— गोविन्दलीलामृत (13/30)— श्रीराधिकायाः प्रियता स्वरूपता सुशीलता नर्त्तनगानचातुरी। गुणालिसम्पत् कविता च राजते जगन्मनोमोहन–चित्तमोहिनी॥212॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥212॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**सारीने कहा,—श्रीमती राधिकाकी प्रियता, स्वरूपता [अर्थात् महाभावस्वरूपिणी], सुशीलता, नृत्य–गान–चातुरी, कवित्व आदि गुणराशि भुवनमोहन श्रीकृष्णकी चित्त–विमोहिनी बनकर शोभा पा रही है॥212॥ अनुभाष्य— श्रीराधिकायाः प्रियता (प्रेम), स्वरूपता (असाधारणसौन्दर्यं, स्वम् आत्मानं रूप्यते निरूप्यते येन तत्, महाभावस्वरूपं वा), सुशीलता (शोभनं शीलं सुचरितं) नर्त्तन–गानचातुरी (नर्त्तनं गानञ्च तयोः चातुरी नैपुण्यं वैदग्ध्यं वा) गुणालि–सम्पत् (गुणानां आली श्रेणी, सैव सम्पत्तिः), कविता (कवित्वं)—सर्वा च जगन्मनोमोहन–चित्तमोहिनी (जगन्मनोमोहनस्य भुवनमोहनस्य कृष्णस्य मनोमोहिनी आनन्दिनी एव) राजते (विराजते)। 124 ।