श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अम्बा उनके गुरु परशुरामके पास गयी और जोर-जोरसे रोने लगी। परशुरामजीने पूछा, — 'बेटी, तुम क्यों रो रही हो, क्या बात है?' अम्बाने सारी बात उन्हें बतायी और कहा, — 'जब ये देवव्रत मुझे जीत करके लाये हैं, तो उनसे ही विवाह करूँगी। इसलिये कृपा करके आप उन्हें ऐसा आदेश दे दीजिये।' परशुरामजीको दया आ गयी और उन्होंने देवव्रतको बुलवाया और कहा कि जब इसे जीतकर लाये हो, तब तुम इससे विवाह क्यों नहीं करते हो? देवव्रतने कहा कि अपने भाइयोंके लिये इन्हें स्वयंवरमें जीतकर हरण करके लाया। परशुरामजीने कहा, — 'जब तुम जीतकर लाये हो, तब तुम्हें इससे विवाह करना पड़ेगा।' देवव्रतने कहा, — 'आप ऐसा आदेश मत दें। मैंने पिताजीको वचन दिया है कि मैं जीवन भर विवाह नहीं करूँगा और राज्य नहीं लूँगा।' परशुरामजीने कहा, — 'क्या तुम्हें स्वयंवरमें जाकर इन कन्याओंको बलपूर्वक पकड़कर अपहरण करते समय अपना वचन स्मरण नहीं था? अब इसका भागी कौन होगा? अब इससे विवाह करो, अन्यथा मुझसे युद्ध करो।' देवव्रत यह सुनकर प्रसन्न हो गये कि एक मार्ग तो खुल गया, इसलिये उन्होंने कहा, — 'मैं युद्ध करूँगा तो युद्धमें आपके द्वारा मारा जाऊँगा, किन्तु विवाह नहीं करूँगा।' उन दोनोंमें युद्ध हुआ, दोनों ही महावीर थे, इसलिये अन्तमें दोनोंमें-से कोई भी नहीं जीत सका। तब ब्रह्माजीने आकर उनका समाधान करा दिया। देवव्रतने विवाह तो नहीं किया, परन्तु उनके द्वारा गुरुका अपमान तो हुआ। इसमें कोई पारमार्थिक कारण नहीं था। इसलिये ऐसे शिष्योंको, भीष्म जैसे लोगोंको यहाँपर राजसिक कहा गया है। (4) 'सात्त्विक गुरुदास'—ऐसा शिष्य जो गुरुकी आज्ञाका अक्षरशः पालन करे और निज हितके विषयमें विचार न करे, ऐसी गुरुसेवा सात्त्विक होती है। इस सन्दर्भमें आरुणी और उपमन्युकी कथाका वर्णन आता है। आरुणी गुरुपत्नीके आदेश पालन करनेके लिये वर्षाकालमें कड़कड़ाती ठण्डमें मेड़ बाँधनेके लिये चले गये। मूसलाधार वर्षाके कारण जलकी प्रबल धाराके वेगसे मिट्टी बह जाती थी। अन्तमें कोई अन्य उपाय न देखकर वे स्वयं मेड़के ऊपर लेट गये और इससे जलका प्रवाह बहुत कम हो गया। किन्तु भोर होते-होते आरुणी ठण्डसे ठिठुरकर निर्जीव प्रायः हो गये। गुरु लालटेन लेकर उन्हें खोजते हुए पुकारने लगे, — "आरुणी, तुम कहाँ हो?" तो आरुणीने मेढ़पर लेटे हुए अति क्षीण स्वरमें उत्तर दिया, — "गुरुजी मैं यहाँ हूँ, खेतमें जल भर जाता था, इसलिये मैं यहाँपर लेट गया।" गुरुने उन्हें हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद दिया कि समस्त वेद-वेदान्तादि जो कुछ भी हैं, तुम्हें स्फुरित हो जाँय। गुरुके आशीर्वादसे आरुणी तत्क्षणात् मन्त्रदृष्टा ऋषि बन गये। उपमन्यु गुरु आश्रममें रहकर गुरुसेवा करते थे और उनकी आज्ञासे गायोंको चराने ले जाते थे। गुरुदेवने उनसे पूछा, — "तुम बहुत मोटे हो रहे हो, क्या खाते हो?" उपमन्युने कहा, — "बछड़ोंके दूध पी लेनेके बाद जो गायका दूध बच जाता है, मैं उसे पी लेता हूँ।" गुरुदेवने कहा, — "अरे! बछड़ोंके पीनेकी वस्तु तुम पी लेते हो? आगेसे ऐसा मत करना।" कुछ दिनोंके बाद गुरुदेवने पुनः कहा, — "तुम अब भी मोटे हो रहे हो, क्या खाते हो?" उपमन्युने उत्तर दिया, — "गायोंके मुँहसे जो फेन निकलता है, उसको पोंछकर खा लेता हूँ।" गुरुदेवने उसके लिये भी उसे निषेध किया। अगले दिन गुरु-आज्ञाका पालन करते हुए उपमन्युने वह भी नहीं खाया। किन्तु उन्हें जब बहुत भूख लगी, तो उन्होंने एकमन्दका पत्ता खा लिया, उसका कुछ रस आँखमें लग जानेके कारण वे अन्धे हो गये और गायोंको ढूँढ़ते हुए कुएँमें गिर पड़े। शामको गायें तो आश्रममें लौट आयीं, किन्तु उपमन्यु नहीं लौटे। गुरुजी उन्हें खोजने निकले और उनका नाम लेकर जोरसे पुकारने लगे। उपमन्युने कहा कि गुरुजी मैं कुँएमें गिरा हुआ हूँ। गुरुजीने रस्सी डालकर उन्हें जैसे-तैसे कुएँसे 138 ।