भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1566

[ 17/185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'इन्द्रियतृप्ति' अथवा 'भोग' है। यह जगत्‌का दुर्भाग्य ही है कि लोगोंको इन्द्रिय-भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाले वक्ता, प्रचारक अथवा शास्त्रकार ही 'महाजन'के रूपमें विख्यात हैं। जो जीव प्राकृतबुद्धिसे युक्त हैं, बाह्यजगत्‌के ही दर्शन करनेवाले हैं, इन्द्रियोंके दास और भवरोगसे ग्रस्त हैं, वे अपनी विकृत बुद्धिके द्वारा वास्तविक महाजनको समझ अथवा पहचान नहीं पाते, क्योंकि उनकी बुद्धि सदा ही भ्रम-प्रमादादि चार दोषोंसे दूषित है। अनादि कालसे रक्त-माँस अथवा शुक्रादि सात धातुओंसे बने शरीरमें 'आत्म'-बुद्धि और रुचि रखनेवाले व्यक्ति भेड़चालकी भाँति इन्द्रियोंसे ही प्राप्त ज्ञानके स्रोतमें बह रहे हैं। इस प्रकार प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायके कई लोग श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद जैसे महाजनोंके वचनोंका भी अनादर करके, महाजनोंके चरणोंमें अपराध सञ्चय करके, महाजनको सङ्कीर्ण विचारादि वाले कहकर अपने लिये विपत्तिका स्वयं ही वरण कर रहे हैं। अन्य कई लोग अपनी इन्द्रियभोगोंके अनुरूप धारणाके अनुसार कल्पित महाजनोंकी सृष्टि करके व्यभिचार, लाम्पट्य, लाभ, पूजा, प्रतिष्ठाशा, कुटीनाटी (कपटता), ईर्ष्या आदि असंख्य अपराधजनक कार्योंमें लिप्त हो रहे हैं। जीव जब तक वास्तविक 'महाजन'का निर्णय नहीं कर पाता, तब तक उसकी कोई भी चेष्टा सुफल देनेवाली नहीं हो सकती। महाजनके स्वरूपके निर्णयके विषयमें मध्यलीला 25/54-55, 57 संख्यामें कहा है— “परम कारण ईश्वरे কেহ নাহি माने। स्व-स्व-मत स्थापे परमतरे खण्डने॥ ताते छय दर्शन हैते 'तत्त्व' नाहि जानि। 'महाजन' येइ कहे, सेइ 'सत्य' मानि। श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी—अमृतेर धार। तिँहो ये कहये वस्तु, सेइ 'तत्त्व'—सार॥” अर्थात् सांख्य-पातञ्जल आदि दर्शनमें कोई भी वास्तवमें विष्णुको 'ईश्वर'के रूपमें नहीं मानते। वे सभी 'प्रच्छन्न' अथवा 'अप्रच्छन्न' नास्तिक हैं, अर्थात् कोई भी 'आस्तिक' नहीं हैं। उन्होंने केवल अपने-अपने-मतवादकी बहादुरी प्रदर्शित करनेके लिये तर्कके द्वारा दूसरोंके मतका खण्डन और अपने-अपने मतवादको स्थापित करनेकी चेष्टामात्र की है; इसलिये ये सब शास्त्रोंका उपदेश प्रदान करनेवाले जगत्में 'महाजन' कहलाकर परिचित होनेपर भी वास्तवमें वे 'महाजन' नहीं हैं—वे ही अत्यन्त 'सङ्कीर्ण' और 'अनुदार' (उदार नहीं) हैं। यह बात सुनकर इन सभी तथाकथित महाजनोंके भक्त अपने प्राकृत इन्द्रियोंके ज्ञानके अनुसार श्रीमन्महाप्रभु और शुद्ध भक्तोंके चरणोंमें अपराध करके कहेंगे,–“यह 'हठ' मात्र है।” उनकी धारणा है कि श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु अथवा श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद पूर्वोक्त व्यक्तियों जैसे ही एक महाजन मात्र हैं। वे तो प्राकृत-सहजधर्मकी विचारधारासे चिद् और जड़का सामञ्जस्य करनेवाले हैं, इसलिये वे इस प्रकारका सिद्धान्त कहेंगे, इस विषयमें सन्देह और आश्चर्य कैसा? किन्तु जिनका अप्राकृत स्वरूपधर्म जागरित हुआ है, वे उस स्वरूपधर्मके आलोकसे प्रकाशित प्रत्येक जीवके ही स्वरूपका दर्शन करनेमें समर्थ हैं। महाभागवत अथवा परमहंसका ही अधोक्षज- दर्शन अथवा सु-दर्शन होता है, इसलिये वे निष्किञ्चन ही एकमात्र वास्तविक 'महाजन' हैं। श्रील माधवेन्द्रपुरी गोस्वामी भी निष्किञ्चन महाजन हैं; उनके आचरणमें किसी भी प्रकारकी मत्सरता अथवा लोगोंको छलनेकी वृत्ति नहीं है; उन्होंने आचरण करके जो प्रचार किया है, उनके द्वारा प्रदर्शित उसी दैव-वर्णाश्रम-धर्मको आदर्श मानकर अनुगमन करनेसे ही अपना कल्याण चाहनेवाले जीवोंका निश्चय ही मङ्गल होगा, महाप्रभुने उसी दैव-वर्णाश्रम-धर्मके आदर्शका प्रदर्शन करके शिक्षा दी है। श्रीमद्भागवतमें (6/3/19-21)—'बारह' महाजनोंके नाम उल्लिखित हैं। कलियुगमें भगवद्भक्ति-प्रचारक शुद्धवैष्णव-सम्प्रदायके चार आचार्य ही 'महाजन' हैं। हमारे सम्प्रदायमें गौड़ीयेश्वर श्रीदामोदरस्वरूप ही मूल 120 ।