श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 17/188-197 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बाहर आकर वहाँ एकत्रित सब लोगोंको दर्शन दिया और अपनी भुजाएँ उठाकर महाप्रभुने उच्च स्वरमें 'हरिबोल' कहा। एकत्रित सभी लोग 'हरि' बोलकर कीर्तन करने लगे और प्रेममें मत्त होकर नृत्य करने लगे॥ 188-189॥ यमुनाके चौबीस घाटोंपर स्नान करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणके द्वारा प्रदर्शित देखने योग्य स्थानोंका दर्शन :- यमुनार 'चब्बिश-घाटे' प्रभु कैल स्नान। सेइ विप्र प्रभुके देखाय तीर्थस्थान॥ 190॥ स्वयम्भु, विश्राम, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर। महाविद्या, गोकर्णादि देखिला विस्तर॥ 191॥ अनुवाद—महाप्रभुने यमुनाके चौबीस घाटोंपर स्नान किया। उन ब्राह्मणने महाप्रभुको स्वयम्भु, विश्रामघाट, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर, महाविद्या तथा गोकर्ण आदि सभी तीर्थस्थानोंका दर्शन कराया॥ 190-191॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यमुनाके चौबीस घाट—(1) अविमुक्त, (2) अधिरूढ़, (3) गुह्यतीर्थ, (4) प्रयागतीर्थ, (5) कनखलतीर्थ, (6) तिन्दुक, (7) सूर्यतीर्थ, (8) वटस्वामी, (9) ध्रुवघाट, (10) ऋषितीर्थ, (11) मोक्षतीर्थ, (12) बोधतीर्थ, (13) गोकर्ण, (14) कृष्णगङ्गा, (15) वैकुण्ठ, (16) असिकुण्ड, (17) चतुःसामुद्रिक-कूप, (18) अक्रूरतीर्थ, (19) याज्ञिक-विप्रस्थान, (20) कुब्जाकूप, (21) रङ्गस्थल, (22) मञ्चस्थल, (23) मल्लयुद्ध-स्थान और (24) दशाश्वमेध॥ 190-191॥ उस ब्राह्मणके साथ द्वादश वनोंका दर्शन :- 'वन' देखिबारे यदि प्रभुर मन हैल। सेइत ब्राह्मणे प्रभु सङ्गेते लइल॥ 192॥ मधुवन, ताल, कुमुद, बहुला-वन गेला। ताँहा ताँहा स्नान करि' प्रेमाविष्ट हैला॥ 193॥ अनुवाद—जब महाप्रभुको वन देखनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन ब्राह्मणको अपने साथ ले लिया। महाप्रभु मधुवन, तालवन, कुमुदवन और बहुलावन गये तथा प्रेममें आविष्ट होकर वहाँ-वहाँपर स्नान किया॥ 192-193॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वन'—बारह वन; श्रीयमुनाके पूर्वभागमें—भद्रवन, बेलवन, लौहवन, भाण्डीर-वन और महावन—ये पाँच वन हैं। यमुनाके पश्चिमभागमें— मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, काम्यवन, खदीरवन और वृन्दावन—ये सात वन हैं॥ 192॥ गो-पालन दर्शन और व्रजलीलाकी स्मृतिसे प्रेमावेश :- पथे गाभीघटा चरे प्रभुरे देखिया। प्रभुके बेड़य आसि' हुङ्कार कोरिया॥ 194॥ गाभी देखि' स्तब्ध प्रभु प्रेमेर तरङ्गे। वात्सल्ये गाभी प्रभुर चाटे सब-अङ्गे॥ 195॥ सुस्थ हञा प्रभु करे अङ्ग-कण्डूयन। प्रभु-सङ्गे चले, नाहि छाड़े धेनुगण॥ 196॥ कष्टे-सृष्ट्ये धेनु सब राखिल गोयाल। प्रभुकण्ठध्वनि शुनि' आइसे मृगीपाल॥ 197॥ अनुवाद—मार्गमें गौओंका झुण्ड चर रहा था। जैसे ही उन्होंने महाप्रभुको देखा, उसी समय उन्होंने महाप्रभुको चारों ओरसे घेर लिया और वे जोरसे रँभाने लगीं। गौओंको देखकर महाप्रभुके हृदयमें प्रेमकी लहर आयी और वे स्तब्ध हो गये और गौवें वात्सल्य-भावसे महाप्रभुके शरीरको चाटने लगीं। तब महाप्रभु अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आये और वे गौओंके अङ्गोंको सहलाने लगे। गौवें उन्हें छोड़ना नहीं चाह रही थीं, वे महाप्रभुके साथ ही चलने लगीं। ग्वालोंने किसी प्रकार बड़ी कठिनाईसे अपनी गौओंको रोका। उसके बाद जब महाप्रभु कुछ कीर्तन करने लगे, तब उनकी मधुर ध्वनिको सुनकर हिरणोंका झुण्ड उनके निकट आ गया॥ 194-197॥ 122 |
सतरहवाँ अध्याय 17/198–207 ] महाप्रभुके दर्शनसे मृग-दम्पतियोंको सुख :– मृग-मृगी मुख देखि' प्रभु-अङ्ग चाटे। भय नाहि करे, सङ्गे याय बाटे-बाटे ॥ 198 ॥ अनुवाद—हिरण और हिरणियाँ महाप्रभुके मुखको देखकर उनके शरीरको चाटने लगे। बिना किसी भयके वे मार्गमें महाप्रभुके साथ-साथ ही चल रहे थे॥ 198 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे पक्षियोंका कलरव करना और हर्ष :– शुक, पिक, भृङ्ग प्रभुरे देखि' 'पञ्चम' गाय। शिखिगण नृत्य करि' प्रभु-आगे याय ॥ 199 ॥ अनुवाद—तोते, कोयलादि पक्षी और भँवरे महाप्रभुको देखकर 'पञ्चम' स्वरमें गान करने लगे तथा मयूर नृत्य करते हुए महाप्रभुके आगे चलने लगे॥ 199 ॥ वृक्ष और लताओंके द्वारा भी पुलकाश्रु-वर्षण :– प्रभु देखि' वृन्दावनर वृक्ष-लतागणे। अङ्कुर-पुलक, मधु-अश्रु वरिषेणे ॥ 200 ॥ फूल-फल भरि' डाल पड़े प्रभु-पाय। बन्धु देखि' बन्धु येन 'भेट' लञा याय ॥ 201 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर वृन्दावनके वृक्ष और लताएँ आनन्दसे अङ्कुरित तथा पुलकित हो उठे। वे मधुके रूपमें प्रेमाश्रु बहाने लगे। वृक्ष और लताएँ फूलों और फलोंके भारसे महाप्रभुके चरणोंमें झुककर उनको (फूलों-फलोंको) उपहारके रूपमें देते हुए उनका अभिवादन करने लगे मानो महाप्रभु उनके मित्र हों॥ 200–201 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे स्थावर, जङ्गम, सभीमें ही हर्ष और महाप्रभुके साथ क्रीड़ा :– प्रभु देखि' वृन्दावनर स्थावर-जङ्गम। आनन्दित—बन्धु येन देखे बन्धुगण ॥ 202 ॥ ता-सबार प्रीति देखि' प्रभु भावावेशे। सबा-सने क्रीड़ा करे, हञा तार वशे ॥ 203 ॥ प्रति वृक्ष-लता प्रभु करेन आलिङ्गन। पुष्पादि ध्याने करेन कृष्णे समर्पण ॥ 204 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर वृन्दावनके चल और अचल प्राणी ऐसे आनन्दित हो रहे थे जैसे बन्धुको देखकर बन्धु प्रसन्न होते हैं। उन सबकी प्रीतिको देखकर महाप्रभु भावावेशमें आ गये। उन सबके साथ वे मित्रवत् क्रीड़ा करने लगे। इस प्रकार वे स्वतः ही उनके वशीभूत हो गये थे। महाप्रभु प्रत्येक वृक्ष और लताको आलिङ्गन करने लगे और उनके पुष्प- फलादिको ध्यानके माध्यमसे श्रीकृष्णको समर्पित करने लगे॥ 202–204 ॥ श्रीकृष्णप्रेममें प्रमत्त महाप्रभु :– अश्रु-कम्प-पुलक-प्रेमे शरीर अस्थिरे। 'कृष्ण' बल, 'कृष्ण' बल बोले उच्चैःस्वरे ॥ 205 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर प्रेममें अस्थिर हो रहा था, उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे तथा उनके शरीरमें कम्प और पुलक हो रहा था। वे बहुत ऊँचे स्वरमें 'कृष्ण बोलो', 'कृष्ण बोलो' कह रहे थे॥ 205 ॥ महाप्रभुके श्रीकृष्णकीर्तनसे सभीके द्वारा श्रीकृष्ण-ध्वनि :– स्थावर-जङ्गम मिलि' करे कृष्णध्वनि। प्रभुर गम्भीर-स्वरे येन प्रतिध्वनि ॥ 206 ॥ अनुवाद—चल और अचल प्राणी, सभी मिलकर कृष्ण-कृष्ण कह रहे थे, मानो वे सब महाप्रभुके गम्भीर स्वरकी प्रतिध्वनि कर रहे थे॥ 206 ॥ हिरणके साथ महाप्रभुका प्रेम-क्रन्दन :– मृगेर गला धरि' प्रभु करेन रोदने। मृगेर पुलक अङ्गे, अश्रु नयने ॥ 207 ॥ अनुवाद—महाप्रभु तब हिरणोंके गलोंको पकड़कर रोने लगे। हिरणोंके अङ्ग पुलकित हो गये और उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे॥ 207 ॥ । 123
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[ 17/208–212 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्ण और राधाके स्वपक्षीय शुक तथा सारीके गानका श्रवण :— वृक्षडाले शुक–शारी दिल दरशन। ताहा देखि' प्रभुर किछु शुनिते हैल मन॥208॥ शुक–शारिका प्रभुर हाते उड़ि' पड़े। प्रभुके शुनाञा कृष्णेर गुण–श्लोक पड़े॥209॥ **अनुवाद—**जब वृक्षकी डालके ऊपर शुक और सारी (तोता और मैना) आकर बैठे, उन्हें देखकर महाप्रभुकी उनसे कुछ सुननेकी इच्छा हुई। शुक और सारी उड़कर महाप्रभुके हाथपर आकर बैठ गये तथा शुक श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करते हुए महाप्रभुको श्लोक सुनाने लगा॥208–209॥ शुकके द्वारा श्रीकृष्णके गुणोंका गान :— गोविन्दलीलामृत (13/29)— सौन्दर्यं ललनालिधैर्यदलनं लीला रमास्तम्भिनी वीर्यं कन्दुकिताद्रिवर्यममलाः पारे–परार्द्धं गुणाः। शीलं सर्वजनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत्प्रभुर्विश्वं विश्वजनीनकीर्त्तिरवतात् कृष्णो जगन्मोहनः॥210॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीशुकने कहा,—जिनका सौन्दर्य रमणियोंके धैर्यका हरण करता है, जिनकी लीला लक्ष्मीदेवीको स्तम्भित करती है, जिनका बल गोवर्धन पर्वतको गेंदकी भाँति खेलनेकी सामग्री बना देता है, जिनके सब अमल गुण परार्द्धातीत (अनन्त) हैं, जिनका शील–धर्म सभीको आनन्दित करता है, जगतवासियोंके हितकारीरूपमें जिनकी कीर्ति है, वे जगन्मोहन श्रीकृष्ण विश्वका पालन करें॥