भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1568, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1568

[ 17/188-197 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बाहर आकर वहाँ एकत्रित सब लोगोंको दर्शन दिया और अपनी भुजाएँ उठाकर महाप्रभुने उच्च स्वरमें 'हरिबोल' कहा। एकत्रित सभी लोग 'हरि' बोलकर कीर्तन करने लगे और प्रेममें मत्त होकर नृत्य करने लगे॥ 188-189॥ यमुनाके चौबीस घाटोंपर स्नान करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणके द्वारा प्रदर्शित देखने योग्य स्थानोंका दर्शन :- यमुनार 'चब्बिश-घाटे' प्रभु कैल स्नान। सेइ विप्र प्रभुके देखाय तीर्थस्थान॥ 190॥ स्वयम्भु, विश्राम, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर। महाविद्या, गोकर्णादि देखिला विस्तर॥ 191॥ अनुवाद—महाप्रभुने यमुनाके चौबीस घाटोंपर स्नान किया। उन ब्राह्मणने महाप्रभुको स्वयम्भु, विश्रामघाट, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर, महाविद्या तथा गोकर्ण आदि सभी तीर्थस्थानोंका दर्शन कराया॥ 190-191॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यमुनाके चौबीस घाट—(1) अविमुक्त, (2) अधिरूढ़, (3) गुह्यतीर्थ, (4) प्रयागतीर्थ, (5) कनखलतीर्थ, (6) तिन्दुक, (7) सूर्यतीर्थ, (8) वटस्वामी, (9) ध्रुवघाट, (10) ऋषितीर्थ, (11) मोक्षतीर्थ, (12) बोधतीर्थ, (13) गोकर्ण, (14) कृष्णगङ्गा, (15) वैकुण्ठ, (16) असिकुण्ड, (17) चतुःसामुद्रिक-कूप, (18) अक्रूरतीर्थ, (19) याज्ञिक-विप्रस्थान, (20) कुब्जाकूप, (21) रङ्गस्थल, (22) मञ्चस्थल, (23) मल्लयुद्ध-स्थान और (24) दशाश्वमेध॥ 190-191॥ उस ब्राह्मणके साथ द्वादश वनोंका दर्शन :- 'वन' देखिबारे यदि प्रभुर मन हैल। सेइत ब्राह्मणे प्रभु सङ्गेते लइल॥ 192॥ मधुवन, ताल, कुमुद, बहुला-वन गेला। ताँहा ताँहा स्नान करि' प्रेमाविष्ट हैला॥ 193॥ अनुवाद—जब महाप्रभुको वन देखनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन ब्राह्मणको अपने साथ ले लिया। महाप्रभु मधुवन, तालवन, कुमुदवन और बहुलावन गये तथा प्रेममें आविष्ट होकर वहाँ-वहाँपर स्नान किया॥ 192-193॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वन'—बारह वन; श्रीयमुनाके पूर्वभागमें—भद्रवन, बेलवन, लौहवन, भाण्डीर-वन और महावन—ये पाँच वन हैं। यमुनाके पश्चिमभागमें— मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, काम्यवन, खदीरवन और वृन्दावन—ये सात वन हैं॥ 192॥ गो-पालन दर्शन और व्रजलीलाकी स्मृतिसे प्रेमावेश :- पथे गाभीघटा चरे प्रभुरे देखिया। प्रभुके बेड़य आसि' हुङ्कार कोरिया॥ 194॥ गाभी देखि' स्तब्ध प्रभु प्रेमेर तरङ्गे। वात्सल्ये गाभी प्रभुर चाटे सब-अङ्गे॥ 195॥ सुस्थ हञा प्रभु करे अङ्ग-कण्डूयन। प्रभु-सङ्गे चले, नाहि छाड़े धेनुगण॥ 196॥ कष्टे-सृष्ट्ये धेनु सब राखिल गोयाल। प्रभुकण्ठध्वनि शुनि' आइसे मृगीपाल॥ 197॥ अनुवाद—मार्गमें गौओंका झुण्ड चर रहा था। जैसे ही उन्होंने महाप्रभुको देखा, उसी समय उन्होंने महाप्रभुको चारों ओरसे घेर लिया और वे जोरसे रँभाने लगीं। गौओंको देखकर महाप्रभुके हृदयमें प्रेमकी लहर आयी और वे स्तब्ध हो गये और गौवें वात्सल्य-भावसे महाप्रभुके शरीरको चाटने लगीं। तब महाप्रभु अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आये और वे गौओंके अङ्गोंको सहलाने लगे। गौवें उन्हें छोड़ना नहीं चाह रही थीं, वे महाप्रभुके साथ ही चलने लगीं। ग्वालोंने किसी प्रकार बड़ी कठिनाईसे अपनी गौओंको रोका। उसके बाद जब महाप्रभु कुछ कीर्तन करने लगे, तब उनकी मधुर ध्वनिको सुनकर हिरणोंका झुण्ड उनके निकट आ गया॥ 194-197॥ 122 |