भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1586

[ 18/34-35 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

महाप्रभु भक्तोंके गुणोंको प्रकाशित करनेमें बहुत आनन्दित होते थे। उन्होंने अपने सेवक श्रीगोविन्दकी महिमाको प्रकाशित करनेके लिये ही ऐसी लीला की। शिष्यको अपने सुखका विचार, अपना सर्वस्व त्यागकर अपने आराध्य जो गुरु हैं, उनकी सेवाके लिये सब कुछ बलिदान देना पड़ता है। श्रीगोविन्दका ऐसा गुण था जिसकी प्रशंसा करना भी कठिन है। उन्हें श्रीराय रामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरका रात्रिमें महाप्रभुके पास आना अच्छा नहीं लगता था। वे मन-ही-मनमें सोचते थे कि इनके आनेसे पहले महाप्रभु तो कुछ ठीक रहते हैं, परन्तु जब ये दोनों आ जाते हैं, तो ये भी रातभर रोते हैं और महाप्रभुको भी रुलाते हैं। ये न तो स्वयं सोते हैं और न ही महाप्रभुको सोने देते हैं। परन्तु श्रीगोविन्द कुछ कह तो सकते नहीं, केवल चुपचाप बेचारे टुकुर-टुकुर देखते थे कि कब ये दोनों चले जाँय। श्रीगोविन्द सब कुछ सुनते थे और उनका रोदन देख करके इनका हृदय भी रोता रहता था। यह कितनी बड़ी सेवा है, इसे हम जब तक उस धरातलपर नहीं पहुँचेंगे, तब तक इस सेवाको नहीं समझ सकते। श्रीगोविन्द महाप्रभुके दुःखमें दुःखी और उनके सुखमें सुखी होते थे। वे ही उनके सर्वस्व जीवनके आधार हैं। ऐसे लोग ही वास्तविक हरिदास होते हैं।—"श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज"॥ 34 ॥

गोविन्दकुण्डमें स्नान और श्रीगोपालकी अवस्थितिके संवादकी प्राप्ति :— गोविन्दकुण्डादि-तीर्थे प्रभु कैला स्नाने। ताँहा शुनिला, गोपाल-गाँठोलि-ग्रामे॥ 35 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दकुण्ड-तीर्थमें स्नान किया और उन्होंने वहींपर सुना कि श्रीगोपाल गाँठोलि-ग्राममें हैं॥ 35 ॥

अनुभाष्य—'गोविन्दकुण्ड'—पैठा-ग्रामसे श्रीगोवर्धन- पर्वतके ऊपर 'आनियोर'-ग्राम है। यहाँ श्रीगोविन्द और श्रीबलदेवके दो मन्दिर और 'गोविन्दकुण्ड' नामका सरोवर है; किसीके मतानुसार रानी पद्मावतीने इस सरोवरकी प्रतिष्ठा (स्थापना) की थी। भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें— “एइ श्रीगोविन्दकुण्ड-महिमा अनेक। एथा इन्द्र कैल गोविन्देर अभिषेक॥” [अर्थात् "इस गोविन्दकुण्डकी बहुत महिमा है। यहाँ इन्द्रने श्रीगोविन्दका अभिषेक किया था।"] स्तवावलीके व्रजविलासस्तवमें— “नीचैः प्रौढ़भयात् स्वयं सुरपति पादौ विधुत्येह यैः, स्वर्गाङ्गासलिलैश्चकार सुरभिद्वाराभिषेकोत्सवम्। गोविन्दस्य नवं गवामधिगता राज्ये स्फुटं कौतुकात् तैर्यत् प्रादुरभूत् सदा स्फुरतु तद्गोविन्दकुण्डं दृशोः॥” [अर्थात् “श्रीकृष्णके प्रति अपराधके कारण इन्द्र बहुत भयभीत हो गये। स्वयं दीनभावसे गौओंके अधिपत्य राज्यमें अर्थात् व्रजमें आकर श्रीगोविन्दके श्रीचरणयुगलको धारण करके सुरभिके द्वारा जिस स्वर्ग-गङ्गा (मन्दाकिनी) के जलसे कौतुक भरा अभिषेक उत्सव किया था, उस जलसे प्रकाशित वह गोविन्दकुण्ड सदा मेरे नयनगोचर हो।"] मथुरा-खण्डमें— “यत्राभिषिक्तो भगवान् मघोना यदुवैरिणा। गोविन्दकुण्डं तज्जातं स्नानमात्रेण मोक्षदम्॥” [अर्थात् “जिस स्थानपर यदुओंके वैरी इन्द्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक हुआ था, उस अभिषेक- जलसे बने गोविन्दकुण्ड स्नान करनेमात्रसे ही मोक्ष प्रदान करते हैं।"] 'गाँठोली ग्राम'—गोपालपुर अथवा बिलछुरका अति निकटवर्ती ग्राम है। जनश्रुति यह है कि यहाँपर व्रज-नवयुव-युगलका (श्रीराधा-कृष्णका) प्रणयग्रन्थि बन्धन हुआ था। भक्तिरत्नाकरकी (पाँचवीं तरङ्गमें)— “सखी दुँह वस्त्रे गाँठि दिल सङ्गोपने। फागुया लैया केह गाँठि खुलि' दिला।" [ अर्थात् “श्रीराधा-कृष्ण होली खेलकर सिंहासनपर

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