210॥ अनुभाष्य— यस्य (कृष्णस्य) सौन्दर्यं (मनोहररूपं) ललनालि–धैर्य–दलनं (ललनालीनां ब्रजाङ्गनासमुहानां धैर्यं दलयितुं शीलं यस्य तत्), यस्य लीला (चिद्विलासमयी क्रीड़ा) रमा–स्तम्भिनी (रमां स्तम्भयितुं क्षोभयितुं शीलं यस्याः सा), यस्य वीर्यं (पराक्रमः), कन्दुकिताद्रिवर्यं (कन्दुकितः कन्दु Bulk... कन्दुकिताद्रिवर्य्य... कन्दुकीकृतः अद्रिवर्यः गिरिराजः गोवर्धनः येन तत्), यस्य पारे–परार्द्धं (परार्द्धस्य पारं गताः अपरिमेयाः इत्यर्थः) अमलाः (दोषरहिताः) गुणाः, अहो यस्य शीलं (चरितं) सर्वजनानुरञ्जनं (सर्वेषां जनानां भक्तानाम् अनुरञ्जनम् आनन्द–विधायकं) सः अयम् अस्मत्प्रभुः (मादृशदासानाम् एकगतिः) विश्वजनीनकीर्त्तिः (सर्वजनानां हिताय कीर्त्तिः यशः यस्य सः) जगन्मोहनः (भुवन–सुन्दरः) कृष्णः विश्वम् अवतात् (रक्षतु)। **श्लोक–भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥ शुक–मुखे शुनि' तबे कृष्णेर वर्णन। शारिका पड़ये तबे राधिका–वर्णन॥211॥ **अनुवाद—**शुकके मुखसे श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर सारिका (मैना) श्रीमती राधिकाके गुणोंका वर्णन करने लगी॥211॥ सारीके द्वारा श्रीराधिकाका गुण–गान :— गोविन्दलीलामृत (13/30)— श्रीराधिकायाः प्रियता स्वरूपता सुशीलता नर्त्तनगानचातुरी। गुणालिसम्पत् कविता च राजते जगन्मनोमोहन–चित्तमोहिनी॥212॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥212॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**सारीने कहा,—श्रीमती राधिकाकी प्रियता, स्वरूपता [अर्थात् महाभावस्वरूपिणी], सुशीलता, नृत्य–गान–चातुरी, कवित्व आदि गुणराशि भुवनमोहन श्रीकृष्णकी चित्त–विमोहिनी बनकर शोभा पा रही है॥212॥ अनुभाष्य— श्रीराधिकायाः प्रियता (प्रेम), स्वरूपता (असाधारणसौन्दर्यं, स्वम् आत्मानं रूप्यते निरूप्यते येन तत्, महाभावस्वरूपं वा), सुशीलता (शोभनं शीलं सुचरितं) नर्त्तन–गानचातुरी (नर्त्तनं गानञ्च तयोः चातुरी नैपुण्यं वैदग्ध्यं वा) गुणालि–सम्पत् (गुणानां आली श्रेणी, सैव सम्पत्तिः), कविता (कवित्वं)—सर्वा च जगन्मनोमोहन–चित्तमोहिनी (जगन्मनोमोहनस्य भुवनमोहनस्य कृष्णस्य मनोमोहिनी आनन्दिनी एव) राजते (विराजते)। 124 ।
सत्रहवाँ अध्याय 17/212-219 ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥212॥ पुनः शुक कहे, -कृष्ण 'मदनमोहन'। तबे आर श्लोक शुक करिल पठन ॥213॥ अनुवाद-पुनः शुकने कहा, -श्रीकृष्ण तो 'मदनमोहन' हैं। तब शुकने एक और श्लोक पढ़ा॥213॥ शुकका गान, - श्रीकृष्ण ही 'मदनमोहन' :- गोविन्दलीलामृत (13/31)- वंशीधारी जगन्नारी-चित्तहारी स शारिके। विहारी गोपनारीभिर्जीयान्मदनमोहनः ॥214॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥214॥ अमृतप्रवाह भाष्य-शुकने कहा, - हे सारिके, वे वंशीधारी जगत्की नारियोंके चित्तका हरण करनेवाले, गोपनारियोंके साथ विहार करनेवाले मदनमोहन जययुक्त हों॥214॥ अनुभाष्य- हे शारिके, वंशीधारी (मुरलीधरः) जगन्नारीचित्तहारी (जगतां चतुर्दशभुवनानां नारीणां चित्तचौरः) गोपनारीभिः (व्रजाङ्गनाभिः सार्द्धं) विहारी (केलिरतः), सः (प्रसिद्धः) मदनमोहनः जीयात् (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तताम्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥214॥ पुनः शारी कहे शुके करि' परिहास। ताहा शुनि' प्रभुर हैल विस्मय-प्रेमोल्लास॥215॥ अनुवाद-पुनः सारिका शुकसे परिहास करते हुए कुछ कहने लगी, जिसे सुनकर महाप्रभुको आश्चर्यजनक प्रेमोल्लास हुआ ॥215॥ सारीका गान, - श्रीकृष्णके मदनमोहन होनेका मुख्य कारण श्रीराधा :- गोविन्दलीलामृत (13/32) में- राधा-सङ्गे यदा भाति तदा 'मदनमोहनः'। अन्यथा विश्वमोहोऽपि स्वयं 'मदनमोहितः'॥216॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥216॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सारिकाने परिहास करते हुए उत्तर दिया, - श्रीकृष्ण जब श्रीराधाके साथ शोभा पाते हैं, तभी वे 'मदनमोहन' हैं। श्रीराधाके साथमें नहीं रहनेपर विश्वमोहन होनेपर भी वे स्वयं ही मदनके द्वारा मोहित होते हैं॥216॥ अनुभाष्य- हे शुक, यदा कृष्णः राधासङ्गे भाति (विराजते) तदा [एव] स कृष्णः- 'मदनमोहनः'; अन्यथा (राधासङ्गरहितः सन् स कृष्णः) स्वयम् [एव] विश्वमोहः (विश्वमोहनः) अपि स्वयं मदनमोहितः (मदनेन कन्दर्पेण मोहितः- “इतस्तस्तामनुसृत्य राधिकामनङ्गबाण-व्रणखिन्नमानसः इति न्यायात्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [मदनके द्वारा मोहितका उदाहरण, 'श्रीगीतगोविन्द', तृतीय सर्गमें]-(अनङ्गबाणसे जर्जरित श्रीकृष्ण 'हाय! मैंने श्रीराधाका क्यों परित्याग किया-मेरा उनके साथ कैसे मिलन होगा-इस प्रकार अनुतापयुक्त होकर श्रीराधाका इधर उधर अन्वेषण करने लगे।)॥216॥ मयूरके दर्शनसे महाप्रभुको श्रीकृष्णके रूपकी स्मृति और मूर्च्छा :- शुक-शारी उड़ि' पुनः गेल वृक्षडाले। मयूरेर नृत्य प्रभु देखे कुतूहले ॥217॥ मयूरेर कण्ठ देखि' प्रभुर कृष्णकान्ति-स्मृति हैल। प्रेमावेशे महाप्रभु भूमिते पड़िल॥218॥ अनुवाद-शुक और सारिका उड़कर पुनः वृक्षकी डालपर जाकर बैठ गये और महाप्रभु कौतूहलपूर्वक मयूरके नृत्यको देखने लगे। मयूरके नीले कण्ठको देखकर महाप्रभुको श्रीकृष्णकी अङ्गकान्तिकी स्मृति हो आयी और वे प्रेमके आवेशमें भूमिपर गिर पड़े॥ 217-218॥ भट्टाचार्यके साथ ब्राह्मणकी महाप्रभुकी शुश्रूषा :- प्रभुरे मूर्च्छित देखि' सेइ त' ब्राह्मण। भट्टाचार्य-सङ्गे करे प्रभुर सन्तर्पण॥219॥ । 125
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[ 17/219-229 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आस्ते-व्यस्ते महाप्रभुर लञा बहिर्वास। जलसेक करे अङ्गे, वस्त्रेर वातास ॥ 220 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको मूर्च्छित देखकर वे ब्राह्मण बलभद्र भट्टाचार्यके साथ महाप्रभुकी सेवा करनेमें लग गये। उन्होंने शीघ्रतासे महाप्रभुके शरीरपर जल छिड़का और उनके बहिर्वास वस्त्रको लेकर उससे हवा करने लगे ॥ 219-220 ॥ अनुभाष्य—'सन्तर्पण'—यत्नपूर्वक सेवा ॥ 219 ॥ सतरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुके कानमें श्रीकृष्णनामका उच्चारण, महाप्रभुमें चेतनता और उनका लोट-पोट खाना :- प्रभु-कर्णे कृष्णनाम कहे उच्च करि'। चेतन पाञा प्रभु या'न गड़ागड़ि ॥ 221 ॥ अनुवाद—वे महाप्रभुके कानमें उच्च स्वरसे श्रीकृष्णनाम सुनाने लगे। श्रीकृष्णनाम सुनकर महाप्रभुकी चेतनता तो लौट आयी, किन्तु अभी भी प्रेमावेशमें वे भूमिपर लोट-पोट खाने लगे ॥ 221 ॥ भट्टके प्रयत्नसे महाप्रभुका आवेश शान्त होना :- कण्टक-दुर्गम वने अङ्ग क्षत हैल। भट्टाचार्य कोले करि' प्रभुरे सुस्थ कैल ॥ 222 ॥ अनुवाद—काँटोंसे भरे दुर्गम वनमें भूमिपर लोटनेसे महाप्रभुके अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये। बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुको गोदमें लेकर उनके आवेशको कुछ शान्त किया ॥ 222 ॥ प्रेमावेशमें महाप्रभुके द्वारा हरिध्वनि :- कृष्णावेशे प्रभुर प्रेमे गरगर मन। 'बोल्' 'बोल्' करि' उठि' करेन नर्त्तन ॥ 223 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके आवेशमें महाप्रभुका मन प्रेममें विचलित हो रहा था। वे उसी समय उठ खड़े हुए और [क्योंकि वे श्रीकृष्णनाम सुनना चाहते थे, इसलिये] 'बोलो', 'बोलो' कहकर नृत्य करने लगे ॥ 223 ॥ श्रीकृष्णनामकीर्तन, महाप्रभुकी यात्रा :- भट्टाचार्य, सेइ विप्र 'कृष्णनाम' गाय। नाचिते नाचिते पथे प्रभु चलि' याय ॥ 224 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञानुसार बलभद्र भट्टाचार्य और वे ब्राह्मण—दोनों श्रीकृष्णनामका कीर्तन करने लगे। तब महाप्रभु नाचते-नाचते मार्गमें चल पड़े॥ 224 ॥ ब्राह्मणको विस्मय और महाप्रभुके लिये चिन्ता :- प्रभुर प्रेमावेश देखि' ब्राह्मण—विस्मित। प्रभुर रक्षा लागि' विप्र हइला चिन्तित ॥ 225 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर ब्राह्मण विस्मित हो गये। तब वे महाप्रभुकी रक्षाके लिये चिन्ता करने लगे ॥ 225 ॥ पुरीकी अपेक्षा वृन्दावन-यात्राके पथमें अधिक प्रेमावेश :- नीलाचले छिला यैछे प्रेमावेश मन। वृन्दावन याइते पथे हैल शतगुण ॥ 226 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका मन नीलाचलमें जैसे प्रेमके आवेशमें रहता था, वृन्दावन जानेके पथमें वह सौ-गुणा अधिक प्रेमके आवेशमें डूब गया था ॥ 226 ॥ यात्रा-पथकी अपेक्षा मथुराके दर्शनसे, और उसकी अपेक्षा वृन्दावनके भ्रमणमें अधिक प्रेम :- सहस्रगुण प्रेम बाड़े मथुरा-दरशने। लक्षगुण प्रेम बाड़े, भ्रमेण यबे वने ॥ 227 ॥ साक्षात् वृन्दावनमें आकर प्रतिक्षण गाढ़-श्रीकृष्णप्रेममें निमग्न :- अन्य-देशे प्रेम उछले 'वृन्दावन'-नामे। साक्षात् भ्रमये एबे सेइ वृन्दावने ॥ 228 ॥ अभ्यासवश दैनिक कृत्यादिका सम्पन्न होना :- प्रेमे गरगर मन रात्रि-दिवसे। स्नान-भिक्षादि-निर्वाह करेन अभ्यासे ॥ 229 ॥ अनुवाद—मथुराके दर्शनसे उनका प्रेम हजार गुणा बढ़ गया था। परन्तु जब महाप्रभु वृन्दावनके वनोंमें 126 ।
