श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1587, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/35-43 ] बैठे थे और किसी सखीने गुप्त रूपसे उनके वस्त्रोंको गाँठ लगाकर बाँध दिया। श्रीराधा-कृष्ण जब सिंहासनसे उठे, तब उन्होंने वस्त्रोंका गठबन्धन देखा और उसे देखकर सखियाँ हँसने लगीं। श्रीराधा-कृष्ण, दोनों लज्जित हो गये। तब किसी सखीने 'फाग' लेकर उनके वस्त्रोंकी गाँठको खोल दिया।"]—इसी कारण इस ग्रामका नाम—गाँठोली है॥35॥ गाँठोलि-ग्राममें श्रीगोपालका दर्शन और स्तुति-नृत्य :— सेइ ग्रामे गिया कैल गोपाल-दरशन। प्रेमावेशे प्रभु करे कीर्त्तन-नर्त्तन॥36॥ गोपालेर सौन्दर्य देखि' प्रभुर आवेश। एइ श्लोक पड़ि' नाचे, हैल दिन-शेष॥37॥ अनुवाद—गाँठोली-ग्राममें जाकर महाप्रभुने श्रीगोपालके दर्शन किये। प्रेमके आवेशमें आकर वे कीर्त्तन और नृत्य करने लगे। श्रीगोपालके सौन्दर्यको देखते ही महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और उन्होंने एक श्लोक पढ़ा। फिर वे दिन समाप्त होने तक नृत्य-कीर्त्तन करते रहे॥36-37॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/62) :— वामस्तामरसाक्षस्य भुजदण्डः स पातु वः। क्रीड़ाकन्दुकतां येन नीतो गोवर्धनो गिरिः॥38॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥38॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलनयन श्रीकृष्णने जिस बाँयी भुजाके द्वारा गिरिराज गोवर्धनको उठाकर क्रीड़ा-कन्दुककी (खेलनेवाली गेंदकी) भाँति उसका व्यवहार किया था, वही बाँयी भुजा ही तुम्हारा पालन करे॥38॥ अनुभाष्य— येन (वामबाहुना) गोवर्धनः गिरिः क्रीड़ाकन्दुकतां (क्रीड़ा-सामग्रीत्वं) नीतः (प्राप्तः) तामरसाक्षस्य (पद्मलोचनस्य कृष्णस्य) सः [प्रसिद्धः] वामः भुजदण्डः वः (युष्माकं) पातु (रक्षतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥38॥ तीन दिन श्रीगोपालके दर्शन :— एइमत तिनदिन गोपाले देखिला। चतुर्थ-दिवसे गोपाल स्वमन्दिरे गेला॥39॥ चौथे दिन गिरिराजके ऊपर स्थित मन्दिरमें श्रीगोपालका नृत्य-गीतके साथ जाना :— गोपाल-सङ्गे चलि' आइला नृत्य-गीत करि। आनन्द-कोलाहले लोक बोले 'हरि' 'हरि'॥40॥ महाप्रभुकी श्रीगोपालके दर्शनकी अभिलाषा पूर्ण :— गोपाल मन्दिरे गेला, प्रभु रहिला तले। प्रभुर वाञ्छा पूर्ण सब करिल गोपाले॥41॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने तीन दिन तक श्रीगोपालके दर्शन किये। चौथे दिन श्रीगोपाल अपने मन्दिरमें जानेके लिये चले। महाप्रभु श्रीगोपालके साथ नृत्य तथा गान करते हुए चलने लगे। लोगोंकी भीड़ भी आनन्दसे 'हरि' 'हरि' बोलते हुए कोलाहल कर रही थी। तब श्रीगोपाल गोवर्धनके ऊपर अपने मन्दिरमें चले गये और महाप्रभु गोवर्धनकी तलहटीमें ही रह गये। श्रीगोपालने महाप्रभुकी समस्त वाञ्छाओंको पूर्ण कर दिया॥39-41॥ महाकृपालु श्रीगोपालके दर्शनमें भक्तका भाव :— एइमत गोपालेर करुण स्वभाव। सेइ भक्त जनेर देखिते हय 'भाव'॥42॥ अनुवाद—श्रीगोपालका ऐसा ही करुणामय स्वभाव है जिसे देखकर भक्तोंके हृदयमें उनके प्रति प्रेमावेश जाग्रत हो जाता है॥42॥ दयामय श्रीगोपालका किसी छलसे भक्तको दर्शन देना :— देखिते उत्कण्ठा हय, ना चढ़े गोवर्धने। कोन छले गोपाल आसिं' उतरे आपने॥43॥ अनुवाद—किसी भक्तके हृदयमें श्रीगोपालके दर्शन करनेकी उत्कण्ठा होनेपर भी यदि वह गोवर्धनपर नहीं चढ़ता, तो श्रीगोपाल स्वयं किसी छलसे गोवर्धनसे उतरकर नीचे आ जाते हैं॥43॥ । 141