भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1564, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1564

[ 17/181-185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “तोमारे 'भिक्षा' दिब—बड़ भाग्य से आमार। तुम्हि—ईश्वर, नाहि तोमार विधि-व्यवहार ॥ 182 ॥ विप्रका श्रीगौरप्रेम एवं अद्वैव-वर्णाश्रमियोंका तिरस्कार :- ‘मूर्ख’–लोक करिबेक तोमार निन्दन। सहिते ना पारिमु सेइ 'दुष्टे'र वचन ॥"183 ॥ अनुवाद—इसलिये महाप्रभुने स्वयं उन ब्राह्मणसे भिक्षा माँगी, परन्तु वे ब्राह्मण स्वाभाविक दीनतासे कहने लगे,—"यह तो मेरा परम सौभाग्य है कि मैं आपको भिक्षा प्रदान करूँगा। और आप तो ईश्वर हैं, इसलिये आपके लिये विधि-व्यवहारका कोई बन्धन नहीं है। किन्तु मूर्ख लोग आपकी निन्दा करेंगे। तब मैं उन दुष्टोंके वचनोंको सहन नहीं कर पाऊँगा॥"181-183 ॥ अनुभाष्य—इस प्रसङ्गमें मध्यलीला, 10/136-140 संख्या देखें। जन्मके अनुसार उन शुद्धभक्त ब्राह्मणका जल भी स्पर्श योग्य नहीं होनेपर भी भक्तिके अनुकूल दैव- वर्णाश्रममें और सत्यकी प्रतिष्ठामें उनकी निष्ठा थी। इसलिये उन्होंने निर्भय होकर महाप्रभु और शुद्धभक्तिके प्रतिकूल, वैष्णवोंमें जाति-बुद्धि करनेवाले अद्वैव- वर्णाश्रमी एवं महाप्रसादमें कुतर्क करनेवालोंको 'मूर्ख' और 'दुष्ट' आदि शब्दोंसे सम्बोधन करनेमें दुविधा अनुभव नहीं की। यद्यपि वैष्णव स्वभावसे दीन होते हैं, तथापि वे उच्चकुलमें उत्पन्न होनेका अभिमान करनेवाले विष्णु-विरोधी स्मार्त्त ब्राह्मणोंके पैरोंको चाटनेकी चेष्टा नहीं करते ॥ 182-183 ॥ मनोधर्मी व्यक्तियोंके विभिन्न पथोंका वर्णन :- प्रभु कहे,—“श्रुति, स्मृति, यत ऋषिगण। सबे 'एक'-मत नहे, भिन्न भिन्न धर्म ॥ 184 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “श्रुति, स्मृति और जो ऋषि हैं, उन सबका सदा एक मत नहीं होता। इसलिये धर्मके विषयमें भिन्न-भिन्न मत हैं ॥ 184 ॥ अनुभाष्य—'एकमत'-अद्वय-ज्ञानके आधारपर प्रतिष्ठित सत्यधर्म ही 'नित्य', 'सनातन' और 'एक' है। उस धर्ममें 'उपेय' अथवा 'साध्य' जिस प्रकार एक होता है, 'उपाय' अथवा 'साधन' अथवा 'मार्ग' भी उसी प्रकार 'एक' अथवा उससे अभिन्न होता है। 'भिन्न-भिन्न धर्म,- आत्मदर्शनको छोड़कर बाहरी दर्शनके आधारपर प्रत्येक जीवके परस्पर देह और मनका विशेष-विशेष धर्म है ॥ 184 ॥ लोगोंके हितके उद्देश्यसे ही सज्जनका आचरण, इसलिये श्रीमाधवेन्द्रके द्वारा प्रदर्शित मार्ग ही एकमात्र निश्चयार्थक अथवा वास्तविक-सत्यप्रद :- धर्म-स्थापन-हेतु साधुर व्यवहार। पुरी-गोसाञिर ये आचरण, सेइ धर्म सार॥"185 ॥ अनुवाद—साधुका व्यवहार धर्मके वास्तविक तात्पर्यको स्थापित करता है। श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीका आचरण ही समस्त धर्मोंका सार है॥"185 ॥ अनुभाष्य—'साधु अथवा महाजन'-महान व्यक्तिको 'महाजन' कहते हैं। पारमार्थिक और जागतिक विचारमें 'महान'के सम्बन्धमें विभिन्न धारणाएँ होती हैं। बद्धजीव जो इन्द्रिय-तृप्तिमें और उसके साधन एकत्रित करनेमें व्यस्त है, वह अपने मनोधर्मके अनुसार उस व्यक्तिको उतना महान मानता है, जितना वह उसके इन्द्रिय-भोगको बढ़ानेका अवसर या उपाय प्रदान करता है। जैसे, एक व्यापारी उसे 'ऋण देनेवाले'को 'महाजन' मान सकता है। अथवा भोगोंकी लालसावाले कर्मियोंके लिये 'जैमिनी आदि ऋषि' अथवा विभिन्न मतपोषक धर्म-शास्त्रकार लोग महाजन हो सकते हैं। इन्द्रियों और मनको वशमें करनेके अभिलाषी व्यक्तियोंके लिये 'पतञ्जल्यादि ऋषि' महाजन हैं। शुष्क-ज्ञानियोंके लिये निरीश्वर कपिल, वशिष्ठ, दुर्वासा या दत्तात्रेय आदि केवल-अद्वैतवादिगण महाजन हैं। रजो और तमोगुणाश्रित आसुरिक व्यक्ति अमानुषिक-बलशाली विष्णु-विरोधी-कार्योंमें अतुलनीय दृढ़ हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण और उसके पुत्र मेघनाद, जरासन्धादि राजा, एकलव्य और कर्ण आदि 118 ।