सत्रहवाँ अध्याय 17/227-234 ] भ्रमण कर रहे थे, तब वह प्रेम लाख गुणा बढ़ गया था। जब महाप्रभु अन्य स्थानोंपर होते थे, तब वृन्दावनके नामसे ही उनमें प्रेमावेश आ जाता था। अब जब वे साक्षात् उस वृन्दावनमें भ्रमण कर रहे थे, तब महाप्रभुका मन दिन-रात प्रेममें निमग्न रहता था। स्नान-भोजनादिका निर्वाह तो वे अभ्यासवशतः कर रहे थे॥227-229॥ महाप्रभुका यह प्रेम अवर्णनीय :- एइमत प्रेम, यावत् भ्रमिल 'बार' वन। एकत्र लिखिलुँ, सर्वत्र ना याय वर्णन ॥ 230 ॥ अनुवाद-इसलिये महाप्रभुके बारह वनोंका भ्रमण करते हुए जैसा प्रेमावेश प्रकाशित हो रहा था, उसे मैंने एक ही स्थानपर सब लिख दिया है। विस्तारसे उसका सम्पूर्ण विवरण प्रदान करना सम्भव नहीं है॥230॥ भगवान् शेषकी भी महाप्रभुके वृन्दावनमें भ्रमण करते समय प्रेमके वर्णनमें असमर्थता :- वृन्दावने हैल प्रभुर यतेक प्रेमेर विकार। कोटि-ग्रन्थे 'अनन्त' लिखेन ताहार विस्तार ॥ 231 ॥ इस अध्यायमें उसका दिग्दर्शन मात्र ही वर्णित :- तबु लिखिबारे नारे तार एक कण। उद्देश करिते करि दिग्दरशन ॥ 232 ॥ अनुवाद-वृन्दावनमें महाप्रभुमें जितना प्रेमका विकार हुआ, करोड़ों ग्रन्थोंमें लिखकर श्रीअनन्तदेव उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं, किन्तु तब भी वे उसके एक कणको भी नहीं लिख पाते। इसलिये मैं तो केवल उसको इङ्गित करनेके लिये दिग्दर्शन मात्र ही करवा रहा हूँ॥231-232॥ श्रीकृष्णप्रीतिकी गाढ़ताके परिमाणके अनुसार ही श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाकी बाढ़का स्पर्श :- जगत् भासिल चैतन्यलीलार पाथारे। याँर यत शक्ति तत पाथारे साँतारे ॥ 233 ॥ अनुवाद-समस्त जगत् श्रीचैतन्यलीलाकी बाढ़में डूब गया। जिसमें जितनी शक्ति है, उतना ही वह उस बाढ़के जलमें तैरता है ॥ 233 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पाथार'-जलकी वृद्धिरूपी बाढ़॥233॥ सतरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 234 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीवृन्दावनगमनं नाम सप्तदश-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 234 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीवृन्दावनगमन नामक सतरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 127
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 128 ।
अठारहवाँ अध्याय कथासार-आरिट-ग्राममें राधाकुण्ड और श्याम- कुण्डका आविष्कार करके महाप्रभुने गोवर्धनमें 'हरिदेव'के दर्शन किये। महाप्रभु गोवर्धनके ऊपर चढ़कर श्रीगोपालका दर्शन नहीं करेंगे, इसलिये म्लेच्छोंके भयके 'छल'से श्रीगोपाल अन्नकूटग्राम (अन्यौर)से बाहर निकलकर गाठोली ग्राममें आ गये। महाप्रभुने गाठोली ग्राममें जाकर उनके दर्शन किये। भक्तवर श्रीरूप गोस्वामीको कृपापूर्वक दर्शन देनेके लिये श्रीगोपाल उसके बहुत दिनोंके बाद मथुरामें विट्ठलेश्वरके मन्दिरमें आकर 'एक मास' तक रहे थे-इस प्रसङ्गको श्रीकविराज गोस्वामीने इसी प्रसङ्गमें लिखा है। महाप्रभुने नन्दीश्वर, पावन-सरोवर, शेषशायी, खेलातीर्थ, भाण्डीर-वन, भद्रवन, लौहवन, महावन आदिके दर्शन किये और गोकुलके दर्शन करके मथुरामें लौट आये। अक्रूरघाटमें रहकर प्रतिदिन वृन्दावनमें जाकर कालीय-ह्रद, द्वादशादित्य-घाट, केशीघाट, रासस्थली, चीरघाट, इमलीतला आदिके दर्शन करने लगे। कालीय ह्रदमें रात्रिमें मछली पकड़नेवाले मछुवारेको 'श्रीकृष्ण' समझकर बहुतसे लोग आकर उनको ढूँढ़ने लगे थे। किन्तु महाप्रभुके दर्शन करके उनकी बुद्धिका भ्रम दूर होनेपर सभीको उनमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई। परन्तु महाप्रभुने स्वयंको संन्यासी अर्थात् एक चित्कण जीवके रूपमें कहा। महाप्रभु अक्रूरघाटमें बहुत समय तक डूबे रहे, इसलिये बलभद्र भट्टाचार्यने उनको ब्रजमण्डलसे प्रयाग ले जानेका निश्चय किया। 'सोरो-क्षेत्रमें गङ्गास्नान करके प्रयाग जायेंगे' उन्होंने ऐसा सोचकर यात्रा की। मार्गमें एक ग्राममें कुछ पठान घुड़सवारोंको साथ लेकर आते हुए बिजली खाँने महाप्रभुको प्रेमावेशमें मूर्च्छित देखा। 'उनके साथी उन्हें धतूरा खिलाकर मारकर उनका धन ले रहे हैं, - ऐसा कहकर उसने महाप्रभुके साथियोंको बाँध दिया। प्रेमावेशके भङ्ग होनेपर महाप्रभुका बिजली-खाँके दलके एक म्लेच्छ आचार्यके साथ वार्तालाप और शास्त्र विचार होनेपर महाप्रभुने 'कुरान- शास्त्र'से ही 'श्रीकृष्णभक्ति'को स्थापित किया। बिजली-खाँ और उसके अनुगत घुड़सवार महाप्रभुके चरणोंका आश्रय करके 'श्रीकृष्णभक्त' बन गये। उस स्थानपर आज भी 'पठान-वैष्णवोंका ग्राम' नामक एक ग्राम देदीप्यमान है। सोरोंमें गङ्गास्नान करके महाप्रभु त्रिवेणीमें पहुँच गये।
- (अमृतप्रवाह भाष्य) वृन्दावनमें भ्रमण करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :- वृन्दावने स्थिरचरान्नन्दयन् स्वावलोकनैः। आत्मानञ्च तदालोकाद्गौराङ्गः परितोऽभ्रमत् ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - वृन्दावनमें अपने दर्शनके द्वारा स्थावर-जङ्गमको आनन्द प्रदान करके और उनके दर्शन करके स्वयं आनन्दित होकर श्रीगौराङ्गचन्द्र चारों ओर भ्रमण करने लगे ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- गौराङ्गः वृन्दावने स्वावलोकनैः (स्वस्य अवलोकनैः चक्षुर्भिः) स्थिरचरान् (स्थावरान् जङ्गमांश्च) तदालोकात् (स्थावरादीनाम् अवलोकं प्राप्य) आत्मानञ्च नन्दयन् परितः (इतस्ततः) अभ्रमत्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ । 129
[ 18/2-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ आरिट्-ग्राममें आकर बाह्यदशाकी प्राप्ति :— एइमत महाप्रभु नाचते नाचते। ‘आरिट्’-ग्रामे आसि’ ‘बाह्य’ हैल आचम्बिते॥३॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर नृत्य करते-करते आरिट्-ग्राममें पहुँचे। वहाँपर आकर उन्हें अचानक बाह्यज्ञान हुआ॥३॥ अनुभाष्य—‘आरिट्’-‘अरिष्ट’-ग्राम, वर्तमान समयमें ‘अरिङ्ग’के नामसे जाना जाता है॥३॥ वहाँ राधाकुण्डके विषयमें जिज्ञासा, सभी उस विषयमें अनजान :— अरिष्टे राधाकुण्ड-वार्त्ता पुछे लोक-स्थाने। केह नाहि कहे, सङ्गेर ब्राह्मण ना जाने॥४॥ श्रीराधा-भाव-कान्तिसे युक्त श्रीगौरके द्वारा लुप्त श्रीराधाकुण्डका प्रकाश :— तीर्थ ‘लुप्त’ जानि’, प्रभु सर्वज्ञ भगवान्। दुइ धान्यक्षेत्रे अल्पजले कैला स्नान॥५॥ देखि’ सब ग्राम्य-लोकेर विस्मय हैल मन। प्रेमे प्रभु करे राधाकुण्डेर स्तवन॥६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥४-६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘आरिट्ग्राम’,—जहाँ अरिष्टासुरका वध हुआ था, वहाँ आकर महाप्रभुने ‘राधाकुण्ड कहाँ है?’—यह बात सबसे पूछी; किन्तु कोई भी नहीं बता पाया और उनके सङ्गी ब्राह्मण भी इस विषयमें नहीं जानते थे। महाप्रभु यह जान गये कि वह तीर्थ ‘लुप्त’ हो गया है। तब सर्वज्ञ भगवान्ने निकटमें स्थित दो धानके खेतोंमें जो थोड़ा-थोड़ा जल था, उनमें स्नान किया। इसलिये ये धानके खेत ही राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड हैं, ऐसा सूचित हुआ। [प्रेममें डूबकर महाप्रभु तब राधाकुण्डकी स्तुति करने लगे।]॥४-६॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीराधासे अभिन्न श्रीराधाकुण्डकी महिमाका स्तव :— “सब गोपी हैते राधा कृष्णेर प्रेयसी। तैछे राधाकुण्ड-प्रिय, ‘प्रियार सरसी’॥७॥ अनुवाद—“सब गोपियोंमेंसे श्रीमती राधिका श्रीकृष्णकी परम प्रेयसी हैं। उसी प्रकार श्रीकृष्णको राधाकुण्ड अत्यधिक प्रिय है, क्योंकि वह श्रीमती राधिकाका अति प्रिय कुण्ड है॥७॥ पद्मपुराण-वाक्य :— यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा॥८॥ अनुवाद—श्रीराधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥८॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/215 संख्या देखें॥८॥ येइ कुण्डे नित्य कृष्ण राधिकार सङ्गे। जले जलकेलि करे, तीरे रास-रङ्गे॥९॥ सेइ कुण्डे येइ एकबार करे स्नान। ताँरे राधा-सम ‘प्रेम’ कृष्ण करे दान॥१०॥ कुण्डेर ‘माधुरी’—येन राधार ‘मधुरिमा’। कुण्डेर ‘महिमा’—येन राधार ‘महिमा’॥”११॥ अनुवाद—जिस कुण्डमें श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके साथ नित्य जलमें जलक्रीड़ा करते हैं और उसके तटपर आनन्दपूर्वक रास लीला करते हैं, उसी कुण्डमें जो एकबार भी स्नान करता है, श्रीकृष्ण उन्हें श्रीमती राधिकाके समान प्रेम प्रदान करते हैं। राधाकुण्डकी ‘माधुरी’ श्रीमती राधिकाकी ‘मधुरिमा’के समान है और कुण्डकी ‘महिमा’ भी श्रीमती राधिकाकी ‘महिमा’के समान है॥९-११॥ 130 |
