श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1563, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/165-181 ] अनुवाद-तब श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने उन्हें श्रीमाधवेन्द्र पुरीके साथ महाप्रभुके सम्बन्धके विषयमें बतलाया। यह सुनकर वे ब्राह्मण बड़े आनन्दित हुए और नृत्य करने लगे॥ 174॥ अनुभाष्य-पहले पाण्डरपुरमें श्रीरङ्गपुरीने भी महाप्रभुसे इसी प्रकार कहा था-मध्यलीला 9/289 और 291 संख्या देखें॥ 165-174॥ महाप्रभुको अपने घरमें लाना और सेवा करना :- तबे विप्र प्रभुरे लञा आइला निज-घरे। आपन-इच्छाय प्रभुर नाना सेवा करे ॥ 175 ॥ ब्राह्मणका दीनतापूर्वक भट्टके द्वारा अन्नका पाक कराना, शुद्धभक्तिके अनुकूल दैववर्णाश्रमधर्म-पालक महाप्रभुका यथार्थ शास्त्र-तात्पर्यको बताते हुए लोकशिक्षा देना :- भिक्षा लागि' भट्टाचार्ये कराइला रन्धन। तबे महाप्रभु हासि' बलिला वचन ॥ 176 ॥ श्रीपुरीकी कृपा-प्राप्त ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षाकी अभिलाषा :- “पुरी-गोसाञि तोमार घरे करयाछेन भिक्षा। मोरे तुमि भिक्षा देह,—एइ मोर 'शिक्षा' ॥” 177 ॥ अनुवाद-तब वे ब्राह्मण महाप्रभुको अपने घरपर ले आये और वे स्वयं ही महाप्रभुकी अनेक प्रकारकी सेवा करने लगे। उन ब्राह्मणने बलभद्र भट्टाचार्यसे महाप्रभुके लिये रसोई बनानेके लिये कहा। तब महाप्रभुने हँसते हुए कहा, “श्रीमाधवेन्द्रपुरीने आपके घरमें भोजन ग्रहण किया है, इसलिये मुझे भी आप अपने हाथोंसे भोजन बनाकर खिलाओ। यही मेरी 'शिक्षा' है॥” 175-177॥ आचार्यका आचरण ही लोगोंका आदर्श :- श्रीमद्भगवद्गीता (3/21) में- यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते ॥ 178 ॥ अनुवाद-श्रेष्ठ पुरुष जिस प्रकारका आचरण करते हैं, उसीका ही अन्य लोग अनुकरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको 'प्रमाण' कहता है, सभी लोग उसीमें अनुरत होते हैं॥ 178 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 3/25 संख्या देखें ॥ 178 ॥ जन्मके आधारपर उस ब्राह्मणका भोजन ग्रहण योग्य नहीं :- यद्यपि 'सनोड़िया' हय सेइत' ब्राह्मण। सनोड़िया-घरे संन्यासी ना करे भोजन ॥ 179 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा 'वैष्णव' अथवा शुद्ध-ब्राह्मण जानकर उन्हें शिष्यके रूपमें स्वीकार करना :- तथापि पुरी देखि' ताँर 'वैष्णव'-आचार। 'शिष्य' करि' ताँर भिक्षा कैल अङ्गीकार ॥ 180 ॥ अनुवाद-यद्यपि वे 'सनोड़िया' ब्राह्मण थे और सनोड़ियाके घरमें संन्यासी भोजन नहीं करते, तथापि श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उनके वैष्णव जैसे आचरणको देखकर उन्हें अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण किया था। और उनके द्वारा दी गयी भिक्षाको भी स्वीकार किया था॥ 179-180॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पश्चिम भारतमें वैश्य लोग 'अग्रवाल', 'कालोयार', 'सानोयाड़' आदि कुछ भागोंमें विभक्त हैं। उनमेंसे अग्रवाल ही अतिशुद्ध हैं; कालोयार, सानोयाड़ आदि श्रेणी-अपने-अपने कार्योंके दोषके कारण पतित हैं। इन कालोयारों और सानोयाड़ों आदिका जो याजन करते हैं अर्थात् जिनके यजमान ये लोग हैं, उन्हें 'सनोड़िया ब्राह्मण' आदि कहते हैं। 'सानोयाड़'-शब्दका अर्थ 'सोनेका व्यापारी' है, उनके याजक-ब्राह्मण ही 'सनोड़िया-(वर्ण) ब्राह्मण' हैं। याजन दोषसे पतित होनेके कारण उन ब्राह्मणोंके घरमें संन्यासी भोजन नहीं करते ॥ 179 ॥ महाप्रभुकी उनके घरमें भिक्षाकी अभिलाषाको सुनकर ब्राह्मणकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- महाप्रभु ताँरे यदि 'भिक्षा' मागिल। दैन्य करि' सेइ विप्र कहिते लागिल ॥ 181 ॥ । 117