भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1579

अठारहवाँ अध्याय 18/26-33 ] एइ हेतु 'आनियोर' नाम से इहार॥ अन्नकूट-स्थान एइ देख, श्रीनिवास। ए-स्थान-दर्शने हय पूर्ण अभिलाष॥” [अर्थात् “इस स्थानपर गोप और गोपियोंने श्रीकृष्णके साथ अनेक कौतुक भरी लीलाएँ कीं थी, इसलिये इसका नाम 'आनियोर' है। हे श्रीनिवास! इस अन्नकूटके स्थानको देखो। इस स्थानके दर्शन करनेवालेकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं।"] स्तवावलीके व्रजविलास-स्तवमें— “व्रजेन्द्रवर्य्यार्पित-भोगमुच्चैर्धृत्वा बृहत्कायमधारिरुक्तः। वरेण्यां राधां छलयन् विभुङ्क्ते यत्रान्नकूटं तदहं प्रपद्ये॥” [अर्थात् “अघारि श्रीकृष्णने सर्वोत्तमा श्रीराधाको छलनेके लिये ऊँचा और विशाल शरीर धारण करके उत्सुकतावश व्रजेन्द्र श्रीनन्द महाराजके द्वारा अर्पित अन्नकूट-भोगका जिस स्थानपर भोजन किया था, मैं उस स्थानकी शरण ग्रहण करता हूँ।"] “कुण्डेर निकट देख निविड़-कानन। एथाइ 'गोपाल' छिला हञा सङ्गोपन॥” [अर्थात् “कुण्डके निकट इस सघन वनको देखो, यहीं श्रीगोपालको छिपाकर रखा था।"]॥26॥ एकजने आसि' रात्र्ये ग्रामीके बलिल। “तोमार ग्राम मारिते तुरुक-धारी साजिल॥27॥ आजि रात्र्ये पलाह, ना रहिह एकजने। ठाकुर लञा भाग', आसिबे कालि यवन॥”28॥ अनुवाद—एक व्यक्तिने रात्रिके समय वहाँ आकर ग्रामवासियोंको कहा,—“पठान लोग तुम्हारे ग्रामके ऊपर आक्रमण करनेकी तैयारी कर रहे हैं। इसलिये आज रातको ही तुम सब यहाँसे भाग जाओ, एक भी व्यक्ति यहाँ नहीं रहे। तुम लोग गोपाल ठाकुरको लेकर भाग जाओ, यवन लोग कल यहाँ आ जायेंगे॥”27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तुरुक'—एक विशेष मुसलमान (तुर्की अथवा पठान) सेना॥27॥ अनुभाष्य—'ग्रामीके'—ग्रामवासियोंको; 'तुरुकधारी'— तुर्की-वेशधारी घुड़सवार सेना॥27॥ शुनिया ग्रामेर लोक चिन्तित हइल। प्रथमे गोपाल लञा गाँठोलि-ग्रामे थुइल॥29॥ अनुवाद—यह सुनकर ग्रामके लोग चिन्तित हो गये। उन्होंने सबसे पहले श्रीगोपालको ले जाकर गाँठोलि ग्राममें छिपा दिया॥29॥ विप्रगृहे गोपालेर निभृते सेवन। ग्राम उजाड़ हैल, पलाइल सर्वजन॥30॥ अनुवाद—एक ब्राह्मणके घरपर एकान्तमें श्रीगोपालकी सेवा होने लगी। ग्रामवासी सभी भाग गये, इसलिये अन्नकूट-ग्राम उजड़ गया॥30॥ ऐछे म्लेच्छभये गोपाल भागे बारे बारे। मन्दिर छाड़ि' कुञ्जे रहे, किंवा ग्रामान्तरे॥31॥ अनुवाद—इस प्रकार म्लेच्छोंके भयसे श्रीगोपालको बार-बार स्थानान्तर किया जा रहा था। वे मन्दिरको छोड़कर कभी कुञ्जमें रहते, तो कभी एक ग्रामसे दूसरे ग्राममें स्थान बदलते रहते॥31॥ मानसी-गङ्गामें स्नान करनेके बाद गोवर्धनकी परिक्रमा :— प्रातःकाले प्रभु 'मानसगङ्गा'य करि' स्नान। गोवर्धन-परिक्रमाय करिला प्रयाण॥32॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभु मानसी-गङ्गामें स्नान करके गोवर्धनकी परिक्रमा करनेके लिये चल पड़े॥32॥ गोवर्धनके दर्शनसे प्रेमावेश :— गोवर्धन देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हञा। नाचिते नाचिते चलिला श्लोक पड़िया॥33॥ अनुवाद—गोवर्धनको देखकर महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें आविष्ट हो गये। नाचते-नाचते चलते हुए उन्होंने एक श्लोकका उच्चारण किया॥33॥ । 133