अठारहवाँ अध्याय 18/12-19 ] श्रीराधाकुण्डकी महिमा और माधुर्य अवर्णनीय :- श्रीगोविन्दलीलामृत (7/102)में- श्रीराधेव हरेस्तदीय-सरसी प्रेष्ठाद्भुतैः स्वैर्गुणै- र्यस्यां श्रीयुत्-माधवेन्दुरनिशं प्रीत्या तया क्रीड़ति। प्रेमास्मिन् बत राधिकेव लभते यस्यां सकृत् स्नानकृत् तस्या वै महिमा तथा मधुरिमा केनास्तु वर्ण्यः क्षितौ॥ 12॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वह राधाकुण्ड-सरोवर श्रीराधाकी भाँति अपने अद्भुत गुणोंसे श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय है। उस कुण्डमें श्रीकृष्णचन्द्र सदा श्रीराधाके साथ क्रीड़ा करते हैं। उस कुण्डमें एकबार स्नान करनेपर (श्रीकृष्णमें) श्रीराधिका जैसा प्रेम प्राप्त होता है; इसलिये इस जगत्में श्रीराधाकुण्डकी महिमा और मधुरिमाका कौन वर्णन कर सकता है ? ॥ 12॥ अनुभाष्य- श्रीराधा इव तदीय-सरसी (राधाकुण्डं) स्वैः अद्भुतैः (अपूर्व्वैः) गुणैः हरेः (कृष्णस्य) प्रेष्ठा (परमप्रीतिप्रदा);-यस्यां (सरस्यां) श्रीयुतमाधवेन्दुः (श्रीकृष्णचन्द्रः) तया (राधया सह) प्रीत्या अनिशम् (अविरतं) क्रीड़ति, बत (अहो इति विस्मयार्थे) यस्यां (सरस्यां) सकृत् (बारमेकं) स्नानकृत् (अवगाहनकारी) अस्मिन् (कृष्णे) राधिका इव प्रेमा लभते तस्याः (राधा-सरस्याः) महिमा तथा मधुरिमा च क्षितौ (धरायां) केन (जनेन) वर्ण्यः (वर्णनीयः-न कोऽपि निर्णेतुं समर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ प्रेमावेशमें महाप्रभुके द्वारा स्तुति :- एइमत स्तुति करे प्रेमाविष्ट हञा। तीरे नृत्य करे कुण्डलीला स्मरिया॥ 13॥ कुण्डकी मिट्टीसे महाप्रभुके द्वारा तिलक लगाना, कुछ साथमें लेना :- कुण्डेर मृत्तिका लञा तिलक करिल। भट्टाचार्य-द्वारा मृत्तिका सङ्गे करि' लैल॥ 14॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर राधाकुण्डकी स्तुति कर रहे थे और कुण्डपर होनेवाली श्रीकृष्णकी लीलाओंका स्मरण करके उसके तटपर नृत्य कर रहे थे। महाप्रभुने कुण्डकी मिट्टीको लेकर अपने शरीरमें तिलक लगाये और बलभद्र भट्टाचार्यकी सहायतासे उन्होंने कुण्डकी कुछ मिट्टीको लिया तथा उसे अपने साथ ले गये॥ 13-14॥ कुसुम-सरोवरमें श्रीकृष्णसे अभिन्न गोवर्धनके दर्शनसे प्रेम :- तबे चलि' आइला प्रभु 'सुमनः-सरोवर'। ताँहा 'गोवर्धन' देखि' हइला विह्वल॥ 15॥ गोवर्धन देखि' प्रभु हइला दण्डवत्। 'एक शिला' आलिङ्गिया हइला उन्मत्त॥ 16॥ अनुवाद-तब राधाकुण्डसे चलकर महाप्रभु 'कुसुम- सरोवर'पर आ गये। वहाँ गोवर्धनके दर्शन करके प्रेममें विह्वल हो गये। गोवर्धनको देखकर महाप्रभुने दण्डवत् प्रणाम किया। गोवर्धनकी 'एक शिला'को आलिङ्गन करके महाप्रभु उन्मत्त हो गये॥ 15-16॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सुमनः-सरोवर'-कुसुम- सरोवर॥ 15॥ गोवर्धन-ग्राममें श्रीहरिदेव-दर्शन :- प्रेमे मत्त चलि' आइला गोवर्धन-ग्राम। 'हरिदेव' देखि' ताँहा हइला प्रणाम॥ 17॥ 'मथुरा'-पद्मेर पश्चिमदले याँर वास। 'हरिदेव' नारायण-आदि परकाश॥ 18॥ हरिदेव-आगे नाचे प्रेमे मत्त हञा। सब लोक देखिते आइल आश्चर्य शुनिया॥ 19॥ अनुवाद-प्रेममें मत्त महाप्रभु कुसुम सरोवरसे चलकर गोवर्धन ग्राममें आ गये। वहाँ महाप्रभुने श्रीहरिदेवके दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया। मथुरारूपी कमलके पश्चिम दलपर श्रीहरिदेवका वास है तथा वे । 131
[ 18/17–26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीनारायणके आदि प्रकाश हैं। महाप्रभु प्रेममें मत्त होकर श्रीहरिदेवके आगे नृत्य करने लगे। महाप्रभुके अद्भुत रूप और प्रेमके विषयमें सुनकर सब लोग उन्हें देखनेके लिये आये॥ 17-19॥ महाप्रभुके दर्शनसे सभीको विस्मय; श्रीहरिदेवके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- प्रभु-प्रेम-सौन्दर्य देखि' लोके चमत्कार। हरिदेवेर भृत्य प्रभुर करिल सत्कार ॥ 20 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके प्रेम तथा सौन्दर्यको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। श्रीहरिदेवके सेवकोंने महाप्रभुका बहुत आदर-सत्कार किया॥ 20 ॥ ब्रह्मकुण्डमें बलभद्रके द्वारा रसोई बनाना, महाप्रभुका स्नान और भोजन करना :- भट्टाचार्य 'ब्रह्मकुण्डे' पाकयात्रा कैल। ब्रह्मकुण्डे स्नान करि' प्रभु भिक्षा कैल॥ 21 ॥ अनुवाद—श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने ब्रह्मकुण्डपर रसोई बनायी। महाप्रभुने ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके बाद भोजन ग्रहण किया॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाक'—चावल, सब्जी आदि बनाना॥ 21 ॥ श्रीहरिदेव मन्दिरमें रात्रि व्यतीत करना और गोवर्धन-स्थित श्रीगोपालके दर्शनकी चिन्ता :- से-रात्रि रहिला हरिदेवेर मन्दिरे। रात्र्ये महाप्रभु करे मनेते विचारे ॥ 22 ॥ 'गोवर्धन-उपरे आमि कभु ना चड़िब। गोपाल-रायेर दरशन केमने पाइब!' ॥ 23 ॥ अनुवाद—उस रात महाप्रभु श्रीहरिदेवके मन्दिरमें ही रहे और रात्रिमें विचार करने लगे कि 'मैं गोवर्धनके ऊपर तो कभी भी नहीं चढूँगा, तब फिर मुझे गोपाल-रायके दर्शन किस प्रकार प्राप्त होंगे!'॥ 22-23 ॥ म्लेच्छके भयके छलसे श्रीगोपाल-ठाकुरके द्वारा महाप्रभुको दर्शन देना :- एत मने करि' प्रभु मौन करि' रहिला। जानिया गोपाल म्लेच्छभय-भङ्गी उठाइला ॥ 24 ॥ अनुवाद—मनमें ऐसा विचार करके महाप्रभु मौन धारण करके रहे। महाप्रभुके मनकी बातको जानकर श्रीगोपालने म्लेच्छोंके भयकी चाल चली॥ 24 ॥ ग्रन्थकार-कृत श्लोक :- अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै भक्ताभिमानिने। अवरुह्य गिरेः कृष्णो गौराय स्वमदर्शयत् ॥ 25 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गोवर्धन पर्वतपर नहीं चढूँगा'— ऐसी प्रतिज्ञासे युक्त और 'मैं कृष्णभक्त हूँ'—इस अभिमानसे युक्त श्रीगौरचन्द्रको श्रीगोपालने स्वयं गोवर्धनसे उतरकर दर्शन दिये॥ 25 ॥ अनुभाष्य— गिरेः (गोवर्धनशैलस्य) [उच्चप्रदेशात्] अवरुह्य (अवतीर्य) शैलं (गोवर्धनगिरिम्) अनारुरुक्षवे (आरोढुमनिच्छवे) भक्ताभिमानिने (भजनीयवस्तुभेदेऽपि आत्मानं सेवकतया मन्यमानाय) स्वस्मै (आत्मने) गौराय (स्वरूपविग्रहाय कृष्णस्वरूपाय) स्वम् (आत्मानम्) अदर्शयत् (प्रदर्शयामास)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 25 ॥ म्लेच्छोंके दुराचारकी बातको लोगोंमें फैलाकर श्रीगोपालके द्वारा नीचे गाँठोलि-ग्राममें उतरना :- 'अन्नकूट'-नामे ग्रामे गोपालेर स्थिति। राजपुत-लोकेर सेइ ग्रामे वसति ॥ 26 ॥ अनुवाद—श्रीगोपाल उस समय गोवर्धनमें 'अन्नकूट' नामक ग्राममें विराजमान थे तथा उस ग्राममें राजपूत लोगोंका वास था॥ 26 ॥ अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं तरङ्गमें,— “गोपगोपी भुञ्जायेन कौतुक अपार। 132 |
