श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1565, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय 17/185 ] गुरुभक्तोंको महाजन मान सकते हैं। स्त्री-सङ्गप्रिय पुरुषाभिमानी व्यक्तियोंके लिये दक्षादि स्त्री-पूजक प्रजापतिगण ही महाजन हैं। सांसारिक लोगोंके लिये दैहिक और मानसिक रोग, शोक, दुःख, भय अथवा फल्गु अभावको दूर करनेके प्रयासी चिकित्सक, समाजसेवी व्यक्ति 'महाजन'के रूपमें कहे जा सकते हैं। मायासे मोहित जीवोंके लिये विष्णुसम्बन्ध-विहीन 'दार्शनिक', 'वैज्ञानिक', 'ऐतिहासिक', 'साहित्यिक', 'कवि', 'कुशल वक्ता', 'समाजपति' अथवा 'देशनेता'—'महाजन' कहलाकर निर्णीत हो सकते हैं। स्वयं ही ठगे जानेवाले लोग ऐसे व्यक्तियोंको महाजन मान लेते हैं जो आत्माकी नित्यवृत्ति भगवद्भक्तिको भी वंश-परम्पराके अधीन कहते हैं। ऐसे 'तथाकथित- महाजन' स्वयंको किसी महाजनका वंशज होनेकी दुहाई देकर भगवद्भक्ति अथवा गुरु होनेके दावेदार बनकर लोगोंको ठगते हैं। ऐसे धनके लोभी लोग गिद्धके समान हैं। श्रीहरिदास ठाकुर जैसे वास्तविक साधुके विरोधी और उनके अप्राकृत हरिभजनकी चेष्टाका कृत्रिम बाहरी अनुकरण करनेवाले 'ढोंगी-विप्र', कपट और छल विद्याको जाननेवाले; पूतना, तृणावर्त्त, वत्सासुर, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर, कालिय, प्रलम्ब आदि असुरगण; अथवा विष्णु-विरोधी पौण्ड्र दैत्यगुरु शुक्राचार्य, नास्तिक चार्वाक, वेण, सुगत, अर्हत् आदिको भी लोग महाजन मान लेते हैं। कई लोग श्रीगौरकृष्णके परम-सत्य अथवा उनके परमेश्वर होनेमें विश्वास नहीं करते। परन्तु स्वयंको अवतार कहलानेकी इच्छासे ऐसे ठग लोग उनका अनुकरण करके विष्णुविरोधी मनोधर्मी मनोहर वचन प्रयोग करके मूर्ख दुर्भागे लोगोंके द्वारा महाजनके रूपमें कल्पित हो सकते हैं। फलस्वरूप भगवद्भक्तिहीन व्यक्तिके लिये इस प्रकार 'अन्याभिलाषी', 'कर्मी', 'शुष्कज्ञानी', 'अभक्त-योगी' अथवा कनक-कामिनी-प्रतिष्ठाके लोभी व्यक्ति 'महाजन'के रूपमें निर्दिष्ट हो सकते हैं, यह सत्य है। किन्तु निरस्त-कुहक (छलरहित) परम-सत्य अथवा वास्तव-वस्तुको प्रतिपादन करनेवाली निर्मत्सर श्रीमद्भागवत कहती है, (6/3/25)— “प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं देव्या विमोहितमतिर्बत माययालाम्। त्रय्यां जड़ीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां वैतानिके महति कर्मणि युज्यमानः ॥ ” अर्थात् “जगत्में जो सब कर्मी 'महाजन'के नामसे विख्यात हैं, वे सब धर्मके विषयमें बतलानेवाले लोग भगवद्भक्तिके माहात्म्यको नहीं जानते। उनकी बुद्धि भगवान्की त्रिगुणमयी मायाके द्वारा विमोहित हो जाती है। इसलिये वे भगवद्भक्तिको ग्रहण न करके लौकिक फलोंको देनेवाले बड़े-बड़े याग-यज्ञोंरूपी कर्मकाण्डमें संलग्न रहते हैं। इन सब महाजनोंकी मति ऋक्-साम- यजुर्वेदके मधुर प्रतीत होनेवाले अर्थवाद-वाक्योंमें दृढ़तासे लगी रहती है। यद्यपि साधारण लोग उन्हें 'महाजन'के रूपमें मान लेते हैं, तथापि उनकी बुद्धि पुरुषोत्तम श्रीभगवान्की नित्यसेवासे युक्त नहीं हैं।” जगत्के लोग 'कर्मवीर'के रूपमें परिचित हो सकते हैं, 'धर्मवीर' कहलाकर सम्मान प्राप्त कर सकते हैं, 'ज्ञानवीर' कहलाकर प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, 'वैराग्य और त्यागके आदर्श' कहलाकर पूजित हो सकते हैं, किन्तु श्रीमद्भागवत (3/23/56) कहती है— “नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते। न तीर्थपादसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः॥” अर्थात् “इस जगत्में जो कर्मवीर 'धर्म'के लिये कर्म न करें, जो त्यागवीर 'श्रीविष्णुकी प्रीतिके लिये भोग त्याग' न करें, वे व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृत हैं।” वास्तवमें श्रीहरिकी सन्तुष्टिका नाम ही 'सेवा' है। इसलिये जिस कर्ममें, जिस धर्ममें, जिस त्यागमें श्रीकृष्णकी कोई प्रीति अथवा सम्बन्ध नहीं है, वह देशकी सेवा, देशवासियोंकी सेवा, समाजकी सेवा, वंश-परम्परापर ही आधारित अदैव-वर्णाश्रमकी सेवा, रोगीकी सेवा, दरिद्रकी सेवा, निर्धनकी सेवा या धनवानकी सेवा, स्त्री-जातिकी सेवा, अनेक देवताओंकी सेवा आदि 'श्रेष्ठ-गुण-सम्पत्' अथवा 'प्रातः स्मरणीय कार्य'के नामसे जगत्में प्रचलित होनेपर भी वह वास्तवमें अपनी । 119