श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1562, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/161-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हुए हँस रहे हैं, रो रहे हैं, नाच रहे हैं, गा रहे हैं, तो यह निश्चित ही है कि ये श्रीकृष्णके अवतार हैं। ये लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही मथुरा आये हैं॥ 161-163 ॥ ब्राह्मणके सम्बन्धकी बात सुनकर महाप्रभुने उनके चरणोंकी वन्दना की। भयभीत होकर वे ब्राह्मण भी महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 166-169 ॥ मर्यादा-रक्षक महाप्रभुका गुरुके निकट दीनता प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-“तुमि 'गुरु', आमि 'शिष्य'-प्राय। 'गुरु' हञा 'शिष्ये' नमस्कार ना युयाय॥” 170 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “आप मेरे 'गुरु'तुल्य हैं और मैं आपके 'शिष्य'के समान हूँ। 'गुरु' होकर 'शिष्य'को प्रणाम करना उचित नहीं है॥” 170 ॥ उस ब्राह्मणके प्रेमके दर्शन करके उसके परिचयकी जिज्ञासा :- तबे महाप्रभु सेइ ब्राह्मणे लञा। ताँहारे पुछिला किछु निभृते बसिया॥ 164 ॥ “आर्य, सरल तुमि-वृद्धब्राह्मण। काँहा हैते पाइले तुमि एइ प्रेमधन?”॥ 165 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उन ब्राह्मणको अपने साथ ले जाकर एकान्तमें बैठकर उनसे पूछा, - “आप एक वृद्ध ब्राह्मण हैं, आप समर्पित और भक्तिमें उन्नत हैं। आपको यह प्रेमधन कहाँसे प्राप्त हुआ?”॥ 164-165 ॥ ब्राह्मणका भय और दैन्य-ज्ञापन :- शुनिया विस्मित विप्र कहे भय पाञा। “ऐछे बात कह केने संन्यासी हञा॥ 171 ॥ महाप्रभुको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके साथ सम्बन्धयुक्त समझकर ब्राह्मणका अनुमान :- किन्तु तोमार प्रेम देखि' मने अनुमानि। माधवेन्द्र-पुरीर 'सम्बन्ध' धर-जानि॥ 172 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके सम्बन्धके बिना अन्यत्र श्रीकृष्णप्रेम अप्राप्य :- कृष्णप्रेमा ताँहा, याँहा ताँहार 'सम्बन्ध'। ताँहा बिना एइ प्रेमार काँहा नाहि गन्ध॥” 173 ॥ अपने गुरुदेव श्रीमाधवेन्द्रका परिचय देना :- विप्र कहे,-“श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी। भ्रमिते भ्रमिते आइला मथुरा-नगरी॥ 166 ॥ कृपा करि' तँहो मोर निलये आइला। मोरे शिष्य करि' मोर हाते 'भिक्षा' कैला॥ 167 ॥ गोपाल प्रकट करि' सेवा कैल 'महाशय'। अद्यापिह ताँहार सेवा 'गोवर्धने' हय॥” 168 ॥ गुरुबुद्धिसे महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणकी वन्दना, ब्राह्मणका भय और सम्भ्रमपूर्वक महाप्रभुको प्रणाम :- शुनि' प्रभु कैल ताँर चरण-वन्दन। भय पाञा प्रभु-पाय पड़िला ब्राह्मण॥ 169 ॥ अनुवाद-यह सुनकर ब्राह्मण विस्मित और साथ ही भयभीत भी हो गये। उन्होंने कहा, - “आप संन्यासी होकर ऐसी बात क्यों कह रहे हैं? किन्तु आपके उन्नत श्रीकृष्णप्रेमको देखकर मैंने अनुमान लगाया कि अवश्य ही श्रीमाधवेन्द्रपुरीके साथ आप सम्बन्ध रखते हैं। उनसे किसी-न-किसी प्रकारका कोई सम्बन्ध होनेपर ही इस प्रकारके उन्नत श्रीकृष्णप्रेमका अनुभव किया जा सकता है। उनसे सम्बन्धके बिना ऐसे प्रेमकी गन्ध भी कहीं नहीं हो सकती॥” 171-173 ॥ अनुवाद-ब्राह्मणने कहा, - “श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी भ्रमण करते-करते मथुरा नगरीमें आये थे। कृपा करके वे मेरे घरपर आये और उन्होंने मुझे अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार किया। उन्होंने मेरे हाथोंसे भिक्षा (भोजन) भी ग्रहण की थी। उन्होंने श्रीगोपालको प्रकट कराके उनकी सेवा की थी। आज तक भी गोवर्धनमें उन श्रीगोपालकी सेवा होती है।” श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे उन भट्टके द्वारा महाप्रभुके गुरुका परिचय देना :- तबे भट्टाचार्य तारे 'सम्बन्ध' कहिल। शुनि' आनन्दित विप्र नाचिते लागिल॥ 174 ॥ 116 |