अठारहवाँ अध्याय 18/26-33 ] एइ हेतु 'आनियोर' नाम से इहार॥ अन्नकूट-स्थान एइ देख, श्रीनिवास। ए-स्थान-दर्शने हय पूर्ण अभिलाष॥” [अर्थात् “इस स्थानपर गोप और गोपियोंने श्रीकृष्णके साथ अनेक कौतुक भरी लीलाएँ कीं थी, इसलिये इसका नाम 'आनियोर' है। हे श्रीनिवास! इस अन्नकूटके स्थानको देखो। इस स्थानके दर्शन करनेवालेकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं।"] स्तवावलीके व्रजविलास-स्तवमें— “व्रजेन्द्रवर्य्यार्पित-भोगमुच्चैर्धृत्वा बृहत्कायमधारिरुक्तः। वरेण्यां राधां छलयन् विभुङ्क्ते यत्रान्नकूटं तदहं प्रपद्ये॥” [अर्थात् “अघारि श्रीकृष्णने सर्वोत्तमा श्रीराधाको छलनेके लिये ऊँचा और विशाल शरीर धारण करके उत्सुकतावश व्रजेन्द्र श्रीनन्द महाराजके द्वारा अर्पित अन्नकूट-भोगका जिस स्थानपर भोजन किया था, मैं उस स्थानकी शरण ग्रहण करता हूँ।"] “कुण्डेर निकट देख निविड़-कानन। एथाइ 'गोपाल' छिला हञा सङ्गोपन॥” [अर्थात् “कुण्डके निकट इस सघन वनको देखो, यहीं श्रीगोपालको छिपाकर रखा था।"]॥26॥ एकजने आसि' रात्र्ये ग्रामीके बलिल। “तोमार ग्राम मारिते तुरुक-धारी साजिल॥27॥ आजि रात्र्ये पलाह, ना रहिह एकजने। ठाकुर लञा भाग', आसिबे कालि यवन॥”28॥ अनुवाद—एक व्यक्तिने रात्रिके समय वहाँ आकर ग्रामवासियोंको कहा,—“पठान लोग तुम्हारे ग्रामके ऊपर आक्रमण करनेकी तैयारी कर रहे हैं। इसलिये आज रातको ही तुम सब यहाँसे भाग जाओ, एक भी व्यक्ति यहाँ नहीं रहे। तुम लोग गोपाल ठाकुरको लेकर भाग जाओ, यवन लोग कल यहाँ आ जायेंगे॥”27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तुरुक'—एक विशेष मुसलमान (तुर्की अथवा पठान) सेना॥27॥ अनुभाष्य—'ग्रामीके'—ग्रामवासियोंको; 'तुरुकधारी'— तुर्की-वेशधारी घुड़सवार सेना॥27॥ शुनिया ग्रामेर लोक चिन्तित हइल। प्रथमे गोपाल लञा गाँठोलि-ग्रामे थुइल॥29॥ अनुवाद—यह सुनकर ग्रामके लोग चिन्तित हो गये। उन्होंने सबसे पहले श्रीगोपालको ले जाकर गाँठोलि ग्राममें छिपा दिया॥29॥ विप्रगृहे गोपालेर निभृते सेवन। ग्राम उजाड़ हैल, पलाइल सर्वजन॥30॥ अनुवाद—एक ब्राह्मणके घरपर एकान्तमें श्रीगोपालकी सेवा होने लगी। ग्रामवासी सभी भाग गये, इसलिये अन्नकूट-ग्राम उजड़ गया॥30॥ ऐछे म्लेच्छभये गोपाल भागे बारे बारे। मन्दिर छाड़ि' कुञ्जे रहे, किंवा ग्रामान्तरे॥31॥ अनुवाद—इस प्रकार म्लेच्छोंके भयसे श्रीगोपालको बार-बार स्थानान्तर किया जा रहा था। वे मन्दिरको छोड़कर कभी कुञ्जमें रहते, तो कभी एक ग्रामसे दूसरे ग्राममें स्थान बदलते रहते॥31॥ मानसी-गङ्गामें स्नान करनेके बाद गोवर्धनकी परिक्रमा :— प्रातःकाले प्रभु 'मानसगङ्गा'य करि' स्नान। गोवर्धन-परिक्रमाय करिला प्रयाण॥32॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभु मानसी-गङ्गामें स्नान करके गोवर्धनकी परिक्रमा करनेके लिये चल पड़े॥32॥ गोवर्धनके दर्शनसे प्रेमावेश :— गोवर्धन देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हञा। नाचिते नाचिते चलिला श्लोक पड़िया॥33॥ अनुवाद—गोवर्धनको देखकर महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें आविष्ट हो गये। नाचते-नाचते चलते हुए उन्होंने एक श्लोकका उच्चारण किया॥33॥ । 133
[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगोवर्धन-स्तुति :– श्रीमद्भागवत (10/21/18)में– हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद्रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः। मानं तनोति सह-गोगणयोस्तयोर्यत् पानीय-सुयवस-कन्दर-कन्दमूलैः ॥ 34॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34॥ अमृतप्रवाह भाष्य–ये गोवर्धन पर्वत–वैष्णवप्रधान हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम-कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ– घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 34॥ अनुभाष्य–व्रजमें शरत्काल उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा वन-वनमें गोचारण करते-करते वंशी बजानेपर गोपियाँ श्रीकृष्ण-सङ्गके लिये कामातुर होकर श्रीकृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करते हुए इधर- उधर भ्रमण करते-करते सामने व्रजेन्द्रनन्दनसे अभिन्न गिरिराज गोवर्धनको देखकर गा रही हैं– हे अबलाः (सख्यः), हन्त (इति हर्षे) अयम् अद्रिः (गोवर्धनः) [ध्रुवं] हरिदासवर्यः (हरिदासानां श्रेष्ठः),–यत् (यस्मात्) रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः (रामकृष्णयोः चरणस्पर्शेन प्रमोदः, तृणाद्युद्गमनभेन रोमहर्षदर्शनात्, यस्य तादृशः सन्); यत् (यस्मात् च) पानीय-सुयवसकन्दरकन्दमूलैः (पानीयैः सुयवसैः सुकोमलैः शोभनतृणैः कन्दरैः कन्दमूलैश्च) [यथोचितम् अय] सहगोगणयोः (गोभिः गणेन सखिसमूहेन च सह वर्त्तमानयोः) तयोः (रामकृष्णयोः) मानं (समादरं) तनोति (विदधाति– अतोऽयमतिधन्यः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद–हे सखि ! अहो ये गोवर्धन निश्चय ही हरिदासोंमें श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम- कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ–घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 34॥ अमृतानुकणिका–जो लोग सांसारिक विषयोंमें आसक्त नहीं होकर भगवत्-सेवामें जीवन व्यतीत करते हैं, वे हरिदास हैं। श्रीमद्भागवतमें महाराज युधिष्ठिर, श्रीउद्धव और श्रीगिरिराज गोवर्धन–इन तीन महत् पुरुषोंको हरिदास कहा गया है। बृहद्भागवतामृत (1/5/7)में नारदजीकी युधिष्ठिर महाराजके प्रति उक्ति– “यूयं नृलोके वत भूरिभागा, येषां प्रियोऽसौ जगदीशवरेशः। देवो गुरुर्बन्धुषु मातुलेयो, दूतः सुहृत् सारथिरुक्तितन्त्रः॥” अर्थात् “इस नरलोकमें आपलोग ही सौभाग्यशाली हैं। क्योंकि ब्रह्मा, रुद्र आदि ईश्वरोंके भी जो ईश्वर हैं, वे श्रीदेवकीनन्दन आप लोगोंके प्रिय हैं। श्रीदेवकीनन्दन आप लोगोंके केवल प्रिय ही नहीं हैं, अपितु इष्टदेव, गुरु और बान्धव, मातृसम्बन्धसे सम्बन्धित कुटुम्बी, दूत, सुहृद् और कभी सारथी भी हैं।” अतः श्रीमद्भागवतमें उन्हें जो हरिदासकी पदवी मिली है, वह सर्वथा उपयुक्त है। उद्धवजी श्रीकृष्णके कैसे प्रिय हैं, इसे श्रीमद्भागवतमें कहा गया है। (भाः 10/46/1)– वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा। शिष्यो बृहस्पतेः साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तमः॥ अर्थात् “परीक्षित ! उद्धवजी वृष्णिवंशियोंमें प्रधान व्यक्ति थे। वे साक्षात् बृहस्पतिके शिष्य और परम बुद्धिमान् थे। उनकी महिमाके सम्बन्धमें और कौनसी बात कही जा सकती है कि वे भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा और मन्त्री थे।” (भाः 11/14/15)में श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुखसे कहते हैं– “न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥” अर्थात् “उद्धव ! तुम मेरे अत्यन्त प्रियपात्र हो। तुम मुझे जितने प्रिय हो, मेरा पुत्र आत्मयोनि ब्रह्मा, शङ्कर, सगे भाई बलरामजी, अद्धाङ्गिनी लक्ष्मी, और तो 134 |
अठारहवाँ अध्याय 18/34 ] क्या मेरी आत्मा भी उतनी प्रिय नहीं है।" अतः श्रीमद्भागवतमें उद्धवजीको जो हरिदासकी पदवी मिली है, वह सर्वथा उचित ही है। प्रेमपर भक्त युधिष्ठिर महाराजका प्रेम श्रीकृष्णकी भगवत्ताका ज्ञान रहनेके कारण कुछ शिथिल रहता है। इसलिये प्रेमातुर भक्त उद्धवजी इनसे श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णने इन्हें गोपियोंसे प्रेमकी शिक्षा लेनेके लिये व्रजमें भेजा। वहाँ श्रीराधाके मादनाख्या महाभावके दर्शन करके उद्धवजी चमत्कृत हो गये और गोपियोंकी चरणधूलि प्राप्तिकी अभिलाषासे व्रजमें तृण, गुल्म, औषधि आदिके रूपमें जन्म ग्रहण करनेकी लालसा प्रकट की। इस अभिलाषाकी पूर्तिके लिये उन्होंने व्रजस्थित गिरिराज गोवर्धनका ही आश्रय लेना उचित समझा। अतः गोवर्धनके अङ्गमें स्थित कुसुम सरोवरके निकट तृणादिका जन्म ग्रहण किया। भविष्य-पुराणके अनुसार रसिकवर गोवर्धन श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति श्रीराधिकाजीके हृदयसे प्रकट हुए हैं। गोवर्धन तन, मन, धन, प्राणादि सर्वस्व न्योछावर करके श्रीकृष्ण और उनके सहगामियोंकी सब प्रकारसे मनोऽभीष्ट सेवा करते हैं, इसलिये गोपियाँ उन्हें हरिदासवर्य कह रही हैं। जिस दासकी सेवासे श्रीहरि आनन्दित होते हैं और जो दास श्रीहरिकी सेवाकर परमानन्दित होते हैं, वे दास ही श्रीहरिके दासोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। जो दास श्रीहरिकी सेवामें कुछ परिश्रम या क्लेश अनुभव करते हैं अथवा जिस दासकी सेवाको भगवान् अनिच्छापूर्वक ग्रहण करते हैं, उस दासको श्रेष्ठ नहीं कहा जाता। अधिकांश बद्धजीव मायादास हैं। मायादास अर्थात् यह शरीर और धन, जन, पुत्र-परिवार-जितनी आसक्तिकी वस्तुएँ हैं, उनके प्रति चित्तका लगना ही माया-दासत्व है। संसारमें बद्ध होनेतक कुछ-न-कुछ रूपमें यह अवश्य ही रहेगा। यदि जीव साधु अथवा गुरु और कृष्णकी कृपा पाता है- 'गुरु कृष्ण प्रसादे पाये भक्तिलताबीज'-तब उसका कुछ उत्थान होता है और गुरुकी कृपासे गुरुदास हो जाता है। हरिदास बननेके लिये पहला चरण है-गुरुदास होना। गुरुदास तो एक ही है, किन्तु भक्तिकी भावनाके या विषयोंके तारतम्यसे उसके विविध नाम