श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/34 ] क्या मेरी आत्मा भी उतनी प्रिय नहीं है।" अतः श्रीमद्भागवतमें उद्धवजीको जो हरिदासकी पदवी मिली है, वह सर्वथा उचित ही है। प्रेमपर भक्त युधिष्ठिर महाराजका प्रेम श्रीकृष्णकी भगवत्ताका ज्ञान रहनेके कारण कुछ शिथिल रहता है। इसलिये प्रेमातुर भक्त उद्धवजी इनसे श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णने इन्हें गोपियोंसे प्रेमकी शिक्षा लेनेके लिये व्रजमें भेजा। वहाँ श्रीराधाके मादनाख्या महाभावके दर्शन करके उद्धवजी चमत्कृत हो गये और गोपियोंकी चरणधूलि प्राप्तिकी अभिलाषासे व्रजमें तृण, गुल्म, औषधि आदिके रूपमें जन्म ग्रहण करनेकी लालसा प्रकट की। इस अभिलाषाकी पूर्तिके लिये उन्होंने व्रजस्थित गिरिराज गोवर्धनका ही आश्रय लेना उचित समझा। अतः गोवर्धनके अङ्गमें स्थित कुसुम सरोवरके निकट तृणादिका जन्म ग्रहण किया। भविष्य-पुराणके अनुसार रसिकवर गोवर्धन श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति श्रीराधिकाजीके हृदयसे प्रकट हुए हैं। गोवर्धन तन, मन, धन, प्राणादि सर्वस्व न्योछावर करके श्रीकृष्ण और उनके सहगामियोंकी सब प्रकारसे मनोऽभीष्ट सेवा करते हैं, इसलिये गोपियाँ उन्हें हरिदासवर्य कह रही हैं। जिस दासकी सेवासे श्रीहरि आनन्दित होते हैं और जो दास श्रीहरिकी सेवाकर परमानन्दित होते हैं, वे दास ही श्रीहरिके दासोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। जो दास श्रीहरिकी सेवामें कुछ परिश्रम या क्लेश अनुभव करते हैं अथवा जिस दासकी सेवाको भगवान् अनिच्छापूर्वक ग्रहण करते हैं, उस दासको श्रेष्ठ नहीं कहा जाता। अधिकांश बद्धजीव मायादास हैं। मायादास अर्थात् यह शरीर और धन, जन, पुत्र-परिवार-जितनी आसक्तिकी वस्तुएँ हैं, उनके प्रति चित्तका लगना ही माया-दासत्व है। संसारमें बद्ध होनेतक कुछ-न-कुछ रूपमें यह अवश्य ही रहेगा। यदि जीव साधु अथवा गुरु और कृष्णकी कृपा पाता है- 'गुरु कृष्ण प्रसादे पाये भक्तिलताबीज'-तब उसका कुछ उत्थान होता है और गुरुकी कृपासे गुरुदास हो जाता है। हरिदास बननेके लिये पहला चरण है-गुरुदास होना। गुरुदास तो एक ही है, किन्तु भक्तिकी भावनाके या विषयोंके तारतम्यसे उसके विविध नाम दिये गये हैं। प्रथम है शिष्यब्रुव, उसके बाद तामसिक गुरुदास, राजसिक गुरुदास, सात्त्विक गुरुदास, निर्गुण गुरुदास। निर्गुणमें भी कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम दासका भेद है। इन सबमें-से निर्गुण दास सबसे उत्तम है। इससे भी ऊपर स्तर होनेपर वह कृष्णदास होगा। उपरोक्त प्रकारके गुरुदासोंके विभिन्न लक्षणों और गुणोंका उदाहरण सहित संक्षेपमें वर्णन इस प्रकार है- (1) 'शिष्यब्रुव'-शिष्यब्रुव उसको कहते हैं जिसका गुरुसे यथार्थ कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु किसीको मारनेके लिये, किसीसे स्पर्धा करनेके लिये, किसीसे ईर्ष्या करनेके लिये, तामसिक भावनाओंको लेकर वह कपटतापूर्वक गुरु-पदाश्रय करता है। वह गुरुकी सेवा न कर अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये गुरुका सङ्ग करता है। इसका एक उदाहरण एकलव्य है। द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवोंको शिक्षा देते थे। इस प्रकार उनके एक सौ पाँच शिष्य थे और वे समान रूपमें इनको सिखलाते थे, किन्तु फिर भी अर्जुनके प्रति उनकी प्रीति अधिक थी। एकलव्य जो बहेलिया सरदारका पुत्र था, उससे अर्जुनकी प्रतिष्ठा सहन नहीं हुई। वह नास्तिक और विद्वेषी स्वभावका था। शास्त्रोंमें कहा गया है कि गुरुको उत्तम कुलके सदाचारी व्यक्तिको शिष्यरूपमें ग्रहण करना चाहिये। निम्न कुलका व्यक्ति जिसका चरित्र और आचरण ठीक नहीं है, अथवा जिसके कुलका पता नहीं है या माता-पिताका पता नहीं है-ऐसे लोगोंको दीक्षा नहीं देनी चाहिये। एकलव्य द्रोणाचार्यके पास आया और कहा,-'गुरुदेव, मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप कृपा मुझे भी शिक्षा प्रदान करें।' द्रोणाचार्यने पूछा, - 'कहाँ रहते हो? किसके पुत्र हो? किसलिये यह धनुष-विद्या लेना चाहते हो?' एकलव्यने कोई उत्तर नहीं दिया। द्रोणाचार्यके अनेक बार पूछनेपर भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया। एकलव्यकी दुर्योधनसे मित्रता थी। उसका हृदय भीतरसे । 135