भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1580

[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगोवर्धन-स्तुति :– श्रीमद्भागवत (10/21/18)में– हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद्रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः। मानं तनोति सह-गोगणयोस्तयोर्यत् पानीय-सुयवस-कन्दर-कन्दमूलैः ॥ 34॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34॥ अमृतप्रवाह भाष्य–ये गोवर्धन पर्वत–वैष्णवप्रधान हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम-कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ– घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 34॥ अनुभाष्य–व्रजमें शरत्काल उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा वन-वनमें गोचारण करते-करते वंशी बजानेपर गोपियाँ श्रीकृष्ण-सङ्गके लिये कामातुर होकर श्रीकृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करते हुए इधर- उधर भ्रमण करते-करते सामने व्रजेन्द्रनन्दनसे अभिन्न गिरिराज गोवर्धनको देखकर गा रही हैं– हे अबलाः (सख्यः), हन्त (इति हर्षे) अयम् अद्रिः (गोवर्धनः) [ध्रुवं] हरिदासवर्यः (हरिदासानां श्रेष्ठः),–यत् (यस्मात्) रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः (रामकृष्णयोः चरणस्पर्शेन प्रमोदः, तृणाद्युद्गमनभेन रोमहर्षदर्शनात्, यस्य तादृशः सन्); यत् (यस्मात् च) पानीय-सुयवसकन्दरकन्दमूलैः (पानीयैः सुयवसैः सुकोमलैः शोभनतृणैः कन्दरैः कन्दमूलैश्च) [यथोचितम् अय] सहगोगणयोः (गोभिः गणेन सखिसमूहेन च सह वर्त्तमानयोः) तयोः (रामकृष्णयोः) मानं (समादरं) तनोति (विदधाति– अतोऽयमतिधन्यः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद–हे सखि ! अहो ये गोवर्धन निश्चय ही हरिदासोंमें श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम- कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ–घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 34॥ अमृतानुकणिका–जो लोग सांसारिक विषयोंमें आसक्त नहीं होकर भगवत्-सेवामें जीवन व्यतीत करते हैं, वे हरिदास हैं। श्रीमद्भागवतमें महाराज युधिष्ठिर, श्रीउद्धव और श्रीगिरिराज गोवर्धन–इन तीन महत् पुरुषोंको हरिदास कहा गया है। बृहद्भागवतामृत (1/5/7)में नारदजीकी युधिष्ठिर महाराजके प्रति उक्ति– “यूयं नृलोके वत भूरिभागा, येषां प्रियोऽसौ जगदीशवरेशः। देवो गुरुर्बन्धुषु मातुलेयो, दूतः सुहृत् सारथिरुक्तितन्त्रः॥” अर्थात् “इस नरलोकमें आपलोग ही सौभाग्यशाली हैं। क्योंकि ब्रह्मा, रुद्र आदि ईश्वरोंके भी जो ईश्वर हैं, वे श्रीदेवकीनन्दन आप लोगोंके प्रिय हैं। श्रीदेवकीनन्दन आप लोगोंके केवल प्रिय ही नहीं हैं, अपितु इष्टदेव, गुरु और बान्धव, मातृसम्बन्धसे सम्बन्धित कुटुम्बी, दूत, सुहृद् और कभी सारथी भी हैं।” अतः श्रीमद्भागवतमें उन्हें जो हरिदासकी पदवी मिली है, वह सर्वथा उपयुक्त है। उद्धवजी श्रीकृष्णके कैसे प्रिय हैं, इसे श्रीमद्भागवतमें कहा गया है। (भाः 10/46/1)– वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा। शिष्यो बृहस्पतेः साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तमः॥ अर्थात् “परीक्षित ! उद्धवजी वृष्णिवंशियोंमें प्रधान व्यक्ति थे। वे साक्षात् बृहस्पतिके शिष्य और परम बुद्धिमान् थे। उनकी महिमाके सम्बन्धमें और कौनसी बात कही जा सकती है कि वे भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा और मन्त्री थे।” (भाः 11/14/15)में श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुखसे कहते हैं– “न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥” अर्थात् “उद्धव ! तुम मेरे अत्यन्त प्रियपात्र हो। तुम मुझे जितने प्रिय हो, मेरा पुत्र आत्मयोनि ब्रह्मा, शङ्कर, सगे भाई बलरामजी, अद्धाङ्गिनी लक्ष्मी, और तो 134 |