दिये गये हैं। प्रथम है शिष्यब्रुव, उसके बाद तामसिक गुरुदास, राजसिक गुरुदास, सात्त्विक गुरुदास, निर्गुण गुरुदास। निर्गुणमें भी कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम दासका भेद है। इन सबमें-से निर्गुण दास सबसे उत्तम है। इससे भी ऊपर स्तर होनेपर वह कृष्णदास होगा। उपरोक्त प्रकारके गुरुदासोंके विभिन्न लक्षणों और गुणोंका उदाहरण सहित संक्षेपमें वर्णन इस प्रकार है- (1) 'शिष्यब्रुव'-शिष्यब्रुव उसको कहते हैं जिसका गुरुसे यथार्थ कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु किसीको मारनेके लिये, किसीसे स्पर्धा करनेके लिये, किसीसे ईर्ष्या करनेके लिये, तामसिक भावनाओंको लेकर वह कपटतापूर्वक गुरु-पदाश्रय करता है। वह गुरुकी सेवा न कर अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये गुरुका सङ्ग करता है। इसका एक उदाहरण एकलव्य है। द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवोंको शिक्षा देते थे। इस प्रकार उनके एक सौ पाँच शिष्य थे और वे समान रूपमें इनको सिखलाते थे, किन्तु फिर भी अर्जुनके प्रति उनकी प्रीति अधिक थी। एकलव्य जो बहेलिया सरदारका पुत्र था, उससे अर्जुनकी प्रतिष्ठा सहन नहीं हुई। वह नास्तिक और विद्वेषी स्वभावका था। शास्त्रोंमें कहा गया है कि गुरुको उत्तम कुलके सदाचारी व्यक्तिको शिष्यरूपमें ग्रहण करना चाहिये। निम्न कुलका व्यक्ति जिसका चरित्र और आचरण ठीक नहीं है, अथवा जिसके कुलका पता नहीं है या माता-पिताका पता नहीं है-ऐसे लोगोंको दीक्षा नहीं देनी चाहिये। एकलव्य द्रोणाचार्यके पास आया और कहा,-'गुरुदेव, मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप कृपा मुझे भी शिक्षा प्रदान करें।' द्रोणाचार्यने पूछा, - 'कहाँ रहते हो? किसके पुत्र हो? किसलिये यह धनुष-विद्या लेना चाहते हो?' एकलव्यने कोई उत्तर नहीं दिया। द्रोणाचार्यके अनेक बार पूछनेपर भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया। एकलव्यकी दुर्योधनसे मित्रता थी। उसका हृदय भीतरसे । 135
[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
बड़ा कलुषित था और वह अर्जुनको नीचा दिखलाना चाहता था। गुरु तो सर्वज्ञ हैं। द्रोणाचार्य जान गये कि यह शिक्षा लेकर ईर्ष्यावश जगत्को ध्वंस करेगा, इसलिये उन्होंने एकलव्यसे कहा, — 'मेरे आश्रममें तुम्हारे लिये स्थान नहीं है, मैं तो केवल राजकुमारोंको शिक्षा देता हूँ जिनका शील, आचार-विचार ठीक है। मैं दूसरोंको ग्रहण नहीं करता।' एकलव्य बड़ा दुखी होकर वहाँसे चला गया। वनमें जाकरके उसने द्रोणाचार्यकी मूर्ति बनायी और मूर्तिसे धनुर्विद्या सीखने लग गया। बहुत दिनोंके बाद द्रोणाचार्य अपने शिष्योंकी परीक्षा लेनेके लिये उनको लेकर वनमें गये। जब वे वनमें पहुँचे तो इनको देखकर एक कुत्ता जोरसे भौंकने लगा। जैसे ही द्रोणाचार्य शिष्योंके साथ थोड़ा आगे गये तो कुत्तेका भौंकना एकदम बन्द हो गया। द्रोणाचार्यने मुड़कर देखा कि कुत्तेका भौंकना बन्द कैसे हो गया? उन्होंने देखा कि कुत्तेका मुख बाणोंसे भरा पड़ा है किन्तु कहीं भी वह क्षत-विक्षत नहीं है। वे बड़े आश्चर्यचकित हो गये कि ऐसी कुशलतासे किसने बाण चलाये? कुत्तेके मुखकी दिशासे उन्होंने बाणोंके आनेकी दिशाको निर्धारित कर लिया। वे उस दिशामें थोड़ी दूर गये तो उन्होंने देखा कि एक काले रङ्गका बड़ा बलिष्ठ युवक हाथोंमें धनुष-बाण लेकर खड़ा है। द्रोणाचार्यको देखते ही उसने उनको प्रणाम किया। द्रोणाचार्य ने पूछा, — 'तुम कौन हो?' उसने कहा, — 'मैं एकलव्य हूँ।' उससे पूछा, — 'यह बाण क्या तुमने चलाये?' उसने उत्तर दिया, — 'हाँ, मैंने चलाये।' फिर उससे पूछा, — 'तुमने किससे यह धनुर्विद्या सीखी? तुम्हारे गुरु कौन हैं?' उसने द्रोणाचार्यको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा, — 'आप ही मेरे गुरु हैं।' वे बोले, — 'मैंने तो तुम्हें कभी शिक्षा नहीं दी।' तो उसने अपने द्वारा बनायी द्रोणाचार्यकी मूर्तिको दिखलाया और कहा, — 'मैंने इनसे शिक्षा ली है।' द्रोणाचार्यने कहा, — 'इस प्रकार तुम मेरे शिष्य हो गये, परन्तु तुमने गुरु-दक्षिणा तो दी नहीं, इसलिये दक्षिणा दो।' एकलव्यने कहा, — 'आप जो माँगेंगे, मैं वह दे दूँगा। यह समस्त शरीर आपके लिये अर्पित है।' द्रोणाचार्यने कहा, — 'अपना दाहिना अँगूठा काट करके मुझे दे दो।' उसने एक क्षणकी देरी नहीं की और अपना अगूँठा काटकर दे दिया। वह रक्तसे लहूलुहान हो गया। द्रोणाचार्यने उसके कार्यको देखकर उसकी प्रशंसा नहीं की, अपितु उनके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया। वे उसे शिक्षा नहीं देना चाहते थे, परन्तु उसने सब कुछ सीख लिया। वे सोचने लगे कि यह अच्छा नहीं हुआ, जगत्का मङ्गल नहीं होगा। बादमें महाभारतके अन्तिम समयमें एकलव्यने श्रीकृष्णसे युद्ध किया और उनको और पाण्डवोंको मारना चाहा, तो श्रीकृष्णने सुदर्शन चक्रसे उसका वध कर दिया। गुरुकी आज्ञाका पालन करना ही तो शिष्यका कर्त्तव्य है। द्रोणाचार्यने जगत्के मङ्गलका विचार करते हुए उसे शिक्षा देनेसे मना कर दिया था, परन्तु उसने गुरुकी बातका उल्लङ्घन करके छलसे शिक्षा ली। इसलिये श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद कहते हैं, — 'जो जड़ कर्मी हैं, वे तो एकलव्यको आदर्श गुरु सेवकके रूपमें मानेंगे। क्योंकि वे जड़ कर्मी हैं, उनकी बुद्धि ध्वंस हो गयी है, उनमें कोई विचारशक्ति नहीं है, वे स्थूलदर्शी हैं, इसलिये वे इस सिद्धान्तके भीतर प्रवेश नहीं पाते। इस घटनामें परमार्थ नामकी कोई वस्तु नहीं है।' (2) 'तामसिक गुरुदास'—दूसरेको नीचा दिखलाने अथवा हिंसादिके लिये छलसे जो गुरुका आश्रय करते हैं, वे तामसिक गुरुदास होते हैं। इसका एक उदाहरण कर्ण है। अर्जुनकी प्रतिभा देखकर कर्णको उससे ईर्ष्या हो गयी। एक दिन जब रङ्गशालामें अर्जुनने सर्वश्रेष्ठ धनुर्विद्याका प्रदर्शन किया तो कर्णने भी वहाँ आकर बाण चलाने, मत्स्यभेद आदिमें अर्जुनके समान दक्षता दिखलायी। सब लोग उसकी प्रशंसा करने लगे और दुर्योधनने तो तुरन्त उठकर उसे गले लगा लिया। भीष्म पितामहने कहा, — 'तुम यहाँ अर्जुनकी समता करनेके
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अठारहवाँ अध्याय 18/34 ] लिये आये हो, पहले बतलाओ तुम कौन हो ? ये राजकुमार हैं, ये तो पाण्डु पुत्र हैं और ये धृतराष्ट्र पुत्र हैं। तुम किसके पुत्र हो, तुम्हारे पिता-माताका नाम क्या है?' उसने कहा,-'मेरी माताका नाम राधे है।' तो भीष्म पितामहने कहा,-'तुम क्या सूतपुत्र हो? सूतपुत्रको इन राजकुमारोंसे समता करनेका कोई अधिकार नहीं है, इसलिये तुम यहाँसे चले जाओ।' उसी समय दुर्योधन एकदम उठकर खड़ा हुआ और अपना राजमुकुट देकर कहा,-'यह अङ्गदेशका राजा और हमारा परम मित्र है। इसका सम्मान हो।' लेकिन भीष्म पितामहके सामने उसकी एक नहीं चली। लज्जित होकर कर्ण वहाँसे चला गया। अब उसने अर्जुनको हरानेकी ठान ली और इसलिये वह शस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये परशुरामजीके पास गया। परशुरामजीने उसका परिचय पूछा कि वह किसका पुत्र है, किस जातिका है? तो उसने क्षत्रियका पुत्र न कहकर स्वयंको ब्राह्मणका पुत्र बतलाया। ऋषि- महर्षि लोग बड़े सरल सीधे होते हैं। उन्होंने उसकी बात मान ली कि यह झूठ क्यों कहेगा ? और यह शस्त्र-शिक्षाके लिये एवं परमार्थके लिये आया है, इसलिये इसको अपना शिष्य स्वीकार करना चाहिये। तब उन्होंने उसको ब्रह्मास्त्रसे लेकर सब प्रकारके जितने शस्त्र हैं, सबकी शिक्षा दे दी। अब दीक्षा समारोहसे एक-दो पहले ही ऋषि उसके गोदीमें सर रखकर सो गये। तब वर्षाकाल था, एक लाल कीड़ा न जाने कैसे ऊपर चढ़ा और कर्णकी जङ्घाको छेदता हुआ नीचे निकल गया। रक्तकी धारा बहने लगी, परन्तु कर्ण थोड़ासा भी नहीं हिला। जब रक्त ऋषिके सिरमें लगा तो उन्हें कुछ गरम अनुभव हुआ और देखा कि रक्त बह रहा है। उठकर उन्होंने देखा कि यह रक्त तो कर्णकी जङ्घासे बह रहा है। परशुरामजीने कर्णसे उसका कारण पूछा तो उसने बताया कि एक कीड़ेने उसकी जङ्घाको छेद दिया था। परशुरामजी बोले कि इतनी पीड़ा सहन करके भी तुम हिले क्यों नहीं ? कर्णने कहा कि गुरुजी मैं हिलता तो आपकी निद्रामें बाधा आती। तब परशुरामजली क्रोधित होकर बोले,-'तुम किसी प्रकारसे ब्राह्मण नहीं हो सकते, क्योंकि ब्राह्मणमें इतनी सहनशीलता नहीं होती। तुम अवश्य ही क्षत्रिय हो। सत्य बताओ, नहीं तो तुम्हें श्राप दे दूँगा। तुम