श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1583, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/34 ] लिये आये हो, पहले बतलाओ तुम कौन हो ? ये राजकुमार हैं, ये तो पाण्डु पुत्र हैं और ये धृतराष्ट्र पुत्र हैं। तुम किसके पुत्र हो, तुम्हारे पिता-माताका नाम क्या है?' उसने कहा,-'मेरी माताका नाम राधे है।' तो भीष्म पितामहने कहा,-'तुम क्या सूतपुत्र हो? सूतपुत्रको इन राजकुमारोंसे समता करनेका कोई अधिकार नहीं है, इसलिये तुम यहाँसे चले जाओ।' उसी समय दुर्योधन एकदम उठकर खड़ा हुआ और अपना राजमुकुट देकर कहा,-'यह अङ्गदेशका राजा और हमारा परम मित्र है। इसका सम्मान हो।' लेकिन भीष्म पितामहके सामने उसकी एक नहीं चली। लज्जित होकर कर्ण वहाँसे चला गया। अब उसने अर्जुनको हरानेकी ठान ली और इसलिये वह शस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये परशुरामजीके पास गया। परशुरामजीने उसका परिचय पूछा कि वह किसका पुत्र है, किस जातिका है? तो उसने क्षत्रियका पुत्र न कहकर स्वयंको ब्राह्मणका पुत्र बतलाया। ऋषि- महर्षि लोग बड़े सरल सीधे होते हैं। उन्होंने उसकी बात मान ली कि यह झूठ क्यों कहेगा ? और यह शस्त्र-शिक्षाके लिये एवं परमार्थके लिये आया है, इसलिये इसको अपना शिष्य स्वीकार करना चाहिये। तब उन्होंने उसको ब्रह्मास्त्रसे लेकर सब प्रकारके जितने शस्त्र हैं, सबकी शिक्षा दे दी। अब दीक्षा समारोहसे एक-दो पहले ही ऋषि उसके गोदीमें सर रखकर सो गये। तब वर्षाकाल था, एक लाल कीड़ा न जाने कैसे ऊपर चढ़ा और कर्णकी जङ्घाको छेदता हुआ नीचे निकल गया। रक्तकी धारा बहने लगी, परन्तु कर्ण थोड़ासा भी नहीं हिला। जब रक्त ऋषिके सिरमें लगा तो उन्हें कुछ गरम अनुभव हुआ और देखा कि रक्त बह रहा है। उठकर उन्होंने देखा कि यह रक्त तो कर्णकी जङ्घासे बह रहा है। परशुरामजीने कर्णसे उसका कारण पूछा तो उसने बताया कि एक कीड़ेने उसकी जङ्घाको छेद दिया था। परशुरामजी बोले कि इतनी पीड़ा सहन करके भी तुम हिले क्यों नहीं ? कर्णने कहा कि गुरुजी मैं हिलता तो आपकी निद्रामें बाधा आती। तब परशुरामजली क्रोधित होकर बोले,-'तुम किसी प्रकारसे ब्राह्मण नहीं हो सकते, क्योंकि ब्राह्मणमें इतनी सहनशीलता नहीं होती। तुम अवश्य ही क्षत्रिय हो। सत्य बताओ, नहीं तो तुम्हें श्राप दे दूँगा। तुम किसके पुत्र हो?' उसने कहा,-'मैं सूतपुत्र हूँ।' परशुरामजीने कहा,-'यह सत्य पहले क्यों नहीं बताया ? किसलिये यह शस्त्रकी शिक्षा ली है ? अब सब सत्य बतलाओ।' तो कर्णने कहा,-'मैंने अर्जुनको परास्त करनेके लिये यह शिक्षा ली है।' परशुरामजीने कहा,- 'तुमने यह बात पहले नहीं बतायी, तुमने गुरुसे झूठ बोला, इसलिये तुम मेरे शिष्य नहीं हो। जब तुम्हारे प्राण सङ्कटमें होंगे, तब तुम मेरी दी हुई समस्त विद्याको भूल जाओगे और वह तुम्हारे किसी काम नहीं आयेगी। जब तक ऐसा सङ्कट नहीं आयेगा, तब तक यह तुम्हारे काम आयेगी।' कर्णके भावको तामसिक भाव कहते हैं, इसलिये उसे तामसिक गुरुदास कहेंगे। (3) 'राजसिक गुरुदास'-सुख-ऐश्वर्य भोग, पत्नी आदिके लिये जो गुरु सेवा होती है वह राजसिक होती है। राजसिक गुरुदासका उदाहरण देवव्रत (भीष्म) हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मैं विवाह नहीं करूँगा, आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा और राजपद भी ग्रहण नहीं करूँगा। वे अपने भाइयोंके विवाहके लिये काशीनरेशकी कन्याओं अम्बा, अम्बालिका और अम्बिकाको युद्धमें जीतकर हरण करके ले आये। अम्बालिका और अम्बिका, इन दोनोंका तो विवाह हो गया, किन्तु अम्बाने कहा कि मैं किसी राजकुमारसे प्रेम करती हूँ, इसलिये मैं आपके भाईसे विवाह नहीं कर सकती। परन्तु आप मुझे हरण करके ले आये हैं, तो मेरे प्रियतम राजकुमार मुझे स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिये आपको ही मुझसे विवाह करना होगा। भीष्मने कहा कि मैं तो प्रतिज्ञाबद्ध हूँ, इसलिये विवाह नहीं कर सकता। अम्बाने सबसे प्रार्थना की, किन्तु कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सका, क्योंकि भीष्म तो महाप्रचण्ड और बलवान थे। तब । 137