श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1567, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/185-189 ] 'महाजन' हैं। उनके अभिन्न कलेवर परमतत्त्व- श्रीगौरसुन्दरके प्रियतम श्रीरूप-सनातन अथवा श्रीरूपानुग साधुजन, सभी 'महाजन' हैं। श्रीविष्णुस्वामीके अनुगत शुद्धाद्वैतवादी श्रीधरस्वामी भी 'महाजन' हैं। चण्डीदास, विद्यापति, जयदेव-ये सभी महाजन हैं। किन्तु जो इन सभी महाजनोंकी सेवा करनेके बदलेमें इन्हें अपने- अपने तुच्छ स्वार्थसिद्धिके उपकरणके रूपमें मानते हैं अथवा 'गुरुके ऊपर गुरुगिरि' करनेके लिये दौड़ते हैं, वे सभी दुर्भागे व्यक्ति इन सभी महाजनोंसे बहुत दूरमें अवस्थित हैं। इन्द्रिय सुखभोगका लोभ या माया-दास्य ही उनके निकट 'कल्पित महाजन'की मूर्ति लेकर उपस्थित होता है और उन्हें छलकर उनकी इन्द्रियोंको वास्तविक सत्यके पथसे दूर करके पागल बना देता है। इसलिये शुद्ध भगवद्भक्तोंकी चेष्टाएँ कभी भी उनकी प्राकृत बुद्धिकी धारणाका विषय नहीं होतीं ॥ 185 ॥ शुद्धभक्तोंका पथ ही अनुसरणीय :- महाभारतके वनपर्व (313/117) में- तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥ 186 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 186 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा- शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, जिसका मत भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; इसलिये धर्मतत्त्व गूढ़रूपसे ढका हुआ है अर्थात् शास्त्रादि पढ़कर धर्मतत्त्वको जानना कठिन है। इसलिये जिन्हें साधुओंने 'महाजन' कहकर निर्णय किया है, वे जिस मार्गको 'शास्त्र-मार्ग' कहते हैं, उसी मार्गपर ही अन्य सभी व्यक्तियोंका चलना उचित है ॥ 186 ॥ अनुभाष्य- ('वेदा विभिन्नाः स्मृतयो विभिन्नाः' इति पाठान्तरञ्च दृश्यते)। तर्कः अप्रतिष्ठः (अस्थिरः नाचलः), श्रुतयः अपि विभिन्नाः (अधिकारभेदेन विरोधप्रदर्शनपराः); असौ ऋषिः न [वाच्यः] यस्य मतं (सिद्धान्तः) भिन्नं न [आसीत्]; [एवम्बिधे तर्क प्रधान-युगे] धर्मस्य (सनातन-जैवधर्मस्य) तत्त्वं गुहायां (साधारण- लोक-लोचनागोचर-शुद्धसज्जनसम्प्रदायैक-हृद्गह्वरे) निहितं (पिहितं लुक्वायितम्; अतः) येन (सत्पथेन) महाजनः (पूर्वतमाः अधोक्षजाच्युत-सेवकः सज्जनः) गतः (प्राप्तः) स (एव) पन्थाः (शुद्धमार्गः)। श्लोक-भावानुवाद-('वेदा विभिन्नाः स्मृतयो विभिन्नाः' यह पाठान्तर दिखायी देता है)। तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा-शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् अधिकारभेदसे उनमें विरोध प्रदर्शित होता है; जिसका सिद्धान्त भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; [इस तर्क-प्रधान युगमें] सनातन जैवधर्मका तत्त्व गूढ़रूपसे अर्थात् साधारण लोगोंके नेत्रोंसे अगोचर, किन्तु शुद्ध सज्जन सम्प्रदायके हृदयकी गुहामें छिपा हुआ है। इसलिये जिस सत्पथको पूर्व महाजनों अर्थात् अधोक्षज-अच्युतके सेवक सज्जनोंने प्राप्त किया है, वही शुद्ध मार्ग है ॥ 186 ॥ ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा :- तबे सेइ विप्र प्रभुके भिक्षा कराइल। मधुपुरीर लोक-सब प्रभुके देखिते आइल ॥ 187 ॥ अनुवाद-यह सुनकर उन ब्राह्मणने महाप्रभुको भोजन करवाया। तब मथुरापुरीके सब लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे ॥ 187 ॥ असंख्य लोगोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- लक्ष-संख्या लोक आइसे, नाहिक गणन। बाहिर हञा प्रभु दिल दरशन ॥ 188 ॥ महाप्रभुके कीर्तनमें सभीका नृत्य :- बाहु तुलि' बले प्रभु 'हरिबोल'-ध्वनि। प्रेमे मत्त नाचे लोक करि' हरिध्वनि ॥ 189 ॥ अनुवाद-लाखोंकी संख्यामें लोग आने लगे, उनकी गिनती नहीं की जा सकती। इसलिये महाप्रभुने स्वयं । 121