किसके पुत्र हो?' उसने कहा,-'मैं सूतपुत्र हूँ।' परशुरामजीने कहा,-'यह सत्य पहले क्यों नहीं बताया ? किसलिये यह शस्त्रकी शिक्षा ली है ? अब सब सत्य बतलाओ।' तो कर्णने कहा,-'मैंने अर्जुनको परास्त करनेके लिये यह शिक्षा ली है।' परशुरामजीने कहा,- 'तुमने यह बात पहले नहीं बतायी, तुमने गुरुसे झूठ बोला, इसलिये तुम मेरे शिष्य नहीं हो। जब तुम्हारे प्राण सङ्कटमें होंगे, तब तुम मेरी दी हुई समस्त विद्याको भूल जाओगे और वह तुम्हारे किसी काम नहीं आयेगी। जब तक ऐसा सङ्कट नहीं आयेगा, तब तक यह तुम्हारे काम आयेगी।' कर्णके भावको तामसिक भाव कहते हैं, इसलिये उसे तामसिक गुरुदास कहेंगे। (3) 'राजसिक गुरुदास'-सुख-ऐश्वर्य भोग, पत्नी आदिके लिये जो गुरु सेवा होती है वह राजसिक होती है। राजसिक गुरुदासका उदाहरण देवव्रत (भीष्म) हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मैं विवाह नहीं करूँगा, आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा और राजपद भी ग्रहण नहीं करूँगा। वे अपने भाइयोंके विवाहके लिये काशीनरेशकी कन्याओं अम्बा, अम्बालिका और अम्बिकाको युद्धमें जीतकर हरण करके ले आये। अम्बालिका और अम्बिका, इन दोनोंका तो विवाह हो गया, किन्तु अम्बाने कहा कि मैं किसी राजकुमारसे प्रेम करती हूँ, इसलिये मैं आपके भाईसे विवाह नहीं कर सकती। परन्तु आप मुझे हरण करके ले आये हैं, तो मेरे प्रियतम राजकुमार मुझे स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिये आपको ही मुझसे विवाह करना होगा। भीष्मने कहा कि मैं तो प्रतिज्ञाबद्ध हूँ, इसलिये विवाह नहीं कर सकता। अम्बाने सबसे प्रार्थना की, किन्तु कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सका, क्योंकि भीष्म तो महाप्रचण्ड और बलवान थे। तब । 137
[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अम्बा उनके गुरु परशुरामके पास गयी और जोर-जोरसे रोने लगी। परशुरामजीने पूछा, — 'बेटी, तुम क्यों रो रही हो, क्या बात है?' अम्बाने सारी बात उन्हें बतायी और कहा, — 'जब ये देवव्रत मुझे जीत करके लाये हैं, तो उनसे ही विवाह करूँगी। इसलिये कृपा करके आप उन्हें ऐसा आदेश दे दीजिये।' परशुरामजीको दया आ गयी और उन्होंने देवव्रतको बुलवाया और कहा कि जब इसे जीतकर लाये हो, तब तुम इससे विवाह क्यों नहीं करते हो? देवव्रतने कहा कि अपने भाइयोंके लिये इन्हें स्वयंवरमें जीतकर हरण करके लाया। परशुरामजीने कहा, — 'जब तुम जीतकर लाये हो, तब तुम्हें इससे विवाह करना पड़ेगा।' देवव्रतने कहा, — 'आप ऐसा आदेश मत दें। मैंने पिताजीको वचन दिया है कि मैं जीवन भर विवाह नहीं करूँगा और राज्य नहीं लूँगा।' परशुरामजीने कहा, — 'क्या तुम्हें स्वयंवरमें जाकर इन कन्याओंको बलपूर्वक पकड़कर अपहरण करते समय अपना वचन स्मरण नहीं था? अब इसका भागी कौन होगा? अब इससे विवाह करो, अन्यथा मुझसे युद्ध करो।' देवव्रत यह सुनकर प्रसन्न हो गये कि एक मार्ग तो खुल गया, इसलिये उन्होंने कहा, — 'मैं युद्ध करूँगा तो युद्धमें आपके द्वारा मारा जाऊँगा, किन्तु विवाह नहीं करूँगा।' उन दोनोंमें युद्ध हुआ, दोनों ही महावीर थे, इसलिये अन्तमें दोनोंमें-से कोई भी नहीं जीत सका। तब ब्रह्माजीने आकर उनका समाधान करा दिया। देवव्रतने विवाह तो नहीं किया, परन्तु उनके द्वारा गुरुका अपमान तो हुआ। इसमें कोई पारमार्थिक कारण नहीं था। इसलिये ऐसे शिष्योंको, भीष्म जैसे लोगोंको यहाँपर राजसिक कहा गया है। (4) 'सात्त्विक गुरुदास'—ऐसा शिष्य जो गुरुकी आज्ञाका अक्षरशः पालन करे और निज हितके विषयमें विचार न करे, ऐसी गुरुसेवा सात्त्विक होती है। इस सन्दर्भमें आरुणी और उपमन्युकी कथाका वर्णन आता है। आरुणी गुरुपत्नीके आदेश पालन करनेके लिये वर्षाकालमें कड़कड़ाती ठण्डमें मेड़ बाँधनेके लिये चले गये। मूसलाधार वर्षाके कारण जलकी प्रबल धाराके वेगसे मिट्टी बह जाती थी। अन्तमें कोई अन्य उपाय न देखकर वे स्वयं मेड़के ऊपर लेट गये और इससे जलका प्रवाह बहुत कम हो गया। किन्तु भोर होते-होते आरुणी ठण्डसे ठिठुरकर निर्जीव प्रायः हो गये। गुरु लालटेन लेकर उन्हें खोजते हुए पुकारने लगे, — "आरुणी, तुम कहाँ हो?" तो आरुणीने मेढ़पर लेटे हुए अति क्षीण स्वरमें उत्तर दिया, — "गुरुजी मैं यहाँ हूँ, खेतमें जल भर जाता था, इसलिये मैं यहाँपर लेट गया।" गुरुने उन्हें हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद दिया कि समस्त वेद-वेदान्तादि जो कुछ भी हैं, तुम्हें स्फुरित हो जाँय। गुरुके आशीर्वादसे आरुणी तत्क्षणात् मन्त्रदृष्टा ऋषि बन गये। उपमन्यु गुरु आश्रममें रहकर गुरुसेवा करते थे और उनकी आज्ञासे गायोंको चराने ले जाते थे। गुरुदेवने उनसे पूछा, — "तुम बहुत मोटे हो रहे हो, क्या खाते हो?" उपमन्युने कहा, — "बछड़ोंके दूध पी लेनेके बाद जो गायका दूध बच जाता है, मैं उसे पी लेता हूँ।" गुरुदेवने कहा, — "अरे! बछड़ोंके पीनेकी वस्तु तुम पी लेते हो? आगेसे ऐसा मत करना।" कुछ दिनोंके बाद गुरुदेवने पुनः कहा, — "तुम अब भी मोटे हो रहे हो, क्या खाते हो?" उपमन्युने उत्तर दिया, — "गायोंके मुँहसे जो फेन निकलता है, उसको पोंछकर खा लेता हूँ।" गुरुदेवने उसके लिये भी उसे निषेध किया। अगले दिन गुरु-आज्ञाका पालन करते हुए उपमन्युने वह भी नहीं खाया। किन्तु उन्हें जब बहुत भूख लगी, तो उन्होंने एकमन्दका पत्ता खा लिया, उसका कुछ रस आँखमें लग जानेके कारण वे अन्धे हो गये और गायोंको ढूँढ़ते हुए कुएँमें गिर पड़े। शामको गायें तो आश्रममें लौट आयीं, किन्तु उपमन्यु नहीं लौटे। गुरुजी उन्हें खोजने निकले और उनका नाम लेकर जोरसे पुकारने लगे। उपमन्युने कहा कि गुरुजी मैं कुँएमें गिरा हुआ हूँ। गुरुजीने रस्सी डालकर उन्हें जैसे-तैसे कुएँसे 138 ।
अठारहवाँ अध्याय 18/34 ] बाहर निकाला। गुरुजीने पूछा कि तुम कुएँमें कैसे गिर गये? तब उन्होंने सारी घटना कह सुनायी। प्रसन्न होकर गुरुजीने आशीर्वाद दिया कि वेद-उपनिषद् आदि सब तुमको स्मरण हो जाँय। गुरुजीके आशीर्वादसे उनको वेदादि सबका ज्ञान तत्क्षणात् हो गया और उनकी नेत्रज्योति भी पुनः आ गयी। वेद अधिकांश त्रिगुणात्मक होते हैं अर्थात् सांसारिक कामनाओं आदिकी पूर्त्ति करनेवाले होते हैं, इसलिये इन दोनोंको सात्त्विक गुरुदास कहा गया है। (5) निर्गुण गुरुदास-त्रिगुणोंसे अतीत गुरुदास निर्गुण गुरुदास हैं। श्रीमद्भागवतमें इसका वर्णन आता है। एक बार गुरु-आश्रममें सुदामा और श्रीकृष्ण गुरुपत्नीके आदेशपर वनमें लकड़ी बीनने गये। बिना ऋतुके ही बड़ा भयङ्कर आँधी-पानी आ गया और चारों ओर पानी-ही-पानी हो गया। तब तक सूर्यास्त हो गया था और घना अन्धकार फैल गया। इसलिये वे वापस आश्रम नहीं लौट सके। प्रातःकालमें सान्दीपनि मुनि उन्हें खोजते हुये वनमें आये। उन्होंने देखा कि ये दोनों सिरपर गट्ठर रखकर खड़े हैं, तो सान्दीपनि मुनि बोले,–“अरे बोझा तो नीचे उतारकर रख देते।” इन्होंने कहा,–“गुरुजी लकड़ी भीग जाती तो फिर रसोई कैसे बनती?” तब गुरुजी बोले,–“सिरपर रखनेसे भी तो लकड़ी भीग गयी है।” इन्होंने कहा,–“यदि नीचे रख देते तो पानीसे लबालब भीगकर नष्ट हो जाती, इसलिये रात्रि भर सिरपर लकड़ी ले कर खड़े रहे हैं।” प्रसन्न होकर गुरुजीने वर दिया,–“तुम्हें चौंसठ-कलाओंका सम्पूर्ण ज्ञान हो जाय।” यह परमार्थिक सेवा है, इसमें स्वयंके लाभ-हानिका विचार नहीं है। एकमात्र गुरुकी सेवाकी भावनासे किया गया, इसलिये ये निर्गुण गुरुदास हैं। इनसे भी श्रेष्ठ गुरुदास महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द हैं। महाप्रभुकी इच्छाके अनुसार वे श्रीहरिदास ठाकुरको रोज प्रसाद देने जाते, क्योंकि वे दीनताके कारण आते नहीं थे। महाप्रभु जिस-जिसको प्रेम करते थे, उन्हींसे श्रीगोविन्दका सम्बन्ध था। महाप्रभुका जिनसे सम्बन्ध नहीं था, उनसे उनका भी सम्बन्ध नहीं था। शिष्यको भी ऐसा होना चाहिये। गुरुका जो प्रिय है, वह शिष्यको भी प्रिय होना चाहिये। एक दिन महाप्रभु गम्भीराके द्वारपर शयन करने लगे, श्रीगोविन्द उनका पाद-सम्वाहन करनेके लिये आये। श्रीगोविन्दका यह प्रतिदिनका नियम था कि महाप्रभुके पाद-सम्वाहनके बाद ही जाकर महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादका भोजन करते थे। उस दिन महाप्रभु द्वारपर ऐसे लेटे थे कि श्रीगोविन्द भीतर नहीं जा पा रहे थे। उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन किया कि मुझे भीतर जाने दीजिये। महाप्रभु ने कहा,–“मुझमें अपने शरीरको हिलाने-डुलानेकी भी शक्ति नहीं है।” श्रीगोविन्दके अनेक बार अनुरोध करनेपर भी महाप्रभुने पुनः पुनः वही उत्तर दिया। तब श्रीगोविन्दने अपने बहिर्वासको महाप्रभुके ऊपर डाल दिया और उनके पाद-सम्वाहनके लिये उन्हें लाँघकर गम्भीराके भीतर चले गये। श्रीगोविन्दकी कोमल मालिशसे महाप्रभुका सारा परिश्रम दूर हो गया और उनको बहुत अच्छी नींद आ गयी। श्रीगोविन्द तब भी धीरे-धीरे उनके अङ्गोंकी सेवा करते रहे। एक-दो घण्टेके बाद जब महाप्रभुकी निद्रा-भङ्ग हुई, तो उन्होंने श्रीगोविन्दको अभी तक भी वहीं बैठे देखकर क्रोधित होकर कहा–“तुम अब तक भी यहाँ क्यों बैठे हुए हो? तुम प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये?” श्रीगोविन्दने कहा कि आप तो दहलीजपर ही सो गये, जानेके लिये मार्ग ही नहीं है। महाप्रभुने कहा तुम जिस प्रकार भीतर आये, उसी प्रकारसे प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये? श्रीगोविन्दने कोई उत्तर नहीं दिया, परन्तु मन-ही-मन कहा,–‘मेरा तो सेवा करनेका ही नियम है, भले ही उसमें मेरा अपराध हो अथवा फिर नरकमें जाना पड़े। मैं प्रभुकी सेवाके लिये करोड़ों-करोड़ों अपराधोंकी भी परवाह नहीं करता, किन्तु अपने भोगोंके लिये अपराधके आभासमात्रसे भी भय करता हूँ।’ । 139
[ 18/34-35 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभु भक्तोंके गुणोंको प्रकाशित करनेमें बहुत आनन्दित होते थे। उन्होंने अपने सेवक श्रीगोविन्दकी महिमाको प्रकाशित करनेके लिये ही ऐसी लीला की। शिष्यको अपने सुखका विचार, अपना सर्वस्व त्यागकर अपने आराध्य जो गुरु हैं, उनकी सेवाके लिये सब कुछ बलिदान देना पड़ता है। श्रीगोविन्दका ऐसा गुण था जिसकी प्रशंसा करना भी कठिन है। उन्हें श्रीराय रामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरका रात्रिमें महाप्रभुके पास आना अच्छा नहीं लगता था। वे मन-ही-मनमें सोचते थे कि इनके आनेसे पहले महाप्रभु तो कुछ ठीक रहते हैं, परन्तु जब ये दोनों आ जाते हैं, तो ये भी रातभर रोते हैं और महाप्रभुको भी रुलाते हैं। ये न तो स्वयं सोते हैं और न ही महाप्रभुको सोने देते हैं। परन्तु श्रीगोविन्द कुछ कह तो सकते नहीं, केवल चुपचाप बेचारे टुकुर-टुकुर देखते थे कि कब ये दोनों चले जाँय। श्रीगोविन्द सब कुछ सुनते थे और उनका रोदन देख करके इनका हृदय भी रोता रहता था। यह कितनी बड़ी सेवा है, इसे हम जब तक उस धरातलपर नहीं पहुँचेंगे, तब तक इस सेवाको नहीं समझ सकते। श्रीगोविन्द महाप्रभुके दुःखमें दुःखी और उनके सुखमें सुखी होते थे। वे ही उनके सर्वस्व जीवनके आधार हैं। ऐसे लोग ही वास्तविक हरिदास होते हैं।—"श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज"॥ 34 ॥
गोविन्दकुण्डमें स्नान और श्रीगोपालकी अवस्थितिके संवादकी प्राप्ति :— गोविन्दकुण्डादि-तीर्थे प्रभु कैला स्नाने। ताँहा शुनिला, गोपाल-गाँठोलि-ग्रामे॥ 35 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दकुण्ड-तीर्थमें स्नान किया और उन्होंने वहींपर सुना कि श्रीगोपाल गाँठोलि-ग्राममें हैं॥ 35 ॥
अनुभाष्य—'गोविन्दकुण्ड'—पैठा-ग्रामसे श्रीगोवर्धन- पर्वतके ऊपर 'आनियोर'-ग्राम है। यहाँ श्रीगोविन्द और श्रीबलदेवके दो मन्दिर और 'गोविन्दकुण्ड' नामका सरोवर है; किसीके मतानुसार रानी पद्मावतीने इस सरोवरकी प्रतिष्ठा (स्थापना) की थी। भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें— “एइ श्रीगोविन्दकुण्ड-महिमा अनेक। एथा इन्द्र कैल गोविन्देर अभिषेक॥” [अर्थात् "इस गोविन्दकुण्डकी बहुत महिमा है। यहाँ इन्द्रने श्रीगोविन्दका अभिषेक किया था।"] स्तवावलीके व्रजविलासस्तवमें— “नीचैः प्रौढ़भयात् स्वयं सुरपति पादौ विधुत्येह यैः, स्वर्गाङ्गासलिलैश्चकार सुरभिद्वाराभिषेकोत्सवम्। गोविन्दस्य नवं गवामधिगता राज्ये स्फुटं कौतुकात् तैर्यत् प्रादुरभूत् सदा स्फुरतु तद्गोविन्दकुण्डं दृशोः॥” [अर्थात् “श्रीकृष्णके प्रति अपराधके कारण इन्द्र बहुत भयभीत हो गये। स्वयं दीनभावसे गौओंके अधिपत्य राज्यमें अर्थात् व्रजमें आकर श्रीगोविन्दके श्रीचरणयुगलको धारण करके सुरभिके द्वारा जिस स्वर्ग-गङ्गा (मन्दाकिनी) के जलसे कौतुक भरा अभिषेक उत्सव किया था, उस जलसे प्रकाशित वह गोविन्दकुण्ड सदा मेरे नयनगोचर हो।"] मथुरा-खण्डमें— “यत्राभिषिक्तो भगवान् मघोना यदुवैरिणा। गोविन्दकुण्डं तज्जातं स्नानमात्रेण मोक्षदम्॥” [अर्थात् “जिस स्थानपर यदुओंके वैरी इन्द्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक हुआ था, उस अभिषेक- जलसे बने गोविन्दकुण्ड स्नान करनेमात्रसे ही मोक्ष प्रदान करते हैं।"] 'गाँठोली ग्राम'—गोपालपुर अथवा बिलछुरका अति निकटवर्ती ग्राम है। जनश्रुति यह है कि यहाँपर व्रज-नवयुव-युगलका (श्रीराधा-कृष्णका) प्रणयग्रन्थि बन्धन हुआ था। भक्तिरत्नाकरकी (पाँचवीं तरङ्गमें)— “सखी दुँह वस्त्रे गाँठि दिल सङ्गोपने। फागुया लैया केह गाँठि खुलि' दिला।" [ अर्थात् “श्रीराधा-कृष्ण होली खेलकर सिंहासनपर
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अठारहवाँ अध्याय 18/35-43 ] बैठे थे और किसी सखीने गुप्त रूपसे उनके वस्त्रोंको गाँठ लगाकर बाँध दिया। श्रीराधा-कृष्ण जब सिंहासनसे उठे, तब उन्होंने वस्त्रोंका गठबन्धन देखा और उसे देखकर सखियाँ हँसने लगीं। श्रीराधा-कृष्ण, दोनों लज्जित हो गये। तब किसी सखीने 'फाग' लेकर उनके वस्त्रोंकी गाँठको खोल दिया।"]—इसी कारण इस ग्रामका नाम—गाँठोली है॥35॥ गाँठोलि-ग्राममें श्रीगोपालका दर्शन और स्तुति-नृत्य :— सेइ ग्रामे गिया कैल गोपाल-दरशन। प्रेमावेशे प्रभु करे कीर्त्तन-नर्त्तन॥36॥ गोपालेर सौन्दर्य देखि' प्रभुर आवेश। एइ श्लोक पड़ि' नाचे, हैल दिन-शेष॥37॥ अनुवाद—गाँठोली-ग्राममें जाकर महाप्रभुने श्रीगोपालके दर्शन किये। प्रेमके आवेशमें आकर वे कीर्त्तन और नृत्य करने लगे। श्रीगोपालके सौन्दर्यको देखते ही महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और उन्होंने एक श्लोक पढ़ा। फिर वे दिन समाप्त होने तक नृत्य-कीर्त्तन करते रहे॥36-37॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/62) :— वामस्तामरसाक्षस्य भुजदण्डः स पातु वः। क्रीड़ाकन्दुकतां येन नीतो गोवर्धनो गिरिः॥38॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥38॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलनयन श्रीकृष्णने जिस बाँयी भुजाके द्वारा गिरिराज गोवर्धनको उठाकर क्रीड़ा-कन्दुककी (खेलनेवाली गेंदकी) भाँति उसका व्यवहार किया था, वही बाँयी भुजा ही तुम्हारा पालन करे॥38॥ अनुभाष्य— येन (वामबाहुना) गोवर्धनः गिरिः क्रीड़ाकन्दुकतां (क्रीड़ा-सामग्रीत्वं) नीतः (प्राप्तः) तामरसाक्षस्य (पद्मलोचनस्य कृष्णस्य) सः [प्रसिद्धः] वामः भुजदण्डः वः (युष्माकं) पातु (रक्षतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥38॥ तीन दिन श्रीगोपालके दर्शन :— एइमत तिनदिन गोपाले देखिला। चतुर्थ-दिवसे गोपाल स्वमन्दिरे गेला॥39॥ चौथे दिन गिरिराजके ऊपर स्थित मन्दिरमें श्रीगोपालका नृत्य-गीतके साथ जाना :— गोपाल-सङ्गे चलि' आइला नृत्य-गीत करि। आनन्द-कोलाहले लोक बोले 'हरि' 'हरि'॥40॥ महाप्रभुकी श्रीगोपालके दर्शनकी अभिलाषा पूर्ण :— गोपाल मन्दिरे गेला, प्रभु रहिला तले। प्रभुर वाञ्छा पूर्ण सब करिल गोपाले॥41॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने तीन दिन तक श्रीगोपालके दर्शन किये। चौथे दिन श्रीगोपाल अपने मन्दिरमें जानेके लिये चले। महाप्रभु श्रीगोपालके साथ नृत्य तथा गान करते हुए चलने लगे। लोगोंकी भीड़ भी आनन्दसे 'हरि' 'हरि' बोलते हुए कोलाहल कर रही थी। तब श्रीगोपाल गोवर्धनके ऊपर अपने मन्दिरमें चले गये और महाप्रभु गोवर्धनकी तलहटीमें ही रह गये। श्रीगोपालने महाप्रभुकी समस्त वाञ्छाओंको पूर्ण कर दिया॥39-41॥ महाकृपालु श्रीगोपालके दर्शनमें भक्तका भाव :— एइमत गोपालेर करुण स्वभाव। सेइ भक्त जनेर देखिते हय 'भाव'॥42॥ अनुवाद—श्रीगोपालका ऐसा ही करुणामय स्वभाव है जिसे देखकर भक्तोंके हृदयमें उनके प्रति प्रेमावेश जाग्रत हो जाता है॥42॥ दयामय श्रीगोपालका किसी छलसे भक्तको दर्शन देना :— देखिते उत्कण्ठा हय, ना चढ़े गोवर्धने। कोन छले गोपाल आसिं' उतरे आपने॥43॥ अनुवाद—किसी भक्तके हृदयमें श्रीगोपालके दर्शन करनेकी उत्कण्ठा होनेपर भी यदि वह गोवर्धनपर नहीं चढ़ता, तो श्रीगोपाल स्वयं किसी छलसे गोवर्धनसे उतरकर नीचे आ जाते हैं॥43